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Sunday, April 17, 2016

प्राणायाम : प्राणायाम वर्सज़ दौड़ना


वजन कम करने और चुस्त दुरुस्त रहने के लिए बड़ी संख्या में लोग दौड़ लगाते हैं । दौड़ना एक बहुत अच्छी exercise है , जहां इससे पूरे  शरीर की कसरत होती है वहीं प्राणायाम को फेफड़ों की कसरत माना जाता है ।

अब यह सवाल बार बार उठता है की प्राणायाम  और दौड़ने में क्या क्या समानता या असमानता है ? दोनों के लाभ समान है या अलग अलग ?  या दोनों में से कौन ज्यादा फायदेमंद है  ?

प्राणायाम श्वास-प्रश्वास क्रिया को क्रमबद्ध,लयबद्ध करना है वहीं दौड़ना अनुशासन ,दृढ़ संकल्प, ध्यान पर आधारित पूरे शरीर को स्वस्थ रखने की व्यायाम की एक तकनीक है । प्राणायाम और दौड़ना दोनों की एक विशिष्ट तकनीक  है , यदि उसका सावधानी से पालन किया जाए तो दोनों  के अद्भुत लाभ मिलते हैं ,लेकिन तकनीक के गलत प्रयोग से दोनों से हानि होने की सम्भावना अधिक रहती है ।

प्राणायाम- दौड़-सांस 

हम दिन भर में  16-18  सांस लेते हैं और लगभग आधा लीटर वायु एक सांस में फेफड़ों में भरते हैं यानि एक मिनट में हम लगभग 8-9  लीटर वायु अंदर भरते हैं । लेकिन हमारे फेफड़ों की क्षमता इससे  10-12  गुना अधिक होती है यानि एक सांस में 5-6 लीटर और एक मिनट की सांस में 50-80  लीटर वायु हम ले सकते हैं ।  विश्राम में हम एक मिनट में 9 लीटर,बैठे हुए 18 लीटर, चलते हुए 27  लीटर और दौड़ते हुए 45-50  लीटर और प्राणायाम करते हुए 50-80 लीटर वायु ग्रहण करते हैं ।

एक  गहरी सांस में दोनों फेफड़ों में जितने आयतन की वायु समा सकती है  उस सम्पूर्ण आयतन को टोटल लंग कैपेसिटी TLC  कहते हैं । सांस निकलने के बाद भी कुछ वायु फेफड़ों में बची रहती उसे  फंक्शनल रेसिडुअल कैपेसिटी FRC  कहते हैं । इसके अलावा अगर वायु की अधिकतम मात्रा को प्रश्वास द्वारा निष्काषित कर फेफड़ों को खाली किया जाता है तो भी फेफड़ों में  अल्प मात्रा में वायु शेष रह जाती है उसे रेसिडुअल वॉल्यूम RV कहते हैं ।

प्राणायाम में हम एक मिनट में 50-80  लीटर वायु ग्रहण कर लेते हैं और साथ ही साथ सांस का पूरा निष्काशन भी कर देते हैं इसी कारण  से फेफड़ों में कार्बन डाइऑक्साइड जमा  नहीं हो पता और हमें  थकान नहीं होती जबकि दौड़ने में ,सीढियाँ चढ़ने या vigorous व्यायाम करने में भी हम अपने फेफड़ों को लगभग प्रति मिनट 50 लीटर  वायु से तो भर  लेते हैं लेकिन उसी अनुपात से उसका निष्काशन नहीं कर पाते हैं अधिक  ऑक्सीजन लेने से उसके जलने से जो कार्बन डाइऑक्साइड और लैक्टिक एसिड बनता है वह फेफड़ों में जमा  होता चला जाता है इसलिए दौड़ने से या सीढियाँ चढ़ाने से हमारा दम फूलने लगता है और हमें थकान महसूस होती है |

प्राणायाम की पूरी प्रक्रिया साँसों को लयबद्ध,तालबद्ध और क्रमबद्ध करने की है जबकि दौड़ना एक व्यायाम है जिसमें साँसों के  ऊपर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है ।  प्राणायाम  में साँसों के आने -जाने दोनों पर ध्यान रखा  जाता है इसलिए इससे फेफड़ों का रेसिडुअल वॉल्यूम RV  घटता है और वाइटल कैपेसिटी बढ़ती है , जबकि दौड़ने में साँसों का कोई निश्चित नियमन नहीं होता है इसलिए फेफड़ों की निष्क्रियता समाप्त करने में प्राणायाम दौड़ने से अधिक कारगर है ।

प्राणायाम-दौड़-कार्बन डाइऑक्साइड

 सांस लेते समय ऑक्सीजन,नाइट्रोजन आदि का रासयनिक का सम्मिश्रण हमारे भीतर प्रवेश करता है उसमें से जो आवश्यक है उसे शरीर सोख लेता है और भीतर  उत्पन्न विषाक्त कचरे को कार्बन डाइऑक्साइड गैस के रूप में बाहर बहा देता है । सांस द्वारा  फेफड़ों में जो शुद्ध वायु पहुंचती है वह अपने साथ इस विष को लेकर बाहर उड़ा लेती है | 24  घण्टों में मनुष्य के शरीर से सांस द्वारा इतना विष निकलता है की उससे 12   हाथियों की मौत हो सकती है । शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ा हुआ स्तर ही विभिन्न्न रोगों को जन्म देता है |  प्राणायाम  में साँसों को पूरा पूरा लिया जाता है और पूरा पूरा छोड़ा जाता है इसलिए दौड़ लगाने  के मुकाबले इस तकनीक से शरीर की गन्दगी अधिक मात्रा में बाहर निकलती है ।

हर सामान्य सांस के द्वारा एक  आम आदमी 21% ऑक्सीजन की मात्रा  ग्रहण करता है और 12  %विषाक्त कार्बन डाइऑक्साइड को निष्काषित करता है | प्राणायाम के अभ्यास से  इस अनुपात को कई गुणा  बढ़ाया जा सकता है ।प्राणायाम  करते समय बाहर निकलने वाली वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है ।

यदि दौड़ते समय भी सांसों के ऊपर नियंत्रण रखा  जाए तो इसके पूर्ण लाभ मिल सकते हैं | अक्सर जब दौड़ने में गति बढ़ती है तो साँसों की भी गति बढ़ती है हम  उथली सांस लेना शुरू कर दते हैं जिसके कारण थकान आना  और दम फूलना स्वाभाविक हो  जाता है । यदि दौड़ते समय लम्बी सांस लेना और छोड़ना दोनों के ऊपर ध्यान रखा  जाए तो दौड़ने का वास्तविक लाभ मिल सकेगा ।

प्राणायाम -दौड़ - रक्त शुद्धि

शरीर की कोशिकाओं को स्वस्थ रहने के लिए रक्त,वायु और विद्युत की जरुरत होती है । इन तीनों में से एक में भी कमी आ जाए तो शरीर र्निर्बल, रोगी ,निस्तेज रहने लगता है । फेफड़ों से ली गए सांस में उपस्थित ऑक्सीजन सीधे रक्त से मिलकर रक्त कोशिकाओं को लाल,चमकीला और जीवन शक्तिदायक बनाता है । ऑक्सीजन युक्त सांस में जितनी कमी  पड़े उतना ही घाटा शरीर को उठाना पड़ता है ।

मांसपेशियों में होने वाले रासायनिक क्रियाओं के कारण रक्त में अम्ल रूपी विष-ब्लड लेक्टेट काफी बढ़ जाता है जिसके कारण   मानसिक तनाव,डिप्रेशन,चिंता थकान ,एंग्जायटी जैसे विकार उत्पन्न होते हैं | प्राणायाम के द्वारा रक्त में उपस्थित लैक्टेट को 33 % तक कम किया जा सकता है । जिसके चलते रक्त चाप और हार्ट अटैक जैसे रोगों का शमन होता है | 

जबकि दौड़ने से पैर की मांसपेशियों के ऊपर अधिक जोर रहता है ,और कभी कभी  शरीर का पोस्चर ठीक न होने के कारण एड़ी  ,पाँव,कंधे ,पीठ के ऊपरी और निचले हिस्से की मांशपेशियों में  लैक्टिक एसिड तीब्रता से बनता है जो उस हिस्से में तनाव और दर्द उत्पन्न करते हैं इसलिए दौड़ने का पोस्चर हमेशा ठीक रखना चाहिए । इसी प्रकार प्राणायाम करते समय यदि शरीर का पोस्चर ठीक नहीं होगा तो लाभ की जगह हानि होने की अधिक सम्भावना रहती है ।  इस  प्रकार ब्लड -लैक्टेट को कम करने या रक्त को शुद्ध  करने  के लिए प्राणायाम दौड़ने से अधिक प्रभाव शाली है ।

प्राणायाम-दौड़- कैलोरी

प्राणायाम और दौड़ने से व्यय होने वाली कैलोरी व्यक्ति विशेष के  वजन और उसके मेटाबोलिज्म रेट के अनुसार अलग अलग होगी । समान्यता एक 68  किलो के भार  वाला व्यक्ति एक मील दौड़ने पर 100-120  कैलोरी व्यय करता है जबकि एक 90  किलो की वजन वाला व्यक्ति एक मील दौड़ने में 135-155  कैलोरी व्यय करता है ।जबकि प्राणायाम में एक औसत वजन वाला व्यक्ति 30  मिनट  के प्राणायाम में 120-180  कैलोरी व्यय करता है ।

प्राणायाम-दौड़- मस्तिष्क

प्राणायाम के माध्यम से मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्ध में ऊर्जा का उत्पादन लगभग बराबर होता है और दोनों के क्रिया कलापों के मध्य  सामंजस्य स्थापित होता है  । प्राणायाम करने से व्यक्ति के मस्तिष्क से अल्फा तरंगें बहुलता से निकलती हैं जो मस्तिष्क  को संतुलित करती हैं । इससे बौद्धिक और भावनात्मक क्षमताओं को असाधारण रूप से बढ़ाया जा सकता है । दौड़ने से भी मस्तिष्क में रक्त की अच्छी आपूर्ति होती है  शरीर में एंड्रोफिन जैसे रसायन उत्पन्न होते हैं, जिनसे खुशी का अहसास होता है और हम खुद के बारे में अच्छा महसूस करते हैं। तनाव में कमी आती है। लेकिन दौड़ने का असर मस्तिष्क पर इतना नहीं होता जितना प्राणायाम से होता है ।

अतः दोनों मस्तिष्क विभागों में एकरूपता लाने और मस्तिष्क की क्रियाशीलता को बढ़ने के लिए प्राणायाम दौड़ने से अधिक कारगर है ।

प्राणायाम - दौड़ -शारीरिक लाभ

उचित तकनीक का प्रयोग करने पर प्राणायाम और दौड़ने दोनों  से लाभ मिलते  है । दौड़ने से  शरीर का निचला हिस्सा मजबूत होता है,  लिगामेंट्स और स्नायुतंत्र में मजबूती आती है , रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है , रक्तचाप नियंत्रित रहता है,फेफड़े मजबूत होते हैं ,हड्डियां मजबूत होती हैं, शरीर से चर्बी भी कम होती है, इंसुलिन बनने की प्रक्रिया में सुधार होता है , पाचन में सुधार होता है और बॉडी मेटाबोलिज्म रेट बढ़ता है साथ ही इससे  मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है  ।  यह भी देखने में आया है कि जो पेशेवर लंबी दूरी के धावक होते हैं, उनके दिल पर बुरा असर पड़ता है। इसका मतलब है कि दौड़ने से जो भी फायदा होता है, उसका कुछ अंश दिल पर पड़ने वाले जोर की वजह से कम हो जाता है। सांस और दिल की धड़कन में एक विशेष अनुपात रहता है, उथले सांस ऑक्सीजन की पूर्ति के लिए जल्दी जल्दी सांस लेने पड़ते हैं इस तरह जल्दी जल्दी सांस क्रिया दिल की धड़कन की संख्या को बढती है और उसे अधिक कार्य  करना पड़ता है जिससे दिल  अपना संतुलन खो  देता है और  उसमें विकृति पैदा हो जाती है |

जबकि प्राणायाम से  मोटापा, मधुमेह ,पेप्टिक अलसर , कोलाइटिस, आर्थराइटिस ,दमा, कैंसर, हाइपर टेंशन , बॉडी-इंफ्लेमेशन , कमजोरी,कारोनरी अथरोकलोरिसिस आदि से मुक्ति मिलती है ।इसके साथ ही प्राणायाम शरीर में स्थित स्टेम सेल्स को भी प्रभावित करता जो शरीर को दुःसाध्य रोगों से मुक्ति दिला सकते हैं । 


प्राणायाम -दौड़ -मानसिक लाभ 

शरीर का ऑटोनोमस नर्वस सिस्टम स्व-संचालित होता है जिन पर हमारा  कोई नियंत्रण नहीं होता है | भावनाओं के नियंत्रण में ऑटोनोमस नर्वस सिस्टम का ही हाथ होता है । प्राणायाम के माध्यम से ही इस ऑटोनोमस नर्वस सिस्टम को प्राभावित किया जा सकता है क्योंकि यह सिस्टम प्राण के प्रभाव को शीघ्रता से ग्रहण कर लेते है । ऑटोनोमस नर्वस सिस्टम और एंडोक्राइन ग्लैंड्स को मानसिक एकाग्रता और मानसिक शिथिलीकरण द्वारा ठीक किया जा सकता है जो प्राणायाम द्वारा संभव है ।

प्राणायाम स्नायु मंडल और  ज्ञान तंतुओं की उन्नति करता है तो उसका प्रभाव मस्तिष्क पर अधिक पड़ता है हमारी चेतना और बुद्धि उन्नत होने लगती है । व्यक्ति में उदारता, परोपकार,दया ,क्षमा और करुणा आदि गुण जागृत होने लग जाते हैं स्नायु दुर्बलता, अनिद्रा, चिंता,खिन्नता , तनाव , निराशाजनक और निषेधात्मक दृष्टिकोण से मुक्ति मिलती है । 

जबकि दौड़ने से enkephalins  और एंडोर्फिन नामक रसायन के कारण फ़ील गुड फैक्टर जुड़ा होता है लेकिन मस्तिष्क को यह प्राणायाम के भाँती प्रभावित नहीं कर पाता है ।

प्राणायाम -दौड़-आध्यात्मिक लाभ

प्रत्येक मनुष्य में स्थूल शरीर के साथ साथ सूक्ष्म और कारण शरीर का भी अस्तित्व होता है | जहां दौड़ने से स्थूल शरीर के ऊपर अधिक प्रभाव पड़ता और सूक्ष्म और कारण शरीर अल्प अंशों में ही प्रभावित हो पाते हैें ,वहीँ प्राणायाम तीनों शरीर का सर्वांगीण विकास करता है और तीनों को स्वस्थ रखता है । प्राणायाम से कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है , मनोबल और संकल्प बल में वृद्धि होती है और प्राणायाम की अल्फा -स्टेट व्यक्ति में धैर्य, स्थिरता एवं गहन शांति उत्पन्न करती है । 20 मिनट प्रतिदिन प्राणायाम करने से मात्र 3 महीनों में हमारा औरा [Aura] जो साधारणतया  2 से 8 इंच तक फैला होता हैं वह 6 फीट तक विस्तार पा लेता है.


इस प्रकार हमने देखा की सही वातावरण , सही पोस्चर और सही तकनीक का प्रयोग किया जाए तो प्राणायाम  और दौड़ने दोनों के अपने अपने फायदे हैं केवल अंतर इतना ही है की दौड़ने से जहां स्थूल शरीर पर अधिक असर पड़ता है वहीं प्राणायाम स्थूल-सूक्ष्म-कारण तीनों शरीरों का पोषण और सम्वर्द्धन करता है । 

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द्वारा 
गीता झा  

Thursday, May 29, 2014

प्राणायाम- रहस्य - विज्ञान

प्राणायाम का अर्थ मात्र ब्रीदिंग exercise या व्यवस्थित रूप से साँस लेना और छोड़ना मात्र ही नहीं है, अगर ऐसा होता तो इसका नाम वायु आयाम या श्वासायाम होता.

प्राण क्या है ?

प्राण एक चैतन्य ऊर्जा है जो जड़ और चेतन दोनों में व्याप्त है. चैतन्य वस्तुओं में प्राण सक्रीय या क्रियाशील दिखाई देती है और जड़ वस्तुओं में यह निष्क्रिय या सुप्त अवस्था में दिखाई देती है. प्राण सूक्ष्मतम मूलभूत तत्व है जो सृष्टि  के समस्त बल, शक्तियों और क्रिया का आधार है.


 मनुष्य जीवित रहने के लिए प्राण शक्ति को वायु, जल, सूर्य-प्रकाश, भोजन , विचारों , गहरी नींद , संतुष्ट मनःस्थिति और परिवेश से निरंतर ग्रहण करता रहता है. प्राण तत्व वायु के oxygen में प्रचुर रूप से व्यप्त है इसलिए वायु को प्राण-वायु भी कहा जाता है. लेकिन प्राण की सत्ता वायु से भिन्न है . मृत व्यक्ति को oxygen - cylinder लगा देने से भी , उसका जीवन वापिस नहीं लाया जा सकता है.

प्राणायाम क्या है ?

प्राणायाम यानि प्राण का आयाम या विस्तार . अर्थात सर्वव्यापक प्राण को निश्चित विधि द्वारा धारण कर उसका विस्तार करना. वायु में प्राण प्रचुर मात्र में पाया जाता है जिसे हम सहज में ग्रहण कर सकते हैं. श्वास -क्रिया द्वारा विश्व में व्याप्त प्राण तत्व को पर्याप्त मात्र में खींच कर शरीर  में उसका उचित भण्डारण कर,  शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य वृद्धि करने के अलावा  अनेक अतीन्द्रिय शक्तियों का स्वामी बना जा सकता है. श्वास -प्रश्वास  की लयबद्ध , तालबद्ध और क्रमबद्ध व्यवस्थित प्रक्रिया ही प्राणायाम है.
                               
     

प्राणायाम साँस की गति को तेज़ करना नहीं वरन ताल-बद्ध और क्रम-बद्ध करना है. इस ताल- लय  और क्रम में हेर फेर के आधार पर अनेक प्रकार के प्राणायाम बने हैं , जिनके विभिन्न प्रकार के प्रयोजनों की पूर्ति के लिए विविध प्रकार के उपयोग होते हैं.  

प्राणायाम की आवश्कता

शरीर की प्रत्येक  कोशिका का जीवित रहने के लिए तीन तत्वों की परम आवश्यकता  पड़ती है---रक्त, वायु और विद्युत. इन तीनों  की पूर्ति जितनी अच्छी होगी उसी अनुपात में वह कोशिका सजीव, स्वस्थ और सुदृढ़ होगी. इन तीनो में एक की भी कमी से वह कोशिका दुर्बल, निस्तेज और रुग्ण हो जाएगी. अतः स्वस्थ रहने के लिए निरंतर  रूप से इन तीनों  तत्वों की सप्लाई होती रहनी आवश्यक है .

प्राणायाम-शुद्ध वायु

सामान्यता हम उथली, आधी-अधूरी और अस्त-व्यस्त तरीके से साँस लेते हैं इससे हमारे फेफड़े का  केवल 1/6 भाग ही प्रभावित हो पता है शेष भाग निष्क्रिय अवस्था में पड़ा रहता है. फेफड़ों द्वारा प्राचुर मात्र में वायु ग्रहण न करने के कारण अधिकांश एयर-सेल्स में oxygen परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं हो पाती है. अल्प oxygen , रक्त के संचरण से दूषित कार्बनिक एसिड  शरीर को बाहर नहीं निकल पता है , यह दूषित विकार रक्त के साथ पुनः ह्रदय से फेफड़ों में भेज दिया जाता है वहां फिर उसे पर्याप्त  वायु न मिलाने से वही अशुद्ध रक्त पुनः धमनियों से पूरे शरीर में फ़ैल जाता है . इस प्रकार बीमारी, रोग और दुर्बलता का एक कुचक्र बन जाता है और अंतत व्यक्ति विशेष को अपने स्वाथ्य से वंचित हो जाना पड़ता है.



स्वास्थ्य रक्षा  हेतु रक्त का शुद्ध और सशक्त रहना आवश्यक है. रक्त के शुद्ध रहने का मुख्य आधार oxygen है. शुद्ध  रक्त का 1/4 भाग oxygen होता है. रक्त और oxygen मिल कर ही oxy -hemoglobin बनाते हैं जिसकी प्रचुरता टूटे-फूटे कोशिकाओं और दूषित और विषेले  तत्वों को बाहर निकल कर शरीर  को स्वाथ्य, उत्साह और सक्रियता प्रदान करना होता है.

प्राणायाम - जीव विद्युत

हमारे शरीर में लगभग 72,000 अति सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं. यह नाड़ियाँ मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी से निकल कर बिजली की तारों की भांति समस्त शरीर में फ़ैल जाती है. शारीरिक संस्थान में गड़बड़ी होने   से  रक्त संचार में बाधा पहुंचती है. शरीर के विभिन्न अंगों को समुचित मात्र में रक्त न मिलाने के कारण विजातीय या विषेले  तत्वों का निष्काशन नहीं हो पता है. इससे शरीर में विषाक्तता बढती है विभिन्न रोगों का आक्रमण होता हैं और मानव दुर्बल और रुग्ण हो जाता है.

ऑटोनोमस  नर्वस सिस्टम या स्वयं संचालित श्वास - प्रश्वास   क्रिया वेगस नर्व द्वारा गतिशील होती है. दायें -बाएं नासिका स्वरों के चलने से इडा-पिंगला नाड़ियों में लयबद्ध घर्षण होता है जिससे जीव -विद्युत का उत्पादन होता है और वेगस नर्व प्रभावित होती है.

वेगस नर्व का सीधा सम्बन्ध अचेतन मस्तिष्क से होता है जो शरीर में हार्मोन, नर्वस सिस्टम, माँस -पेशियों के अन्कुचन- प्रंकुचन  , विभिन्न ग्लैंड्स , कोशिकाओं और अवयवों के कार्य-पद्धतियों को निश्चित रूप से प्रभावित करता है.

प्राणायाम करने से नाड़ियों का शोधन होता है. जिससे शारीरिक और मानसिक परिशोधन होता है.

प्राणायाम - स्टेम सेल्स

स्टेम सेल्स मूलभूत कोशिकाएं होती हैं जो हमारे शरीर में 200 प्रकार की कोशिकयों का निर्माण करते हैं, यही आगे जा कर शरीर के अलग-अलग अंगों की बनावट और कार्य-प्रणाली के लिए उत्तरदायी होते हैं.



जो स्टेम सेल्स 9 महीने में पूरे एक शरीर का निर्माण करने में सक्षम हैं , प्राणायाम के द्वारा हमारे ब़ोन - मैरो  , मस्तिष्क , रीढ़, त्वचा, pancreas और रक्त नलिकाओं में प्रचुरता की मात्र में स्थित स्टेम सेल्स हमारे शरीर में बिना चीड़-फाड़ के उस जगह जा कर प्रत्यारोपित हो जाते हैं जहाँ इनकी जरुरत होती है. 
  
इस प्रकार वे वहां के रोगी कोशिका ,अवयव और अंग की मरम्मत कर उसे नवजीवन प्रदान करतें हैं. अतः प्राणायाम द्वारा हमारे शरीर के आधारभूत स्टेम सेल्स अपनी संख्या बढा कर, स्ट्रोंग होकर और oxygen से युक्त होकर क्षतिग्रस्त अंग या कोशिका को दुरुस्त करते हैं  और हमें नवजीवन और स्वास्थ्य प्रदान करते हैं.

प्राणायाम के लाभ

शारीरक

शरीर विज्ञान में मानव शरीर के अन्दर काम  करने वाली भिन्न-भिन्न प्रणालियाँ हैं. इनमें प्रमुख हैं- तंत्रिका तंत्र, ग्रंथि तंत्र, श्वास  तंत्र, रक्त परिसंचरण तंत्र  एवं पाचन तंत्र . इन सभी पर प्राणायाम का गहरा प्रभाव पड़ता है.

प्राणायाम से देह के विभिन्न हिस्सों और अवयवों पर दबाव पड़ता है. इस दबाव से उस क्षेत्र का रक्तसंचार बढ  जाता है. रक्त के दौरे सुव्यव्स्तित ही जाने से उस अंग के स्वस्थता प्रभावित होती है.

मानसिक

प्राणायाम द्वारा हमारे स्नायु - मंडल, ज्ञान तंतु और मस्तिष्क पर पूर्ण  प्रभाव पड़ता है. हमरी चेतना और बुद्धि विकसित होने लग जाती है, बुद्धि की ग्राह्यता बढ जाती है. अति सूक्ष्म विषयों को समझने की शक्ति आ जाती है.

 clairvoyance [अतीन्द्रिय ज्ञान ], telepathy [ विचार सम्प्रेषण ] , extra sensory perception [अतीन्द्रिय क्षमता] , pre- recognition [ पूर्वाभास], psychokinesis [ जड़ और चेतन को प्रभावित करना], पुनर्जनम,अध्यात्म रहस्यवाद की परतों को समझाने की क्षमता विकसित होने लग जाती है.

अध्यात्मिक

यथोचित शारीरक और मानसिक सुधार आने से आध्यत्मिक उत्थान आरंभ हो जाता है. रजोगुण और तमोगुण का नाश होता है, सतोगुण का अविर्भाव होता है.

मस्तिष्क की कल्पना, धारणा, इच्छा , निर्णय, नियंत्रण, स्मृति, प्रज्ञा आदि  शक्तियों का उत्पादन, विकास और परिमार्गन होता है. प्राणायाम के नियमित  अभ्यास से कई प्रकार की रिद्धियों-सिद्धियों की प्राप्ति सहित कुण्डलिनी-शक्ति का जागरण भी संभव हो पाता है. 

20 मिनट प्रतिदिन प्राणायाम करने से मात्र 3 महीनों में हमारा औरा [Aura] जो साधारणतया  2 से 8 इंच तक फैला होता हैं वह 6 फीट तक विस्तार पा लेता है. प्राणायाम एक हानिरहित योगाभ्यास है. शारीरिक , मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य और  विकास के लिए हमें नियमित प्राणायाम करना चाहिए.

 द्वारा 

गीता  झा