Wednesday, June 24, 2015

ज्योतिष में अपरमित आयु {Immeasurable Age in Astrology}


भारत के  प्राचीन ग्रंथों में अनेकानेक प्रमाण  मिलते हैं की कई लोग सैकड़ों या  हज़ारों वर्षों  तक जीते हैं  । वर्तमान में भी बहुतेरे लोगों का पता चलता है जो 100 से 300 साल तक जीवित रहे थे । सिद्धियों और योग के बल पर उम्र को अपने वश में करने के लिए विख्यात देवरहा बाबा विश्वप्रसिद्ध थे । कहा जाता है की उनकी आयु ढाई सौ से पांच सौ के बीच थी । देवराह बाबा के अलावा  तैलंग स्वामी भी एक उच्च कोटि के योगी थे जिनकी आयु  का अनुमान 300 साल  के आस पास लगाया जाता है ।हिमालय में निवास करने वाले महावतार बाबा की के विषय में कहा  जाता है की उनकी आयु 2 ,000 वर्ष से भी अधिक है । अभी भी कई साधकों और योगियों ने महावतार बाबा जी के दर्शन किये हैं उनके अनुसार बाबा जी अभी भी 25 वर्ष के नवयुवक योगी के भांति दिखते हैं ।

हमारे धर्म ग्रंथों में कुल आठ ऐसे लोगों के बारे में जानकारी मिलती है जो अमर हैं | भगवान परशुराम ,कृपाचार्य ,मार्कण्डेय ,हनुमानजी,राजा बलि, विभीषण ,वेद-व्यास , अश्वत्थामा आठ अमर चिरंजीव माने जाते हैं  जिनकी अपरमित आयु मानी जाती है ।

ज्योतिष में   अपरमित आयु के योग
  1. यदि कुम्भ लग्न हो और उसमें सूर्य बैठा हो और गुरु  2 /12 वें भाव में स्थित हो तो जातक उच्च कोटि  का योगी होता है और योगाभ्यास या रसायन विद्या के बल पर हज़ार वर्ष तक जीता है ।
  2. सिंह लग्न में गुरु कर्क राशि में स्थित हो ,बुद्ध कन्या राशि में और पाप ग्रह 3 ,4 ,5,6 और 11वें भाव में स्थित हो तो जातक हज़ार वर्ष तक जीता है ।
  3. कुंडली में लग्न से प्रारम्भ करके यदि पहला ग्रह शनि हो और अंतिम ग्रह मंगल हो तो जातक अमर होता  है  । जबकि सभी ग्रह शनि और मंगल के अंतर्गत हो तो जातक उच्च कोटि का योगी होता है लेकिन इस योग में  से आयु के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है जैसे नरसिंह भारती ,विवेकानंद, अरविन्द घोष ।
  4. शुक्ल पक्ष का जन्म हो और कर्क लग्न में गुरु स्थित हो और चतुर्थ भाव में शनि हो और सप्तम में मंगल हो तो हज़ार वर्ष की आयु होती है । प्रभु श्रीराम की कुंडली में यह योग उपस्थित है ।
  5. सिंह लग्न में मंगल और सूर्य 4 भाव में हो ,राहु 12 वें भाव में हो और शेष ग्रह 2 भाव में स्थित हो तो जातक हज़ार वर्ष तक जीता है ।
  6. मेष लग्न में राहु किसी शुभ ग्रह के साथ लग्न में स्थित हो , गुरु 10 वें भाव में ,मंगल 7 वें भाव में और बली चन्द्रमा 12 वें भाव में बैठा हो तो जातक रसायन विद्या के बलपर कम से कम 2 ,000 वर्षों तक जीवित रहता है ।
  7. मेष लग्न में ,कर्क में सूर्य,मकर में शनि ,तुला में मंगल और मीन में बली  चन्द्रमा हो तो जातक 2 ,000 वर्षों तक जीता है ।
  8. कर्क लग्न में लग्न में गुरु और चन्द्रमा स्थित हो ,शुक्र और बुद्ध केंद्र में हों और अन्य ग्रह 3 ,6 ,11  में बैठे हो तो जातक चिरायु होता है ऐसे योगमें आयु गणना की आवश्यकता नहीं होती है ।

द्वारा
गीता झा 

Tuesday, June 23, 2015

ज्योतिष में दीर्घायु या लम्बी आयु के कारक


ज्योतिष में आयु विचार के लिए आयु का निम्न वर्गीकरण किया गया है
बालारिष्ट --8 वर्ष तक
अल्पायु ---8 -32 वर्ष तक
मध्यायु ---32 -64 वर्ष तक
दीर्घायु ---64 -100 वर्ष तक                             

आयु का विचार करने के प्रमुख कारक
  1. लग्न और चन्द्र लग्न
  2. लग्नेश और अष्टमेश
  3. अष्टम भाव में स्थित ग्रह
  4. अष्टम भाव पर दृष्टि  वाले ग्रह
  5. मारक ग्रह
  6. मारकेश [ दूसरा  और सप्तम भाव ]
  7. होरा लग्न
  8. शनि की लग्न और चन्द्रमा से स्थिति

दीर्घायु के कुछ प्रमुख योग

लग्न /लग्नेश द्वारा
  1. लग्नेश बलवान हो कर केंद्र में स्थित हो | 
  2. लग्नेश जिस भाव में हो उस भाव का स्वामी जिस राशि में स्थित हो उस राशि का स्वामी और लग्नेश केंद्र में स्थित हो तो लम्बी आयु होती है ।
  3. लग्नेश केंद्र में  बैठा हो और शुक्र या गुरु से युक्त या  दृष्ट हो ।
  4. लग्न द्विस्वभाव राशि का हो और लग्नेश उच्च राशि/मूलत्रिकोण राशि का केंद्र में स्थित  हो तो लम्बी आयु होती है ।
  5. लग्न द्विस्वभाव राशि का हो और लग्नेश जिस स्थान में हो उससे केंद्र में दो पापग्रह हो तो दीर्घायु योग होता है ।
  6. लग्न  द्विस्वभाव राशि हो और लग्नेश केंद्र /त्रिकोण में स्थित हो ।
  7. चर लग्न में चन्द्रमा चर राशि में हो दीर्घायु योग बनता है ।
  8. मेष  लग्न में शनि मकर राशि में ,मंगल तुला राशि में और चन्द्रमा कुम्भ राशि में हो ।
  9. वृष राशि के लग्न में शुक्र बैठा हो , गुरु केंद्र में हो और अन्य  ग्रह 3 /6 /11 भाव में हो तो रसायन या मन्त्र के प्रयोग से लम्बी आयु पाता है । 
  10. कर्क लग्न में चन्द्रमा हो और शेष ग्रह शुभ राशि में बैठे हों ।
  11. कर्क  लग्न में गुरु और चन्द्रमा हो ,शुक्र केंद्र में हो और 8 वां भाव खाली हो  जातक की लम्बी आयु होती है ।
  12. कर्क लग्न में गुरु और चन्द्रमा हो ,शुक्र और बुद्ध केंद्र में हो और बाँकी ग्रह 3 /6 /11 वें भाव में हों ।
  13. कर्क लग्न हो ,शनि तुला राशि में हो गुरु मकर राशि में हो ,चन्द्रमा वृष राशि में हो तो जातक रसायन या मन्त्रों के प्रभाव से दीर्घजीवी होता है 
  14. तुला लग्न में शुक्र बैठा हो , गुरु एवं मंगल उच्च के हों और जन्म अश्वनी नक्षत्र का हो ।
  15. द्विस्वभाव लग्न में चन्द्रमा स्थिर राशि में हो तो दीर्घायु योग बनता  है ।
  16. लग्न स्थिर राशि तथा चन्द्रमा द्विस्वभाव राशि में हो भी दीर्घायु  योग बनता है ।
  17. लग्नेश केंद्र में ,पाप ग्रह 3 /6 /11 वें भाव में हों या दशमेश उच्च हो तो भी  लम्बी आयु होती है ।
  18. गुरु लग्न में हो और चन्द्रमा,शुक्र और मंगल तीनों परमोच्च हो तो लम्बी आयु होती है ।
  19. लग्न में स्वगृही गुरु बैठा हो ,शुक्र केंद्र में हो और मिथुन राशि में कोई ग्रह  ना हो तो जातक इन्द्रतुल्य एवं  रसायन  के प्रयोग से दीर्घजीवी होता है ।  


अष्टम भाव /अष्टमेश
  1. जन्म लग्न से अष्टमेश अपनी उच्च राशि में हो तो लम्बी आयु होती है ।
  2. अष्टमेश अष्टम में अपनी राशि में हो | 
  3. अष्टमेश स्वगृही हो और अष्टमेश  स्थान से केंद्र या त्रिकोण में कोई शुभ ग्रह हो ।
  4. अष्टमेश जिस स्थान पर हो उस स्थान का स्वामी और लग्नेश केंद्र में स्थित हो | 
  5. अष्टमेश 8 वें या 12 वें भाव में स्थित हो और अष्टमेश  जिस  स्थान पर हो उसका स्वामी लग्न से अष्टम बैठा हो ।


शनि
  1. शनि अष्टम में हो और अष्टमेश  स्वराशि में हो |
  2. शनि  या अष्टमेश किसी उच्च ग्रह के साथ या दृष्ट हों ।
  3. लग्नेश या अष्टमेश शनि  पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो |
  4. शनि अष्टम भाव में स्थित हो तो लम्बी आयु होती है ।
  5. शनि केंद्र में स्थित हो तो जातक   कम से कम 75 साल तो जीता ही है ।
  6. शनि या अष्टमेश किसी उच्च ग्रह से  युक्त या दृष्ट हों ।
  7. अष्टमेश अपनी राशि में हो शनि की भी मित्र राशि हो तथा शनि अष्टम भाव से त्रिकोण [8 ,12 ,4 भाव ] में हो |
  8. कोई एक ग्रह उच्च राशि में बैठा हो और उसके साथ अष्टमेश और शनि हो |
  9. शनि लग्नेश या अष्टमेश हो और उसके साथ एक या अधिक  शुभ ग्रह हो तो जातक  दीर्घजीवी होता है ।
  10. गुरु या शुक्र में से कोई भी केंद्र में हो और शनि 5 /6 /8 /11 वें  भाव में हो तो जातक दीर्घायु होता है |


अन्य योग
  1. गुरु और शुक्र दोनों केंद्रवर्ती हों तो लम्बी आयु का योग बनता है  
  2. सभी ग्रह 3 या 8 वें भाव में स्थित हो तो जातक लम्बी आयु पाता है 
  3. पांच ग्रह मिलकर 5 /9 वें भाव में हो और उनमें से कोई अष्टमेश न हो ।
  4. केंद्र स्थान शुभ ग्रहों से युक्त हो , लग्नेश शुभ ग्रह के साथ बैठा हो और गुरु द्वारा देखा जाता हो तो दीर्घायु योग बनता है ।
  5. तीन ग्रह उच्च हों और  उनमें किसी के साथ लग्नेश एवं अष्टमेश हों और पाप युक्त /दृष्ट  ना हों ।
  6. चन्द्रमा 5  वें भाव में गुरु 9 वें भाव में और मंगल 10 वें भाव में हो तो लम्बी आयु होती है ।
  7. 6 ठें और 12 वें भाव के स्वामी लग्न में हों और लग्नेश और दशमेश केंद्र में हो |
  8. चन्द्रमा उच्च ,मित्र राशि अथवा मूल त्रिकोण राशि में स्थित हो और गुरु या शुक्र से दृष्ट हो ।
  9. सभी ग्रह 3 ,4 ,8 ,9 वें भाव में हों तो दीर्घायु योग बनता है ।
  10. तीन ग्रह उंच्च राशि में हों और लग्नेश ,सप्तमेश के साथ सप्तम भाव में स्थित हो तथा सप्तम भाव पाप ग्रह से रहित हो| 
  11. सप्तम भाव में तीन ग्रह हों या तीन ग्रह उंच्च राशि के मित्र  स्थान के तथा अपने ही वर्ग में हो और लग्नेश बलवान हो तो लम्बी आयु होती है ।
  12. लग्नेश बली  हो और पाप ग्रह 3 ,6 ,11 भाव में स्थित हो और शुभ ग्रह  केंद्र 1 ,4 ,7 ,10 भाव या त्रिकोण 5 ,9 भाव में स्थित हो | 
  13. लग्नेश ,अष्टमेश और दशमेश लग्न से केंद्र / त्रिकोण में हों और लग्न से 6 ठे , 8 वें अथवा 11 वें  स्थान पर शनि बैठा हो ,लेकिन शनि का इन तीनों ग्रहों से कोई सम्बन्ध नहीं  चाहिए तो जातक दीर्घायु होता है ।
  14. शुभ ग्रह 6 ,7 ,8 वें भाव में हों और पाप  ग्रह 3 ,6,11 वें भाव में हो  |
  15. यदि गुरु ,बुध और शुक्र केंद्र त्रिकोण में हों और पापग्रहों से युक्त या दृश्य न हों तो जातक दीर्घायु होता है ।
  16. सूर्य ,मंगल और शनि की  युति 3 /6 /11 वें भाव में हो और पाप ग्रह से दृष्ट/युक्त ने हो तो जातक लम्बी आयु पाता है ।
  17. बुद्ध ,गुरु और शुक्र 5 /9 वें भाव में हो शनि उच्च हो पाप दृष्ट/युक्त न हो तो लम्बी आयु होती है ।
  18. 5 /8 /9 वें भाव में कोई पाप ग्रह न हों और केंद्र में भी कोई शुभ ग्रह न हो तो जातक देव तुल्य होता हुआ दीर्घजीवी होता  है |
  19. गुरु और चन्द्रमा कर्क राशि में हो , बुद्ध और शुक्र केंद्र में हों एवं अन्य ग्रह 3 /6 /11वें भाव में हों तो जातक दीर्घायु होता है ।
  20. शुक्र,मंगल शनि और राहु 3 /6 /11 वें भाव में हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक दीर्घायु  होता है ।


द्वारा 
गीता झा

Saturday, June 20, 2015

ज्योतिष में मानसिक अशांति के कारण


अपने  कार्यों में  अपेक्षानुरूप सफलता नहीं मिलने से अथवा किसी भी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों से सामना न कर पाने के कारण मन अशांत हो जाता है । अशांत मन अनेक प्रकार के मनोरोगों को जन्म देता है ।
ज्योतिष में मानसिक अशांति के मुख्य कारक
लग्न ---व्यक्तित्व
चतुर्थ भाव ---मानसिक स्थिति ,विचार
चन्द्रमा ---मन का कारक
ज्योतिष में मानसिक अशांति के कारण
  1. चन्द्रमा  नीच  राशि वृश्चिक में हो |
  2. चन्द्रमा का 6/8/12 वें  भाव में स्थित होना । 
  3. चन्द्रमा पर राहु एवं शनि की युति या दृष्टि हो  । दोनों में से एक ग्रह से युति हो और दूसरे की दृष्टि हो तब भी अशांत मन होने की संभवना बनी रहती है ।
  4. चन्द्रमा पाप ग्रहों के मध्य हो या पाप कर्तरी -योग में हो तब भी मानसिक पीड़ा मिलती है ।
  5. लग्न / लग्नेश  और चन्द्रमा दोनो निर्बल हो तो भी जातक को मनोविकार होते हैं ।
  6. चतुर्थ भाव विचारों का होता है । इस भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव दूषित विचार उत्पन्न करते हैं जिनसे मनोविकार  होते हैं ।
  7. चन्द्रमा और चतुर्थ भाव  दोनों पीड़ित होने पर जातक को अपने विचारों पर नियंत्रण नहीं रहता है और वह मनोरोगी हो जाता है ।
  8. लग्न,सूर्य और चन्द्रमा पर राहु का प्रभाव हो तो जातक को अज्ञात कारणों से मानसिक पीड़ा होती है ।
बलवान मानसिक स्थिति के ज्योतिष कारण
  1. चन्द्रमा यदि केंद्र/त्रिकोण में बली स्थिति में हो तो जातक की मानसिक स्थिति बलवान होती है ।
  2. चन्द्रमा पर शुभ  ग्रहों का प्रभाव हो तो मानसिक विकार नहीं होते हैं ।
  3. चन्द्रमा और लग्नेश दोनों बली हों तो जातक भावात्मक रूप से बली होता है ।
  4. लग्न  और लग्नेश बली हों तो जातक अनुशासित  और संतुलित मानसिकता का होता है  ।
  5. सूर्य,चन्द्रमा और लग्न तीनों के बली होने पर जातक दृढ मानसिकता का होता है ।
  6. अक्सर शुभ ग्रहों की दशा में मनोस्थिति अच्छी ही रहती है ।

द्वारा
गीता झा 

Friday, June 19, 2015

Astrology- When will I have my own house?



It is a natural and fundamental intention to have sweet home for survival comfortable in life. According to the capability of person’s financial matter he/she tries to have a good building. Astrology appends certain clues and points how and when a person can have the scope to occupy, purchase or get ownership of a house.

Astrological factors responsible for ownership of a house

Ascendant ---general disposition in life, desires and their fulfillment
2nd house /lord ---wealth, family inheritance, fortune
3rd house/lord  ---shift from one place to other, change of residence
4th house/lord ---land, property, home  
11th house /lord --- gains, income, prosperity
Mars---significator of landed property

Saturn ---Obstacles, delays and cancellations

Favorable Combinations for owing a house
  1. 4th lord in its own sign, exaltation or friendly sign or exalted planet in the 4th house gives beautiful house.
  2. 4th house should be positively influenced by 11th lord from ascendant/Moon  
  3. Positive influence of Mars on 4th house/lord from ascendant/Moon
  4. Lords of ascendant and 4th house combined in 4th house and having benefic aspects indicates gain of house in most unexpected manner.
  5. Lords of 10th house and 4th house combined in quadrant or trine indicates a huge house like palace.
  6. Lords of 4th house and 10th house are strong and friendly indicates the possibility of much landed property.
  7. Mercury placed in 4th house indicates artistic house,
  8.  Moon in 4th house gives new house, native will build a descant house but found of shifting house often. Native will have fortune in lands and agriculture.
  9. Sun in 4th house indicates native will have inheritance and will live in leaf roof house .favorable Sun signifies ownership of 2 house but weak Sun represents loss of house 
  10. Jupiter in 4th strong and durable house
  11. Sun + Ketu in 4th give flimsy or fragile house
  12. Saturn + Rahu in 4th give old house or house made of rocks and stones
  13. Venus in 4th gives lovely house
  14.  Mars + Rahu in 4th give stone house
  15. Moon+ Venus in 4th house give multistoried house.
  16. Mars +Ketu in 4th house give brick house.
  17. Jupiter in 4th gives a house of timber, sun gives house of grass.
  18. 4th lord in its own / exaltation /friendly sign or an exalted planet sitting in 4th house and 9th lord in quadrant give a beautiful house.
  19. 4th lord placed in 10th house and 10th lord combined with strong Mars in 4th house increases possibilities of much landed properties.
  20. Lord of marriage Venus is in 4th house with strength or if the lord of 4th house is placed in 7th house or if lord of 7th and 4th are friends and conjunct native will get lands or house through his wife.

Loss of house/land
  1. If lord of 4th joins Nashasthan [6th/8th/12th house] and aspected by Mars /Sun the native house will be lost.
  2. Lord of 4th house in Nashasthan [6th, 8th, 12th house] while Mars is afflicted native will lose land. 
  3. Presence of an afflicted planet in 4th house and Mars in depression indicates denial of inheritance. house placed in 12th house native will live in another’s house or in foreign country.
  4. Lord of 4th house placed in 6th/8th/12th house and lord of ascendant is afflicted resents loss of property through the action of Government.
  5. Afflicted/debilitated lord of 4th house placed in 8th house indicates loss of house/land Debilitated 4th lord combined with Sun indicates loss of landed property by Government Decree.
  6. Lord of 4th house placed in 3rd house with benefic aspects the native will acquire very little immovable property.

Timing for owning a house /land
  1. During Mahadasha and Antardasha of lord of 4th house from ascendant/Moon
  2. During Mahadasha and Antardasha of Mars the natural significator of landed property
  3. Double transit of Saturn and Jupiter in a horoscope aspecting 4th house from ascendant/Moon
  4. Transiting Mars aspecting the 4th house/lord from ascendant/Moon
  5. Transiting 4th lord aspecting natal Mars in horoscope
  6. For readiness to change residence the Mahadasha and Antardasha of planets associated with 3rd house/lord should be consider.
  7. Mahadasha /Antardasha of  Jupiter/Venus/Mars are good for buying landed properties.
  8. If lord of 4th house is in 11th house or if Mars is in the 4th house or 11th house in sign of Aries/Scorpio the native will purchase land  during   Mahadasha /Antardasha of Mars

By
Geeta Jha


  

Monday, June 15, 2015

वक्त ने किया क्या हसीं सितम


वक्त ने किया क्या हसीं सितम
तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम

बेकरार दिल इस तरह मिले
जिस तरह कभी, हम जुदा न थे
तुम भी खो गये, हम भी खो गये
एक राह पर चल के दो कदम

जायेंगे  कहाँ, सूझता नहीं 
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है, कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिन ख्वाब दम-ब-दम

Saturday, June 13, 2015

Types of Therapies Depending on Cause



Physical based
Allopathic, ayurvedic, exercise, acupressure, massage, unani, diet therapy

Mind based
Psychotherapy, homeopathy, psychic surgery, NLP, Silva MP, meditation, graphology, prayer and mantra chanting

Emotion based
EFT, EET [emotional empowerment technique]

Energy based
Reiki, pranic healing, theta healing, yoga, vastu astrology, feng shui

Soul based
Karuna karma soul healing, past life regression, rebirthing, inner child  

By
Geeta Jha

Wednesday, June 10, 2015

Indication of Second Marriage in Astrology



Remarriage is a marriage that takes place after a previous marital union has ended, as through divorce or widowhood. Some individuals are more likely to remarry than others; the likelihood can differ based on previous relationship status (e.g. divorced vs. widowed), level of interest in establishing a new romantic relationship, gender, race, and age among other factors. 

Astrological factors responsible for re marriage or second marriage

Ascendant – nature and aptitude ,mind and taste, self identity
2nd house/lord- longevity of spouse, family life  
7th house/lord – love and matrimony, law suits, wife or husband
9th house/lord- significator of second marriage
Venus – significator of wife
Jupiter - Significator of husband

Astrological factors responsible for second marriage

7th house/lord
  1. If   7th house/lord falling in in dual signs [Gemini, Virgo, Sagittarius and Pisces] indicates two marriages.
  2. 7th house falling in evil sign and lord of 7th house occupying a sign of depression  or in acondition of retrogression or  a malefic joining the 7th house will cause two marriages, but not in the case of beneficial planet/s aspect
  3. 7th lord form ascendant/Moon placed in a dual sign and having  conjunction with Venus in birth and navmansha chart indicates two marriages.
  4. Rahu placed in 7th house chance for remarriage increases manifold. 
  5. Malefic influences on 2nd and 7th house/lord indicates multiple marriages.
  6. Lords of 7th and 11th house are in conjunction/aspect/quadrant/trine indicates more than two marriages.
  7. Two planets placed in 7th house increases the possibility of second marriage.
  8. Lord of 7th house placed in 4th house or lord of 9th house placed in 7th house indicates second marriage.
  9. Mars in 7th house and Saturn/Rahu in 8th house without having any benefic aspect represents second marriage.
  10. Lord of 7th house placed in  6th/8th/12th house and malefic  planet  like Saturn/Mars /Rahu  occupying 7th house  and a weak Venus conjoined with a natural benefic planet indicates possibility for second marriage .
  11. Mars + Venus placed in 7th house and lord of 7th house placed in 8th house and Saturn posited in 12th house indicates multiple marriages.
  12. Retrograde Jupiter in the 7th with Mars and one of them in debilitation.
  13. Venus, Saturn, the Moon and Mars in the 7th house is responsible for multiple marriages. 
  14. Saturn + Rahu placed in 7th house without having any beneficial aspect indicates remarriage. 
Venus
  1. Venus falling in Dual sign
  2. Venus occupies a sign of depression or aspected by another malefic indicates two marriages.
  3. Venus placed in the sign of debilitation in birth chart /navmansha chart and conjoin by malefic/s in birth chart 
  4. Venus and lord of 7th house falling in dual or common signs in birth chart/ navmansha   indicates two spouses.
  5. Venus in the 7th in a moveable sign in birth chart  or in navmansha chart . 
  6. Venus falling in even sign and lord of that house placed in exaltation sign indicates remarriage.
  7. Venus in Cancer and the Moon in the 7th indicates remarriage.
11th house/lord
  1. More than two planets placed in 11th house increase the chances of second marriage

Other combinations
  1. 2nd and 7th house heavily afflicted by malefic planet/s and Mars placed in 7th house and Saturn placed in 8th house indicates possibility of two marriages.  
  2. Lord of 6th/8th house placed in 7th house/ascendant and heavily influenced by malefic/s indicates severe sickness or death of first wife.
  3. Saturn and Mercury conjunction in 7th house and two or more planets placed in 11th house indicate two marriages.
  4. Lord of ascendant placed in 8th house and Saturn posited in 12th house indicates multiple marriage.
  5. Lord of ascendant placed in 8th house and 2nd and 7th house/lords are in affliction indicates more than one marriage.
  6. Lords of 2nd and 12th house conjoined in 3rd house and aspected by Jupiter/lord of 9th house, the native will have many spouses.
  7. 7th and 8th house occupied  by malefic planet/s having bad aspects and Mars placed in 12th house increases the opportunity for second marriage.
  8. In female horoscope if Saturn is occupying 7th house Sun is placed in trine and Jupiter conjunct /aspect Moon in 12th house and 4th and 12th house are in heavily affliction indicates chances of remarriage.
  9. Leo as Ascendant and the 7th lord in the 9th with lord there of
  10.  Aquarius as Ascendant and the Sun in the 9th associated with the lord of the 8th
  11.  Libra as Ascendant and Mars in As­cendant and Jupiter in the 7th or aspecting the 7th
  12.  Virgo as Ascendant and the 7th lord associated with the Sun—Venus aspected by Saturn and Rahu in the 3rd
  13.  Pisces as Ascendant, lord of the 7th with the Sun in the 2nd, Venus and Rahu in the 4th, the Moon in the 9th
  14.  Cancer as Ascendant, Saturn in the8th, Mars in the 4th, Saturn in the 7th from Venus
  15. Taurus as Ascendant Saturn in the 8th the 7th lord in debilitation the Sun in the 2nd
  When will second marriage take place?
  1. Second marriage takes place during the Mahadasha /Antardasha of lord of 3rd/9th house or planet/s related to 3rd/9th house/lord.

By
Geeta Jha

India 

Saturday, June 6, 2015

Difficult Childhood in Astrology


Child abuse can take several forms. There are four main types of abuse physical, sexual, psychological and neglect .

All types of child abuse and neglect leave lasting scars. The effects of abuse during childhood impact adulthood. An unexamined, buried, and suppressed past is never forgotten and often ends up being your present and future. It does not go away.

Astrological factors responsible for a difficult childhood

1st house/lord = basic personality, self identity, physical abuse of the body.
2nd house/lord= verbal abuse (vocal chords) 
3rd house/lord= speech (mental abuse), abused by elder sibling
4th house/lord = abused by mother, emotions, mental state
7th house/lord  = house of sex/partnership and marriage. (Sexual abuse)
8th house/lord= a  SEVERENESS of the 7th house. While 7th house indicates an abuse a few times a year, 8th is EVERYDAY abuse, also this house represents hidden secrets of life   
12th house/lord  = house of secrecy, bed/sex, closets.

 Astrological combinations responsible for child hood abuse  
  1. Mars {between 3-16 degree} in cancer sign posited in 1st/2nd/4th/7th/8th/12th indicates disturbed childhood.
  2. Mars {between 6-20 degree}   in sign Libra posited in 1st/2nd/4th/7th/8th/12th house indicates tough childhood.
  3. Mars {between 3-16 degree} in sign Scorpio posited in  1st/2nd/4th/7th/8th/12th house indicates tough childhood .
  4. Mars +Rahu in 1st/2nd/4th/7th/8th/12th house indicates severe abuse in childhood .
  5. Moon + Mars / Moon + Rahu in 1st/2nd/4th/7th/8th/12th house in Cancer/Libra / Scorpio sign indicates severe effect of abuse.
  6. Presence of3rd/6th/8th/12th lord in 4th house indicates the possibility of getting abused sexually.
  7. Presence of malefic planets [Saturn, Mras, Rahu, ketu and descending Moon] in 4th house either in retrogation , debilitation or as a  owner of malefic house indicate childhood abuse.
  8. In western astrology Mars-Pluto mutual aspect/square/conjunction  in a horoscope indicate sexual or violent exploitation in childhood .
  9. During Mahadasha or Antardasha period of Rahu and Venus running in childhood chances of occurring these types of incidents increase manifold   . The problem would become serious, if the Rahu and Venus are any way associated with the 3rd, 4th, 7th, 8th and 12th houses or house lords.


By
Geeta Jha


India