आधुनिक युग में आकर्षण का सिद्धांत अर्थात् Law of Attraction और अभिव्यक्ति की शक्ति अर्थात् Manifestation को लेकर लाखों पुस्तकें, सेमिनार और वीडियो उपलब्ध हैं, जहाँ यह बताया जाता है कि केवल अपने विचारों को सकारात्मक बनाइए, कल्पना कीजिए, विज़ुअलाइज़ेशन कीजिए और विश्वास रखिए, तो ब्रह्मांड आपकी इच्छाओं को वास्तविकता में बदल देगा, किंतु यदि यह इतना सरल होता तो आज तक हर साधारण व्यक्ति अपने सपनों को सहजता से साकार कर चुका होता, परंतु वास्तविकता यह है कि बहुत-से लोग इन तकनीकों को अपनाने के बाद भी असफल रहते हैं, उनकी अभिलाषाएँ अधूरी रह जाती हैं और वे यह मानने लगते हैं कि शायद यह सिद्धांत केवल काल्पनिक है, जबकि सच्चाई यह नहीं है, सच्चाई यह है कि इन आधुनिक विधियों में दो सबसे महत्त्वपूर्ण और सूक्ष्म रहस्यों की अनुपस्थिति है, पहला है प्राण शक्ति का विज्ञान और दूसरा है दिव्य मन (Superconscious Mind) का उपयोग, क्योंकि आजकल की सभी तकनीकें केवल सचेत मन (Conscious Mind) और अवचेतन मन (Subconscious Mind) पर आधारित हैं, लेकिन मानव चेतना का सबसे प्रबल स्तर दिव्य मन है और उसके सक्रिय होने के बिना न तो विचार को वास्तविक शक्ति मिलती है और न ही वह ब्रह्मांड की असीमित ऊर्जा से जुड़कर परिणाम उत्पन्न कर पाता है; प्राण शक्ति इस प्रक्रिया का ईंधन है और दिव्य मन वह इंजन है, यदि दोनों अनुपस्थित हों तो केवल चेतन और अवचेतन स्तर पर खेला गया यह खेल कभी वास्तविकता तक नहीं पहुँचता; यह समझना आवश्यक है कि विचार केवल एक हल्की तरंग है, वह केवल सचेत मन में जन्म लेता है, अवचेतन उसे स्मृति और आदतों में ढाल सकता है, किंतु वास्तविकता में परिवर्तन तभी होता है जब यह विचार प्राण से संचारित होकर दिव्य मन तक पहुँचता है और वहाँ से ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़कर ठोस ऊर्जा के रूप में वापस आता है; यही कारण है कि ऋषि-मुनियों ने ध्यान, प्राणायाम, साधना और मंत्रजप को Manifestation की मूल कुंजी माना, क्योंकि इन साधनाओं के बिना प्राण जागृत नहीं होता और दिव्य मन सक्रिय नहीं होता; आज के अधिकांश Law of Attraction गुरु केवल “सोचो और पाओ” पर ज़ोर देते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते कि सोच में प्राण का संचार कैसे होगा, और प्राण के बिना विचार उसी तरह निष्प्राण होता है जैसे बिना हवा का दीपक बुझा हुआ; इसी प्रकार दिव्य मन के बिना विचार केवल व्यक्तिगत स्तर पर सीमित रह जाता है, वह सार्वभौमिक ऊर्जा से जुड़ ही नहीं पाता, परिणामस्वरूप Manifestation अधूरा रह जाता है; उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति सचेत मन से यह सोचता है कि उसे धन चाहिए, अवचेतन में वह दिन-रात धन की कल्पना करता है, परंतु यदि उसके विचारों में प्राण की ऊर्जा नहीं है और यदि वे दिव्य मन से जुड़कर ब्रह्मांड में संप्रेषित नहीं होते, तो उसकी सारी कोशिशें खोखली रह जाएँगी; यह ठीक वैसा है जैसे कोई कंप्यूटर बिना इंटरनेट कनेक्शन के केवल अपने डेस्कटॉप पर फाइल सेव करता रहे, वह कभी विश्व से जुड़ नहीं पाएगा, उसी तरह बिना दिव्य मन के विचार कभी ब्रह्मांडीय नेटवर्क से जुड़ नहीं सकते; प्राण लय विज्ञान हमें सिखाता है कि जब हम श्वास पर ध्यान केंद्रित करके, प्राणायाम द्वारा प्राण शक्ति को जागृत करते हैं और फिर उस जागृत प्राण को किसी विचार और कल्पना में प्रवाहित करते हैं, तो वह विचार केवल मानसिक छवि नहीं रह जाता बल्कि वह उर्जामय हो जाता है और फिर ध्यान व साधना के माध्यम से जब वह दिव्य मन से जुड़ता है तो संकल्प में रूपांतरित होता है, यही संकल्प ब्रह्मांड की शक्तियों को आकर्षित करके परिणाम उत्पन्न करता है; इसीलिए वेद और उपनिषदों में संकल्प शक्ति को देवत्व का अंग माना गया है और कहा गया है कि “यथा संकल्पः तथा सिद्धिः” अर्थात जैसा संकल्प वैसा ही सिद्धि का परिणाम, किंतु यह संकल्प तभी शक्तिशाली बनता है जब उसमें प्राण और दिव्य मन का समावेश हो, अन्यथा वह केवल साधारण इच्छा रह जाती है; आज के समय में लाखों लोग केवल Affirmations, Visualization और Positive Thinking तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि Affirmation तभी असर करता है जब वह प्राण से भरा हो, Visualization तभी फलता है जब वह दिव्य मन में प्रवेश कर ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ जाए और Positive Thinking तभी वास्तविकता बदल सकती है जब वह साधारण विचार न रहकर प्राण-प्रेरित संकल्प बन जाए; यही कारण है कि हजारों लोग Law of Attraction की पुस्तकों को पढ़ने और तकनीकों का अभ्यास करने के बाद भी बार-बार असफल होते हैं, क्योंकि उनकी प्रक्रिया अधूरी होती है—उसमें न प्राण विज्ञान का समावेश होता है और न ही दिव्य मन का; इसीलिए Manifestation की असफलता का असली कारण यही है कि हम केवल दो स्तर—चेतन और अवचेतन—पर रुक जाते हैं, लेकिन तीसरा और सबसे शक्तिशाली स्तर दिव्य मन और उसका वाहक प्राण शक्ति को भूल जाते हैं; जब तक साधक इन दो सूक्ष्म रहस्यों को नहीं समझता और उन्हें अपनी साधना का अंग नहीं बनाता, तब तक उसकी सारी मेहनत केवल कल्पना और मानसिक खेल भर रह जाएगी, वास्तविक परिणाम कभी नहीं देगा; अतः निष्कर्ष यही है कि Law of Attraction और Manifestation को सफल बनाने के लिए केवल मन के दो स्तरों को नहीं, बल्कि प्राण शक्ति और दिव्य मन को जागृत करना अनिवार्य है, क्योंकि यही वे दो सूक्ष्म रहस्य हैं जो विचार को संकल्प बनाकर ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ते हैं और फिर उसे वास्तविकता में ढालते हैं, और जब तक यह नहीं होता Manifestation हमेशा अधूरा ही रहेगा।