Thursday, September 26, 2013

संकल्प शक्ति- सुपर चेतन मन -विज्ञान

मानव - मस्तिष्क इतनी विलक्षणताओं का केंद्र है जिसके आगे वर्तमान में अविष्कृत हुए समस्त मानवकृत उपकरण एवं यंत्रों का एकत्रीकरण भी हल्का पड़ेगा. अभी तक मस्तिष्क के 1/10 भाग की ही जानकारी मिल सकी है, 9 /10 भाग अभी तक शरीर शास्त्रियों और वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है. मस्तिष्क के इस 9/10 भाग में असीमित क्षमताएं भरी पड़ी हैं.

मस्तिष्क में अगणित चुम्बकीय केंद्र हैं जो विविध-विधि रिसीवरों और ट्रांसफ़ॉर्मरों का कार्य सम्पादित करती हैं. मानव मस्तिष्क में असीमित रहस्यात्मक असीम शक्ति हैं जिसके विषय में हमें हलकी-फुलकी सतहीय सत्तर की जानकारी हैं. योग साधना का एक उदेश्य इस चेतना विद्युत -शक्ति का अभिवर्धन करना भी है. इसे मनोबल, प्राणशक्ति और आत्मबल भी कहते हैं. संकल्प शक्ति और इच्छा शक्ति के रूप में इसके चमत्कार देखे जा सके हैं.

मनोविज्ञान के समूचे खजाने में दो चीजें भरी हैं सूत्र [ Formula ] और तकनीक [Technique ] . सूत्रों में स्थिति का विवेचन होने के साथ तकनीकों के संकेत भी हैं.तकनीकों द्वारा स्थिति को ठीक करने के प्रयास किये जातें हैं.

संकल्प शक्ति

संकल्प शक्ति मस्तिष्क के वे हाई momentum वाले विचार हैं जिनकी गति अत्यंत तीब्र और प्रभाव अति गहन होतें हैं और अत्यंत शक्तिशाली होने के कारण उनके परिणाम भी शीघ्रः प्राप्त होतें है.

मन के तीन भाग या परतें

भावना, विचारणा और व्यवहार मानवीय व्यक्तितिव के तीन पक्ष हैं उनके अनुसार मन को भी तीन परतों में विभक्त किया जा सकता है :

भौतिक जानकारी संग्रह करने वाले चेतन - मस्तिष्क [Conscious- Mind ] और ऑटोनोमस नर्वस सिस्टम को प्रभावित करने वाले अचेतन - मस्तिष्क [Sub- Conscious - Mind] अभी अभी विज्ञान की परिधि में आयें हैं. पर अब अतीन्द्रिय - मस्तिष्क [Super-Conscious -Mind] का अस्तित्व भी स्वीकारा जाता हैं .

हुना [Huna]

हुना [Huna] का अर्थ हवाई द्वीप [ Phillippines ] में गुप्त या सीक्रेट है. शरीर , मन और आत्मा के एकीकरण पर आधारित हुना -तकनीक लगभग 2000 वर्ष पुरानी परामानोविज्ञानिक रहस्यवादी स्कूल हैं. इस गूढ़ और गुप्त तकनीक के प्रयोग से एक साधारण मनुष्य अपनी संकल्प शक्ति द्वारा अपने अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं को जगा कर और विशाल ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तिशाली चेतन तत्त्वों को खीचकर अपने में धरण कर अपने आत्मबल को इतना जागृत कर सकता हैं की वह अपने व्यक्तिगत और सामाजिक परिस्थितिओं में मनचाहा परिवर्तन ला सके .

हुना के अनुसार मन की तीन परतें

Llower Self [Unconsious- Mind]----- यह Rib-Cage में स्थित है.
Middle -Self [Consious -Mind] ------यह भ्रूमध्य में पीनल ग्लैंड में स्थित है.
Higher Self [Super-Consious-Mind] -------यह सर से लगभग 5 फीट की उच्चाई पर स्थित है.



Lower Self : यह हमारा अचेतन मन है.समस्त अनुभवों और भावनाओं का केंद्र है. Middle -Self द्वारा इसे निर्देश और आदेश देकर कार्य करवाया जा सकता है. समस्त जटिल गिल्ट , कोम्प्लेक्सेस , तरह - तरह की आदतें, आस्थाएं, सदेव Lower -Self में संचित रहतें हैं. Lower -Self स्वयं कोई भी तार्किक या बुद्धि पूर्ण निर्णय लेने में पूर्ण रूप से असमर्थ है.

Middle -Self : यह हमारा चेतन मन है जिससे हम सोच-विचार करते हैं और निर्णय लेते हैं. यह हमारे बुद्धि के स्तर को दर्शाता है.

Higher- Self : मानव मस्तिष्क का वह भानुमती का पिटारा है जिसमें अद्भुत और आश्चर्य जनक क्षमताएं भरी पड़ी हैं, , जिन्हें अगर जीवंत-जागृत कर लिया जाए तो मनुष्य दीन -हीन स्थिति में न रह कर अनंत क्षमताओं को अर्जित कर सकता है. Higher-Self में किसी भी समस्या या परिस्थिति का समाधान करने की असाधारण क्षमता है. यह तभी संभव हो पाता है जब हम उससे मदद मांगें. Higher - Self कभी भी मानव के साधारण क्रिया-कलापों में दखलांदाजी नहीं करा है जब तक विशेष रूप से उससे मदद न मांगी जाये.

हुना द्वीप वासी किसी देवी-देवता की जगह अपने कार्यों या प्रयोजनों की सिद्धि के लिए अपने HigherSelf पर पूर्ण रूप से आश्रित होतें हैं और उसीसे से ही प्रार्थना करते हैं.


Aka - Chord

यह अदृश्य चमकीली - चाँदी की ओप्टिकल फाइबर के समान कॉर्ड या वायर है जो Lower -Self को Higher - Self से और Middle - Self को Lower -Self से जोडती है, . Higher -Self और Middle -Self प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए नहीं होते हैं.

प्राण

प्राण ही वह तत्व हैं जिसके माध्यम से Higher Self हमरे अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति करता है. प्राण तत्व की अधिकता गहरी साँस द्वारा संभव है. चेतन मस्तिष्क या Middle-Self द्वारा प्राण तत्व वायु द्वारा ग्रहण किया जाता है. फिर इस प्राणतत्व को Lower-Self अत्यंत उच्च विद्युत –वोल्टेज़ में परिवर्तित कर देता है पुनः इस हाई – वोल्टेज़ का प्रयोग हमारा Higher- Self अभीष्ट की लक्ष्य प्राप्ति के लिए करता है.

संकल्प ध्यान की Technique

1. सुख आसन या सुविधजनक जनक स्थिति में बैठ जायें. अपनी आंखें बंद करे, धीमें और गहरी 10 सांसें लें और प्रत्येक साँस के साथ प्राण शक्ति को अपने अन्दर जाता महसूस करे.
2. अब ग्रहण किये प्राण शक्ति को अपने सोलर प्लेक्सस [Rib Cage] में एक चमकीली हाई वोल्टेज सिल्वर गेंद के रूप में Visualize करें.
3. अब उस गेंद से अत्यंत तीब्र सिल्वर सफ़ेद प्रकाश निकलता देखें जिसे एक सक्रीय ज्वालामुखी से लावा निकलता है , या जैसे दिवाली के अवसर पर जलाये जाने वाले आतिशबाजी आनार से तीब्र गामी प्रकाश निकलता है.
4. सफ़ेद प्रकाश को अपने सिर से 5 फीट की ऊंचाई तक जाता देखें .
5. अब इस सफ़ेद प्रकाश को सर की ऊपर एक चमकीले सिल्वर रंग के विशाल गोले का रूप धरते देखें .
6. इस गोले में अपनी लक्ष्य की विस्तृत और इच्क्षित पूर्ति देखे. आप का लक्ष्य एकदम सपष्ट और निश्चित होना चाहिए.
7. अपने इच्क्षित लक्ष्य की अत्यंत बारीक़ और विस्तृत पूर्ति देखें.
8. उस सफ़ेद गोले में अपने लक्ष्य को पूरा हुआ देखें और विश्वाश करे की आप का वह कार्य पूर्ण रूपेण , सफलता पूर्वक सम्पादित हो चूका है.
9. मन में संकल्प करे की आपका वह इच्क्षित कार्य पूरा हो चूका है.
10. प्रक्रिया के अंत में अपने Higher-Self को अपने संकल्प की पूर्ति के लिए धन्यवाद कहें.
11. प्रतिदिन यह प्रक्रिया करें , जब तक आप का वह इच्क्षित कार्य पूर्ण नहीं हो जाता है.
12. अपने Higher - Self पर विश्वाश करे जो आप के अन्दर ईश्वर के D.N.A. का प्रतिनिधितित्व करता है. वह आपको कभी धोखा नहीं देगा.

अतीन्द्रिय विज्ञान और गूढ़ -विज्ञान में ऐसी संभावनाएं हैं जो मानवीय कष्टों को मिटा कर , किसी भी मानव की वर्तमान क्षमता में अधिक वृद्धि कर उसे अधिक सुखी और सफल बना सके. इसके लिए हमें अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए. बिना अंध-विश्वास और अविश्वासी बने तथ्यों का अन्वेषण करना चाहिए.

उपेक्षित और लुप्त प्रायः आत्म-विज्ञान को यदि अन्वेषण और प्रयोगों का क्षेत्र मान कर उसके लिए भौतिक-विज्ञानियों जैसी तत्परता बरती जाय तो अगले दिनों ऐसे अनेक उपयोगी रहस्य उद्घाटित हो सकते हैं , जो भौतिक अविष्कारों से भी अधिक उपयोगी सिद्ध होंगें. Smile

Wednesday, September 18, 2013

24 Super Powers of Gayatri Mantra { गायत्री महामन्त्र की 24 महाशक्तियां }




 1. वैधुतीय प्रभाव
 गायत्री  मन्त्र के उच्चारण मात्र से देह के अंग -  प्रत्यंग , चक्र - उप चक्र , ग्रंथियां , मातृकाओं  , उपत्यकाओं  में विद्युत गति से प्रवाहित होती है जो   भ्रमर मेरु में तरंग से उत्पन्न होती है . 
2. गायत्री मन्त्र - माता -पिता
मन्त्र के   उच्चारण के साथ की अदृश्य   माता - पिता  का अनुभव होने लगता है . 
3. पंचमुखी दसमुखी महाशक्ति का आभास
भावना करते ही गायत्री माता का स्वरुप सर्वव्यापी , अंतर्यामिनी , सर्व्शाक्तिशालिनी तथा महामाहिमामायी  प्रतीत होता है .
4. ब्रह्म - विद्या स्वरूपा  
गायत्री  ब्रह्मा की ब्रह्मानी  शक्ति है . इस रूप की उपासना करने से साधक के अंतःकरण में ब्रह्म - ज्ञान , तत्वबोध , ऋतंभरा प्रज्ञा एवं सूक्ष्म दृष्टि का अविर्भाव होता है
5. परम - पोषक वैष्णवी  
विष्णु की शक्ति को वैष्णवी कहते है . माता की गोद में साधक आपने को नवजात शिशु के रूप में सौंप देता है तो अनंत शक्ति तथा अनमोल मातृत्व सुधा का पान करने लगता है . 
6. शाम्भवी - शक्ति  
शिव योगेश्वर है . उनकी चेतवानी तथा गतिशीलता ही शाम्भवी शक्ति है. गायत्री ही शिव के त्रिनेत्र की शक्ति है . इनकी दया होते ही समस्त कषाय  - कष्टों का नाश हो जाता है , बुराइयाँ भस्म हो जाती है . 
7. उद्धारकत्री  माता
संसार को भवसागर कहा जाता है. किंककर्तव्यविमूढ़ता  के कारण  इस भवसागर में डूबते का उद्धार गायत्री मन्त्र का मनन  अवश्यमेव कर देता है . उसकी शरणागति से बढ़ कर कोई ऐसी नौका नही जो संसार सागर से सरलतापूर्वक पार लगा दे. 
8. सदगुरु  की प्राप्ति  
सदगुरु  सरल तथा पहचान में नहीं आने वाले साधारण आदमी प्रतीत होते हैं . इनकी पहचान कठिन है . माता  की कृपा जब साधक पर होती है तब स्वतप  प्रयास में सदगुरु  की प्राप्ति हो जाती है . 
9. अनिष्ट - निवारिका 
मनुष्य के जीवन में  नाना प्रकार की व्याधियां , यातनाएं , कठिनाइयाँ एवं पीडाएं हैं , जो असंयम , खुदगर्जी , कुटिलता , आलस्य , दुर्व्यसन तथा दुष्कर्मों के कारण है . गायत्री मन्त्र के शरण में आते है ये स्वमेव औंस की बूंदों की तरह तिरोहित हो जाते हैं
10. सद - गुणों की वरदात्री 
 गायत्री उपासना प्रारंभ करते ही दया, सेवा , संयम , सत्य , शौर्य , प्रेम, त्याग,  सद - विवेक  तथा सद - भावना  के गुण दिन दिन बढ़ने लगते हैं . 
11. उन्नति मार्ग - निर्धारिका
गायत्री मन्त्र धारण करते ही  व्यक्ति आत्मोत्थान , शारीरिक आर्थिक , बौद्धिक पारिवारिक उन्नति को प्राप्त करता हुआ यश, प्रतिष्ठा , आदर , एवं सुख - सुविधा का अधिकारी बनता है . 
12. बंधनों से मुक्ति  
मन्त्र कृपा से साधक को दिव्य शक्ति की ऐसी सहायता प्राप्त होती है , जिसके कारण समस्याओं की समस्त जंजीरें कट जाती हैं
13. प्रारब्ध - परिवर्तन  
यद्यपि प्रारब्ध बड़ा प्रबल होता है . लेकिन गायत्री शरणागत के कारण  अत्यंत दुस्तर और असत्य कष्टों की यातना हलकी होकर बड़ी सरल रीति से भुगत जाती है 
14. रिद्धियों  - सिद्धियों का प्रादुर्भाव  
गायत्री उपासक  जब अपने आन्तरिक मल - विक्षेपों को शुद्ध  का लेता है , तो उसकी अन्तःभूमि में दैवी-शक्तियों का स्वमेव प्रादुर्भाव होता है और अनेक आलौकिक सामर्थ्य उसमें प्रगट होते हैं . 
15. कायिक-कष्टों से निवृति  
गायत्री साधना  से असाध्य रोग के रोगी को मौत के मुंह  से वापस लौटते देखा गया है. मन्त्र एक ऐसी रामबाण औषधि है , जिसके सामने चिकित्सा - शास्त्र मूक प्रतीत होता है . 
16. सद - बुद्धिदायिनी शारदा  
गायत्री शक्ति का बीजांक है ......... हीं श्रीं क्लीं  ............ गायत्री बुद्धि का मन्त्र है . इसमें ...हीं ....तत्व की प्रधानता है . इसकी उपासना से शुद्ध - बुद्धि की चित्त  में वर्षा होती हुई दिखाई देती है . 
17. एश्वर्य - दायिनी लक्ष्मी  
गायत्री की ……….श्री……….. शक्ति लक्ष्मी ही है . इसमें एश्वर्य , वैभव तथा संपत्ति की प्राप्ति के साथ - साथ उसके सद - उपयोग की बुद्धि भी मिलती है . 
18. महाशत्रुओं से रक्षा  
गायत्री का ....क्लीं ..... रूप संहारक है . शत्रुओं का विनाश  इसका प्रथम कर्तव्य है
19. अदृश्य -अद्भुत सहायिका  
गायत्री उपासना  करने  से वह सहायता और सहयोग स्वमेव मिलेगा जिसकी कल्पना भी संभव नहीं है 
20. परम संतोष
गायत्री उपासना से साधक को अनमोल धन संतोष की प्राप्ति होती है .
21. सौभाग्य -स्नेह से पूरित परिवार  
गायत्री उपासक का अंग-अंग सौभाग्य की चका चौंध से सरोबर हो जाता है तथा परिवार में स्नेह सुधा की वर्षा होती सी  प्रतीत होती है 
22. कषाय - कटमषों  का तिरोहन 
व्यक्तित्व से कषाय  , कटमषों  का नाश होता है .
23. वसुधैव - कुटुम्बकम
गायत्री का यह विलक्षण प्रभाव है , मानव को मानवता प्रेमी बना देती है
 24. सद - गति , जीवन मुक्तिदात्री 
जन्म - मरण , आवागमन की बेडी  काटती है गायत्री . परम प्रभु से मिलन कराती है