Tuesday, December 1, 2015

स्वस्थ दाँत और सुंदर मुस्कान

 शालिनी  और रेखा [ परिवर्तित  नाम : ) ]  मेरे बचपन की सखियाँ हैं और दिल्ली में रहती हैं । अक्सर लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के माध्यम से उन लोगों से विचारों का आदान प्रदान होता  रहता है । कुछ एक दिन पहले दोनों ने मुझे बताया की उन दोनों ने डेंटिस्ट से अपॉइंटमेंट ली है शालिनी को ब्रश करते समय मसूड़े से खून आता था और रेखा के दांतों में काफी टार्टर और plaque जमा  हुआ था  जिससे उसकी हंसी  में चार चाँद नहीं लग पाते थे । आजकल तो दिल्ली में प्रदूषण और खराब पानी की वजह से काफी छोटी उम्र में डेंटिस्ट के चक्कर लगने शुरू हो जाते हैं । दिल्ली में कई इलाकों में सप्लाई या अंडर ग्राउंड वाटर  का TDS [Total Dissolved Solids ] 1000mg/L  से अधिक रहता है जबकि इसकी अधिकतम सेफ लिमिट BIS [The Bureau of Indian Standards ] के अनुसार 500 ppm से अधिक नहीं  होनी चाहिए । TDS में कैल्शियम, फॉस्फेट , नाइट्रेट्स ,सोडियम ,पोटैशियम ,क्लोराइड ,आयरन के अतिरिक्त मिट्टी के कण भी पाये जाते हैं ।

पीने योग्य और खाना पकाने  योग्य पानी तो RO फ़िल्टर से उपलब्ध हो जाता है लेकिन मुंह धोने के लिए अक्सर नल का पानी  ही प्रयोग में लाया जाता है । पहले जब हम लोग छोटे थे तो घर  में साधरण टूथ पेस्ट या मंजन के आलावा नमक और  सरसों के तेल से भी दांतों   को साफ करने लिए के लिए प्रेरित किया जाता था इससे दांत और मसूड़े दोनों स्वस्थ  रहते थे ।

खैर हमने अपनी सखियों के कहा की दांतों को सुपर वाइट बनाने वाले तथाकथित ब्लीच युक्त टूथपेस्ट [ जैसे सोनम कपूर का एक टूथपेस्ट का  विज्ञापन जिसमें उसके दांत अननैचरल  वाइट लगते हैं ]  के साथ साथ डेंटिस्ट से 4-5  सिटींग में दांतों की स्केलिंग, प्रोफेशनल क्लीनिंग या ओरल प्रोफिलैक्सिस  करवाने से पहले यदि वो  इस कारगार नुख्से को अपना सकती है तो  न केवल उन्हें  अपनी अपनी समस्याओं  से निज़ात ही मिलेगी बल्कि  डेंटिस्ट के पीड़ादायक उपचारों  से मुक्ति भी मिलेगी ।

इसमें जरुरत है मात्र 

 एक चुटकी भर  ...... Eno की   

Eno पाउडर के प्रति 5  ग्राम के सेशे में

2. 32 ग्राम सोडिम बई कार्बोनेट (46% बेकिंग सोडा )
2. 18 ग्राम सिट्रिक एसिड  (44% )
0. 50 ग्राम अनहयड्रोस सोडियम कार्बोनेट ( 10%  सोडा एश )
 होता है ।
Eno पेट की एसिडिटी कम करने के साथ साथ बेकरी में बहुलता से प्रयोग में लाया जाता है ।

विधि

अपनी एक हथेली पर चुटकी भर Eno ले फिर उस पर 1-2  बूंदें साफ़  पानी की डाल लें इससे उसमें झाग उठने  लगेगा  और फिर अपने टूथब्रश  पर कोई भी रेगुलर टूथपेस्ट लगा लें फिर उस झाग युक्त Eno से अच्छी तरह मिला लें फिर  उस मिश्रण से दांतों और  मसूड़ों को अच्छी  तरह से धीमे धीमे ब्रश करें । ऊपर के दांतों को  ऊपर से नीचे की दिशा में और  नीचे के दांतों को नीचे  से ऊपर की दिशा में ब्रश करें साथ ही  मसूंडों  पर भी बिलकुल हल्के हाथ से  सर्कुलर मोशन में ब्रश करें । इसके बाद  अच्छी तरह से कुल्ला करके टंग क्लीनर से जीभ साफ़ कर लें ।

मैंने उन्हें कहा की दांतों की नियमित सफाई करने के साथ साथ वे हफ्ते में 2 बार ही Eno वाला प्रयोग करें  फिर  दो हफ़्तों के बाद हफ्ते में एक बार ही यह प्रयोग करें । ऐसा  नियमित करने से  उनके दांत और मसूड़े दोनों   स्वस्थ रहेंगें ।

अभी तक मेरी सखियों ने केवल दो बार ही इस विधि का प्रयोग किया और उन्हें काफी अंशों में अपनी अपनी समस्या से मुक्ति मिल गई है ।

केवल यह धयान रखें की इस विधि का बहुलता से प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि Eno में उपस्थित तत्व ओर्थोडोंटिक ग्लू को गला  सकते हैं इसलिए जिन्हें  braces  लगे हों या दाँतों में फिलिंग को उन्हें इस प्रयोग से बचना चाहिए ।

“Keep smiling, because life is a beautiful thing and there's so much to smile about.”

By 
Vandana Tiwari 



Wednesday, October 7, 2015

Astrology of Acquisition of Wealth by Inheritance


There are various ways for acquisition of wealth and one of them is There are various ways for acquisition of wealth and one of them is acquisition of wealth by inheritance, as is known to all, refers to acquisition of property, both movable and in movable after the death of the parents or other personal relations who may have made the native as his legal hair.

Astrological factors  responsible for acquisition of wealth by inheritance

Ascendant: the first personality traits you exhibit  

2nd house/ lord: savings and accumulation of wealth, family wealth
8th house/ lord: legacies, gifts, unearned wealth, hidden wealth and secret wealth
9th house/lord: luck,wisdom
11 house/ lord: earned income  
 Jupiter:  representative of wealth/ treasury, brings abundance and ease
Venus: natural significator of prosperity, brings pleasure and comfort

Different combinations for parental wealth

2nd house

  1. Placement of an exalted planet in the 2nd house is favorable for the acquisition of parental wealth.
  2. Lord of 2nd house is fully aspected by the lord of 9th house
  3. Ketu placed alone in2nd house.
  4. Lords of the 4th, 9th and 11th house placed in the 2nd house.
  5. Lord of 11th house is placed alone in the 2nd house.
  6. Lord of 2nd house is exalted and placed in 11th house.
  7. Lord of nd house is exalted in 9th house.
  8. Lords of2nd and 9th house combined in 5th house.
  9. There will be an acquisition of lands, cars, houses and financial advantages if the 2nd lord is in the 4th house with 4th Lord. Such persons may also inherit prosperity from mother or maternal grandparents.
  10. If the lord of the 2nd house is connected with 7th house/ lord and is placed in Ascendant, native will get the inheritance of his wife.


8th house:

  1. The Sun and the Mercury in the 8th house cause tremendous gains through inheritance, financial prosperity, and eminence in the life of a native. 
  2. Benefics in 8th house.
  3. Rahu in 8th house often brings substantial inheritance

Jupiter:

  1. Jupiter in Cancer/Sagittarius/ Pisces sign or in own/exalted sign is very good for the prosperity of the native.
  2. Jupiter and Venus in exaltation or in the ascendant promote prosperity.
  3. Jupiter’s good aspect to Moon or 2nd house /lord is good for the financial status of the native.
  4.  Transit of Jupiter in the 8th house is capable of giving sudden gain of money and property, also trust-money apart from unexpected inheritance if the Jupiter in the natal chart is powerful supported by other good yogas.

Other combinations

  1. Inheritance from family should be judged  on the basis of 4th ,5th  8th  house/lord
  2. Lords of 9th and 11th house combined in horoscope.
  3. The Sun in 9th house is capable of giving much inherited property.
  4.  Venus in 12th house makes the native wealthy though of questionable character.
  5. Venus in 6th house also produces weath yoga if it is not the lord of 2nd house.

BY
GEETA JHA




Monday, August 10, 2015

कैसे जाने की कुंडली में प्रेम विवाह है की नहीं ?

भारत में विवाह को एक पवित्र धार्मिक और सामजिक संस्कार माना जाता है । षोडश संस्कारों में से यह एक अनिवार्य संस्कार है । जाति , धर्म, भाषा ,देश ,आर्थिक स्तर  और कुटुंब की अनदेखी कर किये जाने वाले गन्धर्व विवाह या प्रेम विवाह के संकेत जातक की कुंडली में भी मिलते हैं  । 

कुंडली में प्रेम विवाह के योग 
  1. लग्नेश एवं सप्तमेश का स्थान परिवर्तन या युति होना प्रेम विवाह का कारण  बनता है । 
  2.  पंचम भाव एवं सप्तम भाव प्रेम विवाह में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं । पंचमेश एवं सप्तमेश की युति पंचम  या सप्तम भाव में होना या दोनों का राशि परिवर्तन करना या पंचमेश और  सप्तमेश में दृष्टि सम्बन्ध होना प्रेम - विवाह का  कारण बनता है । 
  3. गुरु और शुक्र दाम्पत्य जीवन में पति और पत्नी के कारक ग्रह हैं । लड़कियों के जन्मपत्री में  गुरु  का पाप प्रभाव  में होना और पुरुष की कुंडली में शुक्र  ग्रह का पाप   प्रभाव   में होना  प्रेम - विवाह  की सम्भावना को बढ़ाता है । 
  4. लग्नेश एवं  पंचमेश की युति या दृष्ट सम्बन्ध या राशि परिवर्तन प्रेम विवाह योग को उत्पन्न करता है । 
  5. राहु का लग्न / सप्तम भाव में बैठना और सप्तम भाव पर गुरु का कोई प्रभाव न होना प्रेम विवाह का कारण बन सकता है । 
  6. नवम भाव में धनु/मीन राशि हो और शनि/राहू की दृष्टि सातवें भाव, नवम भाव और गुरु पर हो तो प्रेम विवाह होता    है ।
  7. सातवें भाव में राहु + मंगल हों ।
  8. राहु + मंगल + सप्तमेश तीनों   वृष /तुला राशि  में हो तो प्रेम -विवाह का   योग बनता है । 
  9. जन्मलग्न ,सूर्यलग्न और   चन्द्रलग्न में दूसरे भाव और उसके   स्वामी  का सम्बन्ध मंगल से हो तो भी प्रेम विवाह   होता है ।
  10. कुंडली  का दूसरा भाव पाप प्रभाव  में हो या उसका स्वामी शुक्र, राहु शनि के साथ  बैठा हो  और सप्तमेश का सम्बन्ध शुक्र ,चन्द्र एवं लग्न से हो  ।
  11. जन्म लग्न या चन्द्र लग्न में  शुक्र का पांचवे / नवें भाव में बैठना प्रेम  विवाह का  कारण बनता है ।
  12. लग्न  में लग्नेश +चन्द्रमा हो  तो प्रेम विवाह होता  है या सप्तम में सप्तमेश + चन्द्रमा  हो तो भी प्रेम -  विवाह हो सकता है  । 
द्वारा 
गीता झा

Monday, July 27, 2015

Huna's Top-Secret Vault of Mystic Kahuna Power

The word HUNA means secret in Hawaiian. It refers to a body of knowledge that has its origins in antiquity. In many ways it is a mystery school. The body of information we call HUNA was not openly discussed and it was appararently never written down. The techniques were passed from initiate to initiate for thousands of generations. The initiates were called KAHUNA [keeper of secrets]. KAHUNA possess the divine power to perform miracles but they also possessed an incredible esoteric knowledge.


HUNA is a system of mind, body, spirit integration and healing. In HUNA psychology there are three selves in one man. The three selves of HUNA are the lower self, the middle self, the higher self. They are so called because of their psychical locations. The lower-self is located in that area of body known as "SOLAR PLEXUS''. The middle-self is located in the head and the higher-self is situated at about five feet above the head.



The Lower-self is equated to subconscious mind, middle self is commonly referred to conscious mind, whereas Higher-self is used for super conscious minds. The Middle-self is our awakened conscious mind that is part of us which we are mostly aware and by which we reason, think and make decisions. The Lower-self is the sea of feeling and emotions. The Lower-self can be commanded and instructed to do things by middle self.

The Higher-self is the spiritual part of man being the most enlighten part of his nature. It is located five feet above the body and connected to right side of head by means of a silver cord. The Higher-self is so close to us actually longs to help us through our difficulties. It has power to solve them in a very definite manner, if only we would seek its help. It is a curious fact that high self never intervene in one's affair unless its help is specifically asked for.

You have to learn to communicate with your Higher-self and a new life of unlimited happiness, love and accomplishment can be yours. The three selves are connected by means of an invisible cord which KAHUNA called AKA-CORD.

Nothing alive exits without life force energy when someone died he stopped breathing. Hence breath or "Mana" becomes the symbol of life force energy.

KAHUNA reorganizes the vital importance of PRANIC energy in performing miracles. The PRANA is the substance with which we want to accomplish some objectives for us. The PRANA is breathed in by the conscious Middle-self and is sent up to Higher-self. The Middle-self takes the PRANA then the Lower-self converts it and Higher-self uses it.



HUNA RITUAL OUTLINED: Click for Huna Video 


  1. Sit comfortably with closed eyes. Take 7 or 8 deep breaths. Completely aware of vital prana entering your body
  2. Now visualise the absorbed prana being converting into a very high voltage silver white ball in your solar plexus.
  3. Now see a tremendous flow of white light surging up out of your solar plexus. Like an active volcano erupting thousands of volts of shattering spiritual electricity.
  4. As this light shoots out of your head see it widen into a ball of about four or five feet diameter.
  5. You are now making contact with Higher-self.
  6. Now without hesitation see within this circle of light that you seek as being already accomplished. Believe that it is already yours.
  7. Now feel totally and completely that your goal is already accomplished. Believe that it is already on its way to you.
  8. Now thank your Higher-self for accomplishing your will.
  9. You should aim to perform the ritual every day until your goal is completely achieved.
  10. Do not despair if nothing happened after a few weeks .Your higher self will never let you down.
  11. Trust in it completely. It will answer your dreams.

By
Geeta Jha
India

Wednesday, July 1, 2015

Service or Job Transfer in Astrology



Transfer of a government servant or private employee affects the person physically, mentally and financially.

Whether minor or major change it influences one’s normal working. These transfers some times are undesirable, but in some cases they are profitable .In some cases transfer are optional and avoidable , but in some cases they are inevitable. 

Factors responsible for job transfer

Sun ---planet of power and authority
Saturn ---obstacles
Mars ---sudden events of life
Ascendant ---denotes personality and environment  
2nd house/lord---house of wealth, financial gain and resources 
3rd house/lord ---short journey
4th house/lord---change of residence
6th house/lord ---authority, current job 
8th house/lord ---obstacles, some break, being fired
9th house/lord ----significator of transfer, long journey, change of job (12th to 10th house)
10th house/lord---indicator of job
12th house --- release, shifting from one house to another, transfer from one place to another

Astrological combinations for job transfer

  1. 10th lord in 12th denotes jobless or frequently changing Job situation 
  2. Affliction to 4th house the transfer may cause separation from family.
  3. Saturn afflicting Sun denotes loss of prestige, respect, status and scandals involving immediate transfer.
  4. Saturn influencing ascendant/4th/7th/10th house indicates stability and confinement to a place for years together.
  5. If ascendant and the 10th house form any relation with the 9th and 3rd house, then the transfer takes place.
  6. If the relations between the 12th house and 9th house and lord of 10th house and lord of 9th house are formed, then the person gets success in the foreign country.
  7. If the relation between the 10th house and 12th house is formed, then the person gets success in the foreign country according to his deeds.
  8. Transfer with promotion is possible if the 7th house is influenced by the significators  of 3rd, 10th and 12th .
  9. Transfer without any change in residence  if   10th house/lord is influenced by the significators of the 3rd, 10th, and 12th.
  10. Transfer involves change in residence if 4th house/lord is influenced by the significators of the 3rd, 10th, and 12th.
  11. Transfer is pleasurable if the ascendant is influenced by the significators of the 3rd, 10th, and 12th.
  12. Transfer brings financial gains if 2nd/11th house are influenced by the significators of the 3rd, 10th, and 12th.
  13. Transfer gaining authority in service is possible if 6th house is influenced by the significators of the 3rd, 10th, and 12th.


Timing of job transfer

  1. Double transit of Jupiter and Saturn in horoscope influencing 3rd/6th/12th house from ascendant /Moon indicates transfer.
  2. During Mahadasha and Antardasha of ascendant /4th/7th/10th house there is possibility of job transfer.
  3. Native will get transfer from present place to another during the joint period of significators of 3rd, 10th and 12th lord.
  4. Mars transiting over ascendant/4th/7th/10th house creates the possible changes against the will and wish of the person.
  5. Lord of 10th house transiting over 6th house the native will get the blame followed by transfer order.
  6. Lord of 10th house transiting over 8th house the native will face difficulties from the place of transfer.
  7. Lord of 10th house transiting over 12th house then the transfer takes place in far away places.
  8. In natal chart if Sun or Mars is placed in the ascendant /4th/7th/10th house then the Mars transiting over these houses brings abrupt transfers.
  9. If ascendant and the 10th  house forms any relation with the 9th and 3rd house during the periods of Mahadasha and Antardasha or during the transits then the transfer takes place


By
Geeta Jha
India




Wednesday, June 24, 2015

ज्योतिष में अपरमित आयु {Immeasurable Age in Astrology}


भारत के  प्राचीन ग्रंथों में अनेकानेक प्रमाण  मिलते हैं की कई लोग सैकड़ों या  हज़ारों वर्षों  तक जीते हैं  । वर्तमान में भी बहुतेरे लोगों का पता चलता है जो 100 से 300 साल तक जीवित रहे थे । सिद्धियों और योग के बल पर उम्र को अपने वश में करने के लिए विख्यात देवरहा बाबा विश्वप्रसिद्ध थे । कहा जाता है की उनकी आयु ढाई सौ से पांच सौ के बीच थी । देवराह बाबा के अलावा  तैलंग स्वामी भी एक उच्च कोटि के योगी थे जिनकी आयु  का अनुमान 300 साल  के आस पास लगाया जाता है ।हिमालय में निवास करने वाले महावतार बाबा की के विषय में कहा  जाता है की उनकी आयु 2 ,000 वर्ष से भी अधिक है । अभी भी कई साधकों और योगियों ने महावतार बाबा जी के दर्शन किये हैं उनके अनुसार बाबा जी अभी भी 25 वर्ष के नवयुवक योगी के भांति दिखते हैं ।

हमारे धर्म ग्रंथों में कुल आठ ऐसे लोगों के बारे में जानकारी मिलती है जो अमर हैं | भगवान परशुराम ,कृपाचार्य ,मार्कण्डेय ,हनुमानजी,राजा बलि, विभीषण ,वेद-व्यास , अश्वत्थामा आठ अमर चिरंजीव माने जाते हैं  जिनकी अपरमित आयु मानी जाती है ।

ज्योतिष में   अपरमित आयु के योग
  1. यदि कुम्भ लग्न हो और उसमें सूर्य बैठा हो और गुरु  2 /12 वें भाव में स्थित हो तो जातक उच्च कोटि  का योगी होता है और योगाभ्यास या रसायन विद्या के बल पर हज़ार वर्ष तक जीता है ।
  2. सिंह लग्न में गुरु कर्क राशि में स्थित हो ,बुद्ध कन्या राशि में और पाप ग्रह 3 ,4 ,5,6 और 11वें भाव में स्थित हो तो जातक हज़ार वर्ष तक जीता है ।
  3. कुंडली में लग्न से प्रारम्भ करके यदि पहला ग्रह शनि हो और अंतिम ग्रह मंगल हो तो जातक अमर होता  है  । जबकि सभी ग्रह शनि और मंगल के अंतर्गत हो तो जातक उच्च कोटि का योगी होता है लेकिन इस योग में  से आयु के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है जैसे नरसिंह भारती ,विवेकानंद, अरविन्द घोष ।
  4. शुक्ल पक्ष का जन्म हो और कर्क लग्न में गुरु स्थित हो और चतुर्थ भाव में शनि हो और सप्तम में मंगल हो तो हज़ार वर्ष की आयु होती है । प्रभु श्रीराम की कुंडली में यह योग उपस्थित है ।
  5. सिंह लग्न में मंगल और सूर्य 4 भाव में हो ,राहु 12 वें भाव में हो और शेष ग्रह 2 भाव में स्थित हो तो जातक हज़ार वर्ष तक जीता है ।
  6. मेष लग्न में राहु किसी शुभ ग्रह के साथ लग्न में स्थित हो , गुरु 10 वें भाव में ,मंगल 7 वें भाव में और बली चन्द्रमा 12 वें भाव में बैठा हो तो जातक रसायन विद्या के बलपर कम से कम 2 ,000 वर्षों तक जीवित रहता है ।
  7. मेष लग्न में ,कर्क में सूर्य,मकर में शनि ,तुला में मंगल और मीन में बली  चन्द्रमा हो तो जातक 2 ,000 वर्षों तक जीता है ।
  8. कर्क लग्न में लग्न में गुरु और चन्द्रमा स्थित हो ,शुक्र और बुद्ध केंद्र में हों और अन्य ग्रह 3 ,6 ,11  में बैठे हो तो जातक चिरायु होता है ऐसे योगमें आयु गणना की आवश्यकता नहीं होती है ।

द्वारा
गीता झा 

Tuesday, June 23, 2015

ज्योतिष में दीर्घायु या लम्बी आयु के कारक


ज्योतिष में आयु विचार के लिए आयु का निम्न वर्गीकरण किया गया है
बालारिष्ट --8 वर्ष तक
अल्पायु ---8 -32 वर्ष तक
मध्यायु ---32 -64 वर्ष तक
दीर्घायु ---64 -100 वर्ष तक                             

आयु का विचार करने के प्रमुख कारक
  1. लग्न और चन्द्र लग्न
  2. लग्नेश और अष्टमेश
  3. अष्टम भाव में स्थित ग्रह
  4. अष्टम भाव पर दृष्टि  वाले ग्रह
  5. मारक ग्रह
  6. मारकेश [ दूसरा  और सप्तम भाव ]
  7. होरा लग्न
  8. शनि की लग्न और चन्द्रमा से स्थिति

दीर्घायु के कुछ प्रमुख योग

लग्न /लग्नेश द्वारा
  1. लग्नेश बलवान हो कर केंद्र में स्थित हो | 
  2. लग्नेश जिस भाव में हो उस भाव का स्वामी जिस राशि में स्थित हो उस राशि का स्वामी और लग्नेश केंद्र में स्थित हो तो लम्बी आयु होती है ।
  3. लग्नेश केंद्र में  बैठा हो और शुक्र या गुरु से युक्त या  दृष्ट हो ।
  4. लग्न द्विस्वभाव राशि का हो और लग्नेश उच्च राशि/मूलत्रिकोण राशि का केंद्र में स्थित  हो तो लम्बी आयु होती है ।
  5. लग्न द्विस्वभाव राशि का हो और लग्नेश जिस स्थान में हो उससे केंद्र में दो पापग्रह हो तो दीर्घायु योग होता है ।
  6. लग्न  द्विस्वभाव राशि हो और लग्नेश केंद्र /त्रिकोण में स्थित हो ।
  7. चर लग्न में चन्द्रमा चर राशि में हो दीर्घायु योग बनता है ।
  8. मेष  लग्न में शनि मकर राशि में ,मंगल तुला राशि में और चन्द्रमा कुम्भ राशि में हो ।
  9. वृष राशि के लग्न में शुक्र बैठा हो , गुरु केंद्र में हो और अन्य  ग्रह 3 /6 /11 भाव में हो तो रसायन या मन्त्र के प्रयोग से लम्बी आयु पाता है । 
  10. कर्क लग्न में चन्द्रमा हो और शेष ग्रह शुभ राशि में बैठे हों ।
  11. कर्क  लग्न में गुरु और चन्द्रमा हो ,शुक्र केंद्र में हो और 8 वां भाव खाली हो  जातक की लम्बी आयु होती है ।
  12. कर्क लग्न में गुरु और चन्द्रमा हो ,शुक्र और बुद्ध केंद्र में हो और बाँकी ग्रह 3 /6 /11 वें भाव में हों ।
  13. कर्क लग्न हो ,शनि तुला राशि में हो गुरु मकर राशि में हो ,चन्द्रमा वृष राशि में हो तो जातक रसायन या मन्त्रों के प्रभाव से दीर्घजीवी होता है 
  14. तुला लग्न में शुक्र बैठा हो , गुरु एवं मंगल उच्च के हों और जन्म अश्वनी नक्षत्र का हो ।
  15. द्विस्वभाव लग्न में चन्द्रमा स्थिर राशि में हो तो दीर्घायु योग बनता  है ।
  16. लग्न स्थिर राशि तथा चन्द्रमा द्विस्वभाव राशि में हो भी दीर्घायु  योग बनता है ।
  17. लग्नेश केंद्र में ,पाप ग्रह 3 /6 /11 वें भाव में हों या दशमेश उच्च हो तो भी  लम्बी आयु होती है ।
  18. गुरु लग्न में हो और चन्द्रमा,शुक्र और मंगल तीनों परमोच्च हो तो लम्बी आयु होती है ।
  19. लग्न में स्वगृही गुरु बैठा हो ,शुक्र केंद्र में हो और मिथुन राशि में कोई ग्रह  ना हो तो जातक इन्द्रतुल्य एवं  रसायन  के प्रयोग से दीर्घजीवी होता है ।  


अष्टम भाव /अष्टमेश
  1. जन्म लग्न से अष्टमेश अपनी उच्च राशि में हो तो लम्बी आयु होती है ।
  2. अष्टमेश अष्टम में अपनी राशि में हो | 
  3. अष्टमेश स्वगृही हो और अष्टमेश  स्थान से केंद्र या त्रिकोण में कोई शुभ ग्रह हो ।
  4. अष्टमेश जिस स्थान पर हो उस स्थान का स्वामी और लग्नेश केंद्र में स्थित हो | 
  5. अष्टमेश 8 वें या 12 वें भाव में स्थित हो और अष्टमेश  जिस  स्थान पर हो उसका स्वामी लग्न से अष्टम बैठा हो ।


शनि
  1. शनि अष्टम में हो और अष्टमेश  स्वराशि में हो |
  2. शनि  या अष्टमेश किसी उच्च ग्रह के साथ या दृष्ट हों ।
  3. लग्नेश या अष्टमेश शनि  पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो |
  4. शनि अष्टम भाव में स्थित हो तो लम्बी आयु होती है ।
  5. शनि केंद्र में स्थित हो तो जातक   कम से कम 75 साल तो जीता ही है ।
  6. शनि या अष्टमेश किसी उच्च ग्रह से  युक्त या दृष्ट हों ।
  7. अष्टमेश अपनी राशि में हो शनि की भी मित्र राशि हो तथा शनि अष्टम भाव से त्रिकोण [8 ,12 ,4 भाव ] में हो |
  8. कोई एक ग्रह उच्च राशि में बैठा हो और उसके साथ अष्टमेश और शनि हो |
  9. शनि लग्नेश या अष्टमेश हो और उसके साथ एक या अधिक  शुभ ग्रह हो तो जातक  दीर्घजीवी होता है ।
  10. गुरु या शुक्र में से कोई भी केंद्र में हो और शनि 5 /6 /8 /11 वें  भाव में हो तो जातक दीर्घायु होता है |


अन्य योग
  1. गुरु और शुक्र दोनों केंद्रवर्ती हों तो लम्बी आयु का योग बनता है  
  2. सभी ग्रह 3 या 8 वें भाव में स्थित हो तो जातक लम्बी आयु पाता है 
  3. पांच ग्रह मिलकर 5 /9 वें भाव में हो और उनमें से कोई अष्टमेश न हो ।
  4. केंद्र स्थान शुभ ग्रहों से युक्त हो , लग्नेश शुभ ग्रह के साथ बैठा हो और गुरु द्वारा देखा जाता हो तो दीर्घायु योग बनता है ।
  5. तीन ग्रह उच्च हों और  उनमें किसी के साथ लग्नेश एवं अष्टमेश हों और पाप युक्त /दृष्ट  ना हों ।
  6. चन्द्रमा 5  वें भाव में गुरु 9 वें भाव में और मंगल 10 वें भाव में हो तो लम्बी आयु होती है ।
  7. 6 ठें और 12 वें भाव के स्वामी लग्न में हों और लग्नेश और दशमेश केंद्र में हो |
  8. चन्द्रमा उच्च ,मित्र राशि अथवा मूल त्रिकोण राशि में स्थित हो और गुरु या शुक्र से दृष्ट हो ।
  9. सभी ग्रह 3 ,4 ,8 ,9 वें भाव में हों तो दीर्घायु योग बनता है ।
  10. तीन ग्रह उंच्च राशि में हों और लग्नेश ,सप्तमेश के साथ सप्तम भाव में स्थित हो तथा सप्तम भाव पाप ग्रह से रहित हो| 
  11. सप्तम भाव में तीन ग्रह हों या तीन ग्रह उंच्च राशि के मित्र  स्थान के तथा अपने ही वर्ग में हो और लग्नेश बलवान हो तो लम्बी आयु होती है ।
  12. लग्नेश बली  हो और पाप ग्रह 3 ,6 ,11 भाव में स्थित हो और शुभ ग्रह  केंद्र 1 ,4 ,7 ,10 भाव या त्रिकोण 5 ,9 भाव में स्थित हो | 
  13. लग्नेश ,अष्टमेश और दशमेश लग्न से केंद्र / त्रिकोण में हों और लग्न से 6 ठे , 8 वें अथवा 11 वें  स्थान पर शनि बैठा हो ,लेकिन शनि का इन तीनों ग्रहों से कोई सम्बन्ध नहीं  चाहिए तो जातक दीर्घायु होता है ।
  14. शुभ ग्रह 6 ,7 ,8 वें भाव में हों और पाप  ग्रह 3 ,6,11 वें भाव में हो  |
  15. यदि गुरु ,बुध और शुक्र केंद्र त्रिकोण में हों और पापग्रहों से युक्त या दृश्य न हों तो जातक दीर्घायु होता है ।
  16. सूर्य ,मंगल और शनि की  युति 3 /6 /11 वें भाव में हो और पाप ग्रह से दृष्ट/युक्त ने हो तो जातक लम्बी आयु पाता है ।
  17. बुद्ध ,गुरु और शुक्र 5 /9 वें भाव में हो शनि उच्च हो पाप दृष्ट/युक्त न हो तो लम्बी आयु होती है ।
  18. 5 /8 /9 वें भाव में कोई पाप ग्रह न हों और केंद्र में भी कोई शुभ ग्रह न हो तो जातक देव तुल्य होता हुआ दीर्घजीवी होता  है |
  19. गुरु और चन्द्रमा कर्क राशि में हो , बुद्ध और शुक्र केंद्र में हों एवं अन्य ग्रह 3 /6 /11वें भाव में हों तो जातक दीर्घायु होता है ।
  20. शुक्र,मंगल शनि और राहु 3 /6 /11 वें भाव में हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक दीर्घायु  होता है ।


द्वारा 
गीता झा

Saturday, June 20, 2015

ज्योतिष में मानसिक अशांति के कारण


अपने  कार्यों में  अपेक्षानुरूप सफलता नहीं मिलने से अथवा किसी भी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों से सामना न कर पाने के कारण मन अशांत हो जाता है । अशांत मन अनेक प्रकार के मनोरोगों को जन्म देता है ।
ज्योतिष में मानसिक अशांति के मुख्य कारक
लग्न ---व्यक्तित्व
चतुर्थ भाव ---मानसिक स्थिति ,विचार
चन्द्रमा ---मन का कारक
ज्योतिष में मानसिक अशांति के कारण
  1. चन्द्रमा  नीच  राशि वृश्चिक में हो |
  2. चन्द्रमा का 6/8/12 वें  भाव में स्थित होना । 
  3. चन्द्रमा पर राहु एवं शनि की युति या दृष्टि हो  । दोनों में से एक ग्रह से युति हो और दूसरे की दृष्टि हो तब भी अशांत मन होने की संभवना बनी रहती है ।
  4. चन्द्रमा पाप ग्रहों के मध्य हो या पाप कर्तरी -योग में हो तब भी मानसिक पीड़ा मिलती है ।
  5. लग्न / लग्नेश  और चन्द्रमा दोनो निर्बल हो तो भी जातक को मनोविकार होते हैं ।
  6. चतुर्थ भाव विचारों का होता है । इस भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव दूषित विचार उत्पन्न करते हैं जिनसे मनोविकार  होते हैं ।
  7. चन्द्रमा और चतुर्थ भाव  दोनों पीड़ित होने पर जातक को अपने विचारों पर नियंत्रण नहीं रहता है और वह मनोरोगी हो जाता है ।
  8. लग्न,सूर्य और चन्द्रमा पर राहु का प्रभाव हो तो जातक को अज्ञात कारणों से मानसिक पीड़ा होती है ।
बलवान मानसिक स्थिति के ज्योतिष कारण
  1. चन्द्रमा यदि केंद्र/त्रिकोण में बली स्थिति में हो तो जातक की मानसिक स्थिति बलवान होती है ।
  2. चन्द्रमा पर शुभ  ग्रहों का प्रभाव हो तो मानसिक विकार नहीं होते हैं ।
  3. चन्द्रमा और लग्नेश दोनों बली हों तो जातक भावात्मक रूप से बली होता है ।
  4. लग्न  और लग्नेश बली हों तो जातक अनुशासित  और संतुलित मानसिकता का होता है  ।
  5. सूर्य,चन्द्रमा और लग्न तीनों के बली होने पर जातक दृढ मानसिकता का होता है ।
  6. अक्सर शुभ ग्रहों की दशा में मनोस्थिति अच्छी ही रहती है ।

द्वारा
गीता झा 

Friday, June 19, 2015

Astrology- When will I have my own house?



It is a natural and fundamental intention to have sweet home for survival comfortable in life. According to the capability of person’s financial matter he/she tries to have a good building. Astrology appends certain clues and points how and when a person can have the scope to occupy, purchase or get ownership of a house.

Astrological factors responsible for ownership of a house

Ascendant ---general disposition in life, desires and their fulfillment
2nd house /lord ---wealth, family inheritance, fortune
3rd house/lord  ---shift from one place to other, change of residence
4th house/lord ---land, property, home  
11th house /lord --- gains, income, prosperity
Mars---significator of landed property

Saturn ---Obstacles, delays and cancellations

Favorable Combinations for owing a house
  1. 4th lord in its own sign, exaltation or friendly sign or exalted planet in the 4th house gives beautiful house.
  2. 4th house should be positively influenced by 11th lord from ascendant/Moon  
  3. Positive influence of Mars on 4th house/lord from ascendant/Moon
  4. Lords of ascendant and 4th house combined in 4th house and having benefic aspects indicates gain of house in most unexpected manner.
  5. Lords of 10th house and 4th house combined in quadrant or trine indicates a huge house like palace.
  6. Lords of 4th house and 10th house are strong and friendly indicates the possibility of much landed property.
  7. Mercury placed in 4th house indicates artistic house,
  8.  Moon in 4th house gives new house, native will build a descant house but found of shifting house often. Native will have fortune in lands and agriculture.
  9. Sun in 4th house indicates native will have inheritance and will live in leaf roof house .favorable Sun signifies ownership of 2 house but weak Sun represents loss of house 
  10. Jupiter in 4th strong and durable house
  11. Sun + Ketu in 4th give flimsy or fragile house
  12. Saturn + Rahu in 4th give old house or house made of rocks and stones
  13. Venus in 4th gives lovely house
  14.  Mars + Rahu in 4th give stone house
  15. Moon+ Venus in 4th house give multistoried house.
  16. Mars +Ketu in 4th house give brick house.
  17. Jupiter in 4th gives a house of timber, sun gives house of grass.
  18. 4th lord in its own / exaltation /friendly sign or an exalted planet sitting in 4th house and 9th lord in quadrant give a beautiful house.
  19. 4th lord placed in 10th house and 10th lord combined with strong Mars in 4th house increases possibilities of much landed properties.
  20. Lord of marriage Venus is in 4th house with strength or if the lord of 4th house is placed in 7th house or if lord of 7th and 4th are friends and conjunct native will get lands or house through his wife.

Loss of house/land
  1. If lord of 4th joins Nashasthan [6th/8th/12th house] and aspected by Mars /Sun the native house will be lost.
  2. Lord of 4th house in Nashasthan [6th, 8th, 12th house] while Mars is afflicted native will lose land. 
  3. Presence of an afflicted planet in 4th house and Mars in depression indicates denial of inheritance. house placed in 12th house native will live in another’s house or in foreign country.
  4. Lord of 4th house placed in 6th/8th/12th house and lord of ascendant is afflicted resents loss of property through the action of Government.
  5. Afflicted/debilitated lord of 4th house placed in 8th house indicates loss of house/land Debilitated 4th lord combined with Sun indicates loss of landed property by Government Decree.
  6. Lord of 4th house placed in 3rd house with benefic aspects the native will acquire very little immovable property.

Timing for owning a house /land
  1. During Mahadasha and Antardasha of lord of 4th house from ascendant/Moon
  2. During Mahadasha and Antardasha of Mars the natural significator of landed property
  3. Double transit of Saturn and Jupiter in a horoscope aspecting 4th house from ascendant/Moon
  4. Transiting Mars aspecting the 4th house/lord from ascendant/Moon
  5. Transiting 4th lord aspecting natal Mars in horoscope
  6. For readiness to change residence the Mahadasha and Antardasha of planets associated with 3rd house/lord should be consider.
  7. Mahadasha /Antardasha of  Jupiter/Venus/Mars are good for buying landed properties.
  8. If lord of 4th house is in 11th house or if Mars is in the 4th house or 11th house in sign of Aries/Scorpio the native will purchase land  during   Mahadasha /Antardasha of Mars

By
Geeta Jha