Wednesday, December 31, 2014

ज्योतिष में आध्यात्मिक -धार्मिक योग

यदि पूर्ण बली चन्द्रमा केंद्र में हों और उस ऊपर बृहस्पति या शुक्र की दृष्टि पड़ती हो तो जातक आध्यात्मिक  वृति का होता है ।

यदि दशम स्थान पर मीन राशि में बुद्ध या मंगल स्थित हो तो जातक ईश्वरानुरागी होता है और अंत में उसे मुक्ति मिलती है ।

यदि नवम भाव का स्वामी बली हो और उस पर   बृहस्पति  या शुक्र की दृष्टि या  युति  हो तो  जातक जप,ध्यान, समाधि में रूचि रखने वाला होता है ।

दशम भाव का स्वामी नवम भाव में हो और बली  नवम भाव के स्वामी पर बृहस्पति  या शुक्र की दृष्टि या  युति  हो जातक जप और ध्यान करने वाला  होता है ।

दशमेश शुभ हो, दशमेश दो शुभ ग्रहों के मध्य हो,या दशमेश शुभ ग्रह के नवमांश में हो जातक अध्यात्म के क्षेत्र में उज्जवल कीर्ति को प्राप्त करता है ।

दशमेश  शुभ ग्रह हो या उच्च या स्वगृही अथवा  मित्रगृही हो तो जातक उत्तम आध्यत्मिक जीवन जीने वाला होता है और उसका जीवन निष्कलंकित होता है ।

लग्नेश दशम स्थान में हो और दशमेश नवम स्थान में हो और दसमेश  पर पापग्रह की दृष्टि न हो पर शुभग्रह की दृष्टि हो और दशमेश  शुभ ग्रह के नवमांश हो परन्तु स्वयं दशमेश  पाप ग्रह  न हो तो जातक यज्ञ , होम आदि कर्मकांड  करने वाला होता है ।

द्वारा
गीता झा



Tuesday, December 30, 2014

ज्योतिष में सन्यास योग


यदि जन्म -कुंडली में चार, पांच, छह या सात ग्रह एकत्रित होकर किसी स्थान में बैठे हों तो जातक प्रायः सन्यासी होता है । परन्तु ग्रहों  के साथ बैठने से ही सन्यासी योग नहीं होता है वरन  उन ग्रहों में एक ग्रह  का बली होना भी आवश्यक है । यदि बली ग्रह अस्त हो तो भी ऐसा जातक सन्यासी नहीं होता है । वह केवल किसी विरक्त या सन्यासी का अनुयायी होता है । यदि बली ग्रह किसी ग्रह-युद्ध में पराजित होता है या अशुभ ग्रहों की दृष्टि में होता है तो ऐसा जातक सन्यासी बनने  का इच्छुक  तो होता है लेकिन उसे दीक्षा नहीं मिलती है । 

यदि सन्यास प्रदान करने वाला बली ग्रह युति के अंतर्गत  ग्रह युद्ध में हार गया हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक सन्यास ग्रहण कर उसे छोड़ देता है । ग्रहों की युति में यदि  कोई ग्रह दसम भाव का अधिपति होता है तो  भी सन्यास-योग बनता है ।

सन्यास -योग के लिए मूल रूप से निम्न तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए

  1. चार या चार से अधिक ग्रहों का एक स्थान पर बैठना ।
  2. उनमें से किसी एक ग्रह का बली  होना ।
  3. बली ग्रह का अस्त न होना ।
  4. हारे हुए बली ग्रह पर अन्य ग्रह की दृष्टि न पड़ती हो ।
  5. उन ग्रहों में से कोई दशमाधिपति हो ।


यदि सूर्य सन्यासी-ग्रह हो तो जातक वानप्रस्थ, अग्नि को  पूजने वाला, पर्वत या नदी के किनारे रहने वाला, सूर्य, शक्ति का उपासक होता है ।

यदि चन्द्रमा सन्यासी-ग्रह हो तो जातक के शैव होने की सम्भावना होती है, वह गुरु का अनुशरण करने वाला होता है  ।

मंगल के सन्यास-ग्रह होने पर जातक लाल वस्त्र धारी सन्यासी होता है , शाक्य , भिक्षावृति कर गुजारा करने वाला होता है ।

बुद्ध यदि सन्यास-ग्रह होता है तो जीवक विष्णु भक्त हो सकता है , तांत्रिक क्रियाओं का प्रदर्शन कर आजीवका कमाने वाला  हो सकता है , बोलने की कला में निपुर्ण होता है  ।

बृहस्पति यदि सन्यास-ग्रह हो तो जातक  भिक्षु, तपस्वी, धर्मशास्त्रों का ज्ञाता , यज्ञ यादि कर्मकांडों को करने वाला होता है ।

शुक्र के सन्यास-ग्रह होने पर जातक भ्रमण करने वाला , वैष्णव , व्रत करने वाला  होता है । यदि शुक्र का सम्बन्ध पंचम, नवम या दशम भाव से हो तो जातक आध्यात्म  से प्रसिद्धि या धन पाने का  अभिलाषी होता है ।

शनि यदि सन्यास-ग्रह होता है तो जातक कठोर-तपस्या करने  वाला , दिगंबर , निर्ग्रंथी होता है । 
  
द्वारा
गीता झा