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Friday, April 21, 2017

क्या प्रातः काल हनुमान जी का नाम लेने से दिनभर भोजन नहीं मिलता है ?

श्रीरामचरितमानस के कथा -प्रसंगों पर अक्सर लोगों को नाना प्रकार  प्रकार की शंकाएं होती ही रहती हैं । रामचरितमानस एक दर्पण है जिसमें देखने  वाले को अपनी ही छवि दिखाई देती है ।एक विचारवान इंसान को ग्रन्थ में वर्णित किसी भी प्रसंग की टीका-टिप्पणी करने से पहले उसके ग्रंथकार के उद्देश्य , उस निश्चित घटना क्रम के काल,पात्र ,स्थान, प्रसंग और अभिप्राय को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए । अन्यथा उस प्रसंग के विषय में जो भी शंका होगी वह पाठक के निजी विचारों या भावों को ही व्यक्त करने वाली होगी । पूर्वाग्रहों से युक्त ऐसी अनर्गल शंकाएं  किसी भी महान ग्रन्थ की मूल भावना   को नष्ट कर सकती हैं ।

 

सुन्दरकाण्ड में एक ऐसा ही प्रसंग  है जिसमें हनुमान जी विभीषण को कहते हैं …"प्रात नाम जो लेई हमारा ता दिन ताहि न मिलै अहारा" 

कई  पाठक गण  अपने निज के भाव और पूर्वग्रहों से युक्त हो कर कहते हैं की इस प्रसंग में हनुमान जी ने स्वयं कहा है की प्रातःकाल उनका नाम लेने से उस जातक को दिन भर भोजन नहीं मिलता है । 

धर्म ग्रंथों के अनुसार हनुमान जी एकमात्र ऐसे देवता हैं जो सशरीर इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। हनुमान जी को संकट मोचन कहा गया है। हनुमान जी का नाम स्मरण करने मात्र से ही भक्तो के सारे संकट दूर हो जाते हैं।अब शंका यह होती है की स्वयं हनुमान जी ने अपने  मुख से यह क्यों कहा की जो जातक प्रातःकाल उनका नाम लेता है उसे दिन भर भोजन नहीं मिलता है । तब प्रातःकाल हनुमान चालीसा या  सुन्दरकाण्ड का पाठ करना  या हनुमान जी की पूजा करना निषिद्ध  होना चाहये ? 

आइये  अब थोड़ा सत्य जाने ।  यह प्रसंग सुन्दरकाण्ड का है जब लंका में प्रवेश करते ही विभीषण हनुमान संवाद होता है ।  सुंदरकांड श्रीरामचरितमानस का चौथा अध्याय है। यह श्रीरामचरितमानस का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला भाग है क्योंकि इसमें हनुमान जी के बल, बुद्धि, पराक्रम व शौर्य का वर्णन किया गया है। सुंदरकांड के पढऩे व सुनने से मन में एक अद्भुत ऊर्जा का संचार होता है। सुंदरकांड के हर दोहा, चौपाई व शब्द में गहन अध्यात्म छुपा है, जिससे मनुष्य जीवन की हर समस्या का सामना कर सकता है।

लंका प्रवेश में हनुमान एक अलग ढंग का घर देखते हैं जहाँ विभीषण का वास है -वे आश्चर्यचकित होते हैं कि राक्षसों के बीच यहाँ कौन से सज्जन का निवास हो सकता है 

हनुमान्‌-विभीषण संवाद

दोहा :
* रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई॥5॥
भावार्थ:-वह महल श्री रामजी के आयुध (धनुष-बाण) के चिह्नों से अंकित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन-नवीन तुलसी के वृक्ष-समूहों को देखकर कपिराज श्री हनुमान्‌जी हर्षित हुए॥5॥

चौपाई :
* लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥1॥
भावार्थ:-लंका तो राक्षसों के समूह का निवास स्थान है। यहाँ सज्जन (साधु पुरुष) का निवास कहाँ? हनुमान्‌जी मन में इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे॥1॥

* राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥2॥
भावार्थ:-उन्होंने (विभीषण ने) राम नाम का स्मरण (उच्चारण) किया। हनमान्‌जी ने उन्हें सज्जन जाना और हृदय में हर्षित हुए। (हनुमान्‌जी ने विचार किया कि) इनसे हठ करके (अपनी ओर से ही) परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती। (प्रत्युत लाभ ही होता है)॥2॥

* बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥3॥
भावार्थ:-ब्राह्मण का रूप धरकर हनुमान्‌जी ने उन्हें वचन सुनाए (पुकारा)। सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आए। प्रणाम करके कुशल पूछी (और कहा कि) हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा समझाकर कहिए॥3॥

* की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥ 
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥4॥
भावार्थ:-क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदय में अत्यंत प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनों से प्रेम करने वाले स्वयं श्री रामजी ही हैं जो मुझे बड़भागी बनाने (घर-बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आए हैं?॥4॥

दोहा :
* तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥6॥
भावार्थ:-तब हनुमान्‌जी ने श्री रामचंद्रजी की सारी कथा कहकर अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और श्री रामजी के गुण समूहों का स्मरण करके दोनों के मन (प्रेम और आनंद में) मग्न हो गए॥6॥

चौपाई :
* सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥1॥
भावार्थ:-(विभीषणजी ने कहा-) हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ जैसे दाँतों के बीच में बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुल के नाथ श्री रामचंद्रजी क्या कभी मुझ पर कृपा करेंगे?॥1॥

*तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥2॥
भावार्थ:-मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और न मन में श्री रामचंद्रजी के चरणकमलों में प्रेम ही है, परंतु हे हनुमान्‌! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्री रामजी की मुझ पर कृपा है, क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते॥2॥

* जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीति॥3॥
भावार्थ:-जब श्री रघुवीर ने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओर से) दर्शन दिए हैं। (हनुमान्‌जी ने कहा-) हे विभीषणजी! सुनिए, प्रभु की यही रीति है कि वे सेवक पर सदा ही प्रेम किया करते हैं॥3॥
* कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥

प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥4॥
भावार्थ:-भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? (जाति का) चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ, प्रातःकाल जो हम लोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥4॥

दोहा :
* अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥7॥
भावार्थ:-हे सखा! सुनिए, मैं ऐसा अधम हूँ, पर श्री रामचंद्रजी ने तो मुझ पर भी कृपा ही की है। भगवान्‌ के गुणों का स्मरण करके हनुमान्‌जी के दोनों नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया॥7॥

चौपाई :
* जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥1॥
भावार्थ:-जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्री रघुनाथजी) को भुलाकर (विषयों के पीछे) भटकते फिरते हैं, वे दुःखी क्यों न हों? इस प्रकार श्री रामजी के गुण समूहों को कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शांति प्राप्त की॥1॥
* पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥2॥
भावार्थ:-फिर विभीषणजी ने, श्री जानकीजी जिस प्रकार वहाँ (लंका में) रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमान्‌जी ने कहा- हे भाई सुनो, मैं जानकी माता को देखता चाहता हूँ॥2॥

विभीषण और हनुमान दोनों रामभक्त थे ।  कुशल क्षेम  पूछने के पश्चात जब उनमें संवाद होता है तब विभीषण कहते हैं की …  मैं तो जन्म से ही अभागा हूँ ...मेरा तो यह राक्षस का अधम शरीर ही है और मन में भी प्रभु के पद कमल के प्रति प्रीति नहीं उपजती, आज आप जैसे संत ह्रदय से भेंट हुयी है तो यह तो हरि की कृपा ही है । तब  हनुमान को यह भान हुआ कि विभीषण में अपने राक्षस रूप को को लेकर हीन भावना है ,  तो उन्होंने खुद अपना उदाहरण देकर उन्हें वाक् चातुर्य से संतुष्ट किया  ........ अब मैं ही कौन सा कुलीन हूँ विभीषण ? और एक  वानर  के रूप में मैं भी तो सब तरह से,तन मन से हीन ही हूँ ..और लोक श्रुति तो यह भी है कि अगर कोई सुबह हमारा नाम( वानर  का नाम)  ले ले तो उसे दिन भर आहार नहीं मिलेगा!

यहाँ हनुमान की प्रत्युत्पन्न बुद्धि और वाक् चातुर्य स्पष्ट दीखती  है ....विभीषण को हीन भावना से उबारने के लिए उन्होंने खुद अपने वानर   रूप का उदाहरण दिया और प्रकारांतर से यह कह गए कि अगर प्रभु राम की कृपा हो जाय तो तन मन योनि से कोई फर्क नहीं पड़ता  । प्रभु कृपा से अधम भी पुण्यात्मा बन जाय -मेरा ही देखिये जो कुछ भी मैं हूँ वह प्रभु कृपा से ही हूँ नहीं तो एक  वानर  की क्या औकात थी? "अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर" ...

अतः प्रातः काल परम  रामभक्त हनुमान जी स्मरण करना निषिद्ध नहीं है । हनुमान जी  साक्षात् रुद्रावतार होने के नाते श्रीरामोपासना के परमाचार्य है। इनकी कृपा बिना श्रीराम की उपासना में किसी को अन्तरंगता प्राप्त नहीं हो सकती। राम-भक्ति के तो यो भण्डारी एवं संरक्षक ठहरे।

गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज के कथनानुसार इनकी सेवा में कोई विशेष प्रयास करना नहीं पड़ता। ये गुणगान करने नमस्कार करने, स्मरण करने तथा नाम जपने मात्र से प्रसन्न होकर सेवकों का अभीष्ट हितसाधक सम्पन्न करने को सदैव तत्पर रहते हैं।

‘जिनके, हृदय में इनकी विकराल मूर्ति निवास कर लेती है, स्वप्न में भी उसकी छाया के पास भी संताप-पाप निकट नहीं आ सकते।’

 अतः प्रातः काल क्या किसी भी प्रहर एक क्षण भी श्री हनुमान के  नाम -भजन से विमुख नहीं होना चाहिए ।कालातीत अमर  हनुमान जी सदा  सब काल में वन्दनीय हैं । 

गीता झा 

Monday, June 24, 2013

विह्वल भक्त की शंका और भगवान का समाधान -केदारनाथ यात्रा [ एक अद्भुत संस्मरण]


जून 1 9 9 4 में दिल्ली से हम लोग एक बस पर बद्रीनाथ और केदारनाथ धामों की पर चले । बस पर कुल 2 8 यात्री थे । बस पहले केदारनाथ के मार्ग चली और गौरीकुंड जो सड़क मार्ग का अंतिम पड़ाव है पर रुक गई | सभी यात्री उतरकर गौरीकुंड में स्नान और जलपान कर केदारनाथ धाम की यात्रा पर चल पड़े ।


बहुत सारे यात्रियों ने गौरीकुंड से ही घोडा लिया और बाद में केवल दो जनों को छोड़ कर शेष सभी ने आधे रास्ते से घोड़े  की सवारी कर ली थी । दो में एक मैं और दूसरी मेरी धरमपत्नी थी जिन्होंने आग्रह किया था की शिवजी के धाम की पैदल ही यात्रा करेंगें । श्रद्धा के सामने मैं नतमस्तक था । दोनों की उम्र 5 0 से अधिक थी । सभी सह -यात्री घोड़ों पर आगे बड गए थे , फिर मैंने भी अपनी पत्नी की आस्था पर चोट पहुँचाना उचित नहीं समझा ।

दुर्गम चढ़ाई के कारण  हम दोनों काफी थक गए थे । बारिश भी हो रही थी । गुप्प अँधेरा था न कोई यात्री आगे दिखाई देता था और न ही कोई पीछे दिखाई देता था । हम दोनों दो या तीन मिनट से अधिक नहीं चल पा रहे थे । चलते चलते बैठ जाते फिर उठ कर आगे बड़ने की चेष्टा करते थे ।

धरमपत्नी का हाथ पकड़ा तो एक हाथ एकदम ठंडा तो दूसरा एकदम गर्म था । शिवजी का नाम लेते लेते 8 बजे रात में हम लोग केदारनाथ धाम पहुंचे ।


वहां हमारे सभी सह-यात्री भोजन कर रहे थे और हम दोनों के लिए चिंतित थे । बारिश में हमदोनो बिलकुल भींग चुके थे । कमरे में पहुँच कर हमने अपने अपने कपडे बदले । मुझे बुखार चढ़ चूका था , मैं भोजन के लिए नहीं जा सका तो मेरी धरमपतनी ने भी उपवास रख लिया था । रात मैं मेरी तबियत चिंताजनक हो गई थी तभी सुनने मैं आया की हम लोगों का ग्रुप लीडर जो अभी अभी अपने नौकरी से रिटायर किया था भोजन करते करते सबसे बातें करते करते अचानक गिर कर बेहोश हो गया था ।


कुछ घंटों के बाद खबर आई की डॉक्टर हमारे लीडर को बचा नहीं सकी और हार्ट -अटैक के कारण वे चल बसे । उनके साथ उनकी पत्नी और बूढ़ी माँ भी थी । उन दोनों ने आग्रह किया की शव को दिल्ली ले जाया जाये  । और यह निश्चय हुआ की सभी प्रातः 6 बजे केदारनाथ धाम छोड़ देंगें ।

मैं प्रातःकाल उठा तो मेरा बुखार उतर चूका था । कमरे से बाहर आया तो देखा धरमपत्नी इतनी ठंडी में सड़क के नल से ठंडे पानी से स्नान कर रही थी । गौरीकुंड से हमलोंगो के साथ एक पंडा भी आया था । उनको देख कर मैंने कहा की  "शिवजी का दर्शन नहीं हो सकता है क्या ? " यह सुनते ही पंडा बहुत बिगड़ गया और बोला   “हम लोग तो शव को दिल्ली भेजने के प्रबंध में लगे हुए हैं और अगर अभी आप लोग दर्शन की पंक्ति में भी बैठ जाते हो तो भी आपकी बारी तो 2 बजे से पहले नहीं आएगी । और फिर आप सभी को अभी एक घन्टे में यहाँ से रवाना भी होना है । "


पंडा ठीक ही बोल रहा था । मैंने सोचा की केदारनाथ मंदिर के द्वार पर ही माथा टेक  आऊं । मंदिर गया तो वह अभी खुला भी नही था । दर्शनार्थी सर्प की कुंडली के आकर में सटे सटे बैठे थे । द्वार तक जाना भी संभव नहीं था , क्योंकि दर्शनार्थी की कई कई पंक्तियाँ बैठी हुई थी । खड़े खड़े हाथ जोड़ कर शिव जी को प्रणाम किया और लौट चला ।


मंदिर के प्रांगण से उतरा ही था की देखा मेरी धरमपत्नी स्नान कर  शिवजी  के लिए घर से जो यज्ञोपवित, अगरबत्ती और अन्य पूजन-सामग्री लाइ थी हाथ में लेकर शिव जी का जप करते करते आ रही थी । मैंने जो कुछ देखा उसे बता दिया और कहा की केदारनाथ दर्शन तो असम्भव है |  


मेरे कथन की कोई भी प्रतिक्रिया उसके ऊपर नहीं हुई । मंदिर के प्रांगण में पहुंचकर वह एक कोने में खड़े होकर अचानक विह्वल होकर रोने लगी और कहने लगी  " बाबा !!! क्या हम लोग इतने पापी हैं की यहाँ तक पहुँच कर बिना आपके दर्शन किये लौट जायेंगें ? "


सामने से एक दस-बारह वर्ष का लड़का आया । मुझे लगा की वह मंदिर का ही कोई कर्मचारी होगा । दिल्ली से चलते समय मित्रों और सम्बन्धियों ने शिवजी के चढ़ावे के रूप में रूपए दिए थे । मैंने सारे रूपए और पत्नी के हाथों में जो पूजा की सामग्री थे लेकर उस लड़के को देते हुए कहा की " हम लोग दिल्ली से आये हैं , हम लोगों के ग्रुप-लीडर की गत रात मृत्यु हो चुकी है, कृपया सामग्री और रूपए आप अपनी सुविधानुसार बाबा को चढ़ा देना , क्योकि हम लोगों को अभी तुरंत वापस लौटना है । "



उस लड़के ने सामान नही लिया और कहा आप लोग सीधे मेरे साथ नीचे   आइये । वह हमें मंदिर कमिटी के सदस्य के पास ले गया । सदस्य ने कहा की आप लोग दर्शन नहीं कर सकते हैं क्योकि  " छुतक " हो गया है । मैंने उन्हें कहा की मैं बिहार का मैथिल ब्राह्मण हूँ और जिनकी मृत्यु हुई है वे पंजाबी खत्री थे , इसलिए छुतक लागू नहीं होता है ।

सदस्य ने हम दोनों को 5 मिनट रुकने के लिए कहा और फिर हम दोनों को को लेकर चला । इसी बीच उस बालक ने शिवजी को चढ़ाने के लिए प्रसाद की व्यवस्था कर दी थी । दर्शनार्थी के सरों को टापते हुए हम लोग जा रहे थे ।


मुख्य द्वार अभी तक नहीं खुला था । एक दुसरे द्वार के समीप हमें कमिटी का सदस्य ले गया , धरमपत्नी तो मंदिर के अन्दर प्रविष्ट कर गई लेकिन वह मेरा हाथ मजुबुती से पकड़ी हुई थी । मुझे द्वार पर पंडों ने रोक लिया था । लेकिन धरमपत्नी के हाथ पकडे रहने के कारण  मुझे भी उन लोगों को अन्दर जाने देना पड़ा ।


मंदिर के अन्दर जाने पर देखा तो पाया की एक पंक्ति में करीब 5 0 भक्त थालियों में धूप -दीप , पूजन सामग्री लेकर खड़े हुए थे । वे सब शायद VIP लोग या मोटी  रकम दान  में दिए लोग थे । सभी पूजा प्रारंभ होने पर अपनी अपनी बारी  का इन्तजार कर रहे थे ।


पत्नी उस पंक्ति में न लग कर उनके लौटने वाले रास्ते से आगे बढ़ गई और सीधे पुजारी जी  के पास जाकर बैठ गई । जो इन VIP लोगों के लिए पूजा प्रारंभ करवाने वाले थे । वहां केवल ॐ नमः शिवाय का जाप चल रहा था । मन्त्र छोड़ कर कोई कुछ भी नही बोल रहा था  ।


पत्नी ने एक -एक कर यज्ञोपवित, अगरबत्ती  और अन्य पूजन सामग्री बाबा को श्रद्धा भाव से अर्पित किया । शिव जी के शरीर से चन्दन लेकर उन्होंने हम दोनों के माथे पर टीका  लगाया । दोनों शिव जी का भाव -विभोर होकर दर्शन कर रहे थे ।


कोई हमें कुछ नहीं कह रहा था .... कि हम लोग वहां से हट जाएँ , क्योकि पंक्ति में खड़े लोग जिनके लिए अभी पूजा प्रारंभ करनी थी शायद यही सोच रहे थे की यह जोड़ा बिना पंक्ति का सर्व प्रथम पूजा का अधिकारी बना है अवश्य ही कोई ख्याति प्राप्त VVIP होगा ।


फिर आपने आप हम दोनों उठे और वापस लौटे । हमारे  साथ के सभी सह-यात्री लौट चुके थे । ऐसे दर्शन का लाभ तो बिरलों को भी नसीब होता है ।

हम दोनों ने भी घोड़ों की सवारी की और अति शीघ्र गौरीकुंड पहुँचकर  उसी बस से वापस दिल्ली लौट आये ।


मैंने अपनी धरमपत्नी से पूछा की वह मंदिर के अन्दर पंक्ति में क्यों नहीं लगी थी , तो उसने जबाब दिया की विह्वल होकर शंका करने के बाद उसे कुछ भी होश नहीं था ।और शंका का समाधान कर मदिर के द्वार से न लौटाने वाला वह बालक शिवजी को छोड़ कर दूसरा कोई नही हो सकता |  शिव के दर्शन करने के   बाद ही उसकी चेतना पुनः जागृत हुई ।

अपनी धरमपत्नी की श्रद्धा और विश्वास के समक्ष मैं नतमस्तक था ।


द्वारा

जनमेजय मिश्र