मानव जीवन के रहस्यमय विज्ञान में “प्राण” को उतना ही महत्त्वपूर्ण माना गया है जितना भौतिक जगत में सूर्य को, क्योंकि जैसे सूर्य की ऊर्जा के बिना जीवन संभव नहीं है वैसे ही प्राण शक्ति के बिना चेतना, विचार, कल्पना और संकल्प का वास्तविक परिणाम उत्पन्न नहीं हो सकता, और यही कारण है कि प्राण लय विज्ञान (Pran Laya Vigyaan) यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य केवल शरीर और बुद्धि का खेल नहीं है बल्कि उसके भीतर तीन स्तरों के मन—सचेत मन, आधार मन (अवचेतन) और दिव्य मन (अधिचेतन/सुपरकॉन्शस)—का गहरा ताना-बाना काम करता है, और इन तीनों के बीच सेतु का कार्य करता है प्राण, क्योंकि प्राण ही वह सूक्ष्म शक्ति है जो विचारों को गति देकर उन्हें कल्पना के साथ मिलाती है और फिर उस मिश्रण को संकल्प की ठोस आकृति में बदल देती है, ठीक वैसे जैसे बीज को अंकुर बनने के लिए मिट्टी, जल और सूर्य के साथ-साथ प्राणवायु की आवश्यकता होती है, वैसे ही विचार को फलित होने के लिए प्राण शक्ति की आवश्यकता होती है; सचेत मन वह है जिसमें हमारी तर्कशीलता, प्रत्यक्ष अनुभव और निर्णय क्षमता रहती है, अवचेतन मन अथवा आधार मन वह है जिसमें हमारी आदतें, संस्कार, स्मृतियाँ और गहरे दबे हुए विचार रहते हैं, जबकि दिव्य मन वह है जो ईश्वर, सार्वभौमिक चेतना या कॉस्मिक इंटेलिजेंस से जुड़ा होता है, किंतु इन तीनों के बीच कोई संवाद तभी स्थापित हो सकता है जब प्राण प्रवाहित हो, क्योंकि प्राण ही ऊर्जा का ऐसा संवाहक (carrier) है जो ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जाने वाले संदेशों को गति देता है; जब कोई विचार सचेत मन में उत्पन्न होता है तो वह मात्र एक छवि या हल्की तरंग होती है, लेकिन जब उस विचार के साथ कल्पना जुड़ती है तो वह चित्र अधिक जीवंत हो जाता है और जब उसमें प्राण का संचार होता है तो वह चित्र ऊर्जा से युक्त होकर आधार मन में उतर जाता है, जहाँ वह गति पकड़कर बार-बार दोहराए जाने वाले विचार और भावनाओं के साथ मिलकर गहरी छाप बनाता है, और यही छाप संकल्प में रूपांतरित होकर दिव्य मन तक पहुँचती है, जो उसे ब्रह्मांड की विशाल ऊर्जा के साथ जोड़कर वास्तविकता में ढालने की प्रक्रिया शुरू करता है, इसीलिए ऋषियों ने कहा है कि “विचार बीज है, प्राण जल है और संकल्प उसका वृक्ष है”; यदि केवल विचार और कल्पना हों परंतु प्राण शक्ति न हो तो वह बीज सूखा रह जाता है, अंकुरित नहीं होता, इसलिए Law of Attraction और Manifestation जैसी आधुनिक अवधारणाएँ तभी सफल होती हैं जब उनमें प्राण शक्ति का प्रवाह शामिल हो, अन्यथा वे केवल मन के खेल बनकर रह जाती हैं; पश्चिमी जगत में Law of Attraction को प्रायः इस रूप में समझाया जाता है कि “आप जैसा सोचते हैं वैसा आकर्षित करते हैं” लेकिन प्रश्न यह है कि सोचने भर से क्यों अधिकांश लोगों का आकर्षण और अभिलाषा साकार नहीं हो पाती, उसका उत्तर यही है कि उनके विचारों में प्राण शक्ति का निवेश नहीं होता, वे केवल मानसिक कल्पना करते हैं लेकिन उसे श्वास, ध्यान, भाव और जीवन ऊर्जा के साथ नहीं जोड़ते, इसीलिए वह हवा में तैरते बुलबुले की तरह गायब हो जाता है; प्राण लय विज्ञान कहता है कि श्वास ही प्राण का वाहक है, इसलिए जब साधक श्वास को नियंत्रित करके, ध्यान में स्थिर होकर और भावनाओं को गहराई से जोड़कर किसी विचार को पोषित करता है, तब वह विचार साधारण कल्पना से उठकर प्रबल संकल्प बन जाता है और दिव्य मन के माध्यम से ब्रह्मांड में प्रेषित होकर साकार परिणाम उत्पन्न करता है, यह प्रक्रिया उसी तरह है जैसे एक तीर तभी लक्ष्य तक पहुँचता है जब उसमें धनुष की प्रत्यंचा (string) से पर्याप्त बल संचारित हो, बिना बल के छोड़ा गया तीर जमीन पर गिर जाएगा; उसी तरह बिना प्राण के विचार कभी लक्ष्य तक नहीं पहुँचते, इसलिए प्राण शक्ति आवश्यक है; सचेत मन अकेले केवल योजनाएँ बना सकता है, आधार मन अकेले केवल स्मृतियों को दोहरा सकता है, और दिव्य मन अकेले केवल प्रतीक्षा में रह सकता है, लेकिन जब इन तीनों को प्राण की धारा जोड़ देती है तो विचार, भावना और ऊर्जा एक साथ मिलकर संकल्प की जीवंत धारा बन जाते हैं, और यही संकल्प ब्रह्मांड के नियमों को सक्रिय करके परिणाम को आकर्षित करता है; यह भी समझना आवश्यक है कि कल्पना (imagination) केवल चित्र है और विचार (thought) केवल बीज है, दोनों मिलकर भी निष्प्राण हैं जब तक प्राण शक्ति उन्हें गतिक और जीवन्त न बनाए, और जब प्राण का स्पर्श होता है तो विचार-कल्पना का सम्मिलित रूप ऊर्जा की गति से दिव्य मन तक पहुँचकर ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ जाता है और तब Manifestation आरंभ होता है; यही कारण है कि योग, ध्यान, प्राणायाम और मंत्रजप को प्राण लय विज्ञान का मूल माना गया है, क्योंकि ये साधनाएँ केवल विचार या विश्वास को नहीं बल्कि प्राण शक्ति को जगाती हैं और उसे सही दिशा में प्रवाहित करती हैं; यदि प्राण शक्ति न हो तो Law of Attraction और Manifestation केवल किताबों और भाषणों की बातें बनकर रह जाएँगी, जिनका वास्तविक जीवन में कोई असर नहीं होगा, ठीक वैसे जैसे बिना बिजली का बल्ब केवल काँच का ढाँचा होता है, रोशनी नहीं देता; इस प्रकार निष्कर्ष यही है कि प्राण शक्ति ही वह केंद्रीय तत्त्व है जो विचार को कल्पना से जोड़कर उसे गति देती है, उसे संकल्प में बदलती है और फिर ब्रह्मांड की ऊर्जा से मिलाकर वास्तविकता का निर्माण करती है, और इसीलिए कहा गया है—“प्राण शक्ति के बिना Law of Attraction और Manifestation सिर्फ खोखले शब्द हैं।”
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