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Monday, August 3, 2020

विभाजित संपत्ति और अविभाजित जिम्मेदारियां

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आज हमारे भारतीय समाज में थोक के भाव बहनों ने भाईयों के ऊपर पैतृक सम्पति को लेकर कोर्ट केस किया हुआ हैं. हमारे समाज में जहाँ सगे भाईयों और गोतिया में सम्पति के बंटवारे को लेकर तलवारें खिंची रहती हैं वहां बहनों का यह एलाने- जंग कुछ गंभीर मुद्दों को उठता हैं. यह मुद्दा जहाँ वैधानिक ,सामाजिक और आर्थिक हैं वहीँ इसके मनोवैज्ञानिक पहलूओं पर भी नज़र डालनी चाहिए.

 

कुछ एक साल पहले हमारे भारतीय समाज़ की एक नव-विवाहित लड़की ने बहुत महत्पूर्ण सवाल उठायाथा.उस लड़की का विवाह एक अत्यंत प्रतिष्टित परिवार में हुआ था. ससुराल में सास ससुर के अलावा उसकी पांच ननदें थी. विवाह के कुछ समय पश्चात ही ननदों ने मायके में पूर्वजों की पैतृक सम्पति पर अपना अधिकार माँगा. सास- ससुर भी सहृदय अपनी पुत्रियों को हिस्सा देने को तैयार हो गए. गौर करने की बात यह हैं की उन पांचो ननदों का विवाह सम्मानित और समृद्ध परिवारों में हुआ हैं और उनके पत्तियों की प्रस्थिति काफी अच्छी थी,तथा उनका विवाह भी प्रचुर दान -दहेज़ देकर किया गया था.

 तब पुत्र -वधु ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही उसने कहा की उत्तराधिकार के बंटवारे के साथ कर्तव्यों का भी बंटवारा होगा . अगर सम्पति के 6 हिस्से हुए तो माता- पिता जी, जो अब तक बेटे- बहु के साथ रहते थे अब साल के दो महीने हरेक संतान के साथ रहेंगे .इस प्रकार माता पिता साल में केवल दो महीने ही बेटा-बहु के साथ रहेंगे. 

यह सुन कर बेटियों ने विद्रोह कर दिया और कहा की अगर वो माता- पिता को रखेंगी तो उनके अपने सास-ससुर कहाँ जायँगे ? इस पूरे प्रकरण में विचारने योग्य तथ्य यह हैं की सास ने खुद अपनी ननदों को अपने ससुराल की सम्पति में से फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी.लेकिन अपनी समृद्ध बेटियों को वो उत्तराधिकार में हिस्सा दे रहीं हैं.

यह महिलाओ की जटिल और दोहरी मानसिकता हैं. उनकी ननद या बेटी की ननद अगर अपनी पैतृक सम्पति में अपना हिस्सा मांगती हैं तो वो लालची और घर तोड़ने वाली होती हैं ,लेकिन यही काम अपनी बेटी करती हैं तो वो जरूरतमंद और वैधानिक होती हैं.

'येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:। '  (इस श्लोक या मन्त्र का अर्थ है कि जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें  बांधती हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा| हे रक्षे!( रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। )कहते हुए ना जाने कितनी बार हमने अपने भाईयों की कलाइयों में राखी बांध कर आजीवन अपनी रक्षा का वचन माँगा हैं. आज हमें यकीन नहीं रहा की भाभी के आने के बाद वही भाई हमारी रक्षा करनेका टाइम निकाल सकता हैं.खून पानी से गाढ़ा ही होता हैं , विपत्ति पड़ने पर प्रत्येक भाई अपनी बहन की रक्षा करेगा ही, इस पर विश्वास करना चाहिए. यदि हम बहने अपने मायके में अपने अधिकारों की मांग भी करती हैं हमें अपने ससुराल की बेटियों को भी उनका हक़ देना चाहिए और अधिकारों की मांग के साथ अपने कर्तव्यो को निभाने की कुब्बत भी होनीचाहिए. 

वैधानिक कानून सामाजिक परिवर्तन नहीं ला सकते हैं.जब हमारे हृदय परिवर्तित होंगे तभी समाज बदलेगा ,और फिर अपने भाई की एक मुस्कान के ऊपर तीनों जहान की दौलतें कुर्बान.

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वन्दना तिवारीवन्दना तिवारी

मन के झरोखे से दिखने वाले दृश्य मेरे विचारों में अभिव्यक्ति पाते हैं।

Tuesday, November 21, 2017

प्रेम का आरम्भ होता है अंत नहीं ।



 प्रेम एकांगी होता है इसलिए इसका आदि होता है अंत नहीं । कलम टूट जाने से भी मस्तिष्क में भरी विद्या का अंत नही होता है ।  प्रेम का आरम्भ होता है अंत नहीं । क्योंकि न उससे निवृति मिलती है और न उसकी पूर्ति होती है । इसलिए प्रेम को नित्य कहा जाता है । आज जिसे लोग प्रेम कहते  हैं , वह किसी दूसरे के साथ खुद को बाँधने का,खुद की पहचान बनाने का एक तरीका है , एक आर्ट है , एक तकनीक है । आसक्ति प्रेम नहीं है । आसक्ति का प्रेम से कोई लेना देना भी नही है ।

आसक्ति काफी सुविधाजनक है जैसे सजावटी प्लास्टिक के फूल । आपके अहंकार को यह पुष्टि देता है , मैं कितना  महान  हूँ मैंने इसे चाहा  ! अगर आप किसी के प्रति आसक्त होंगें  तो उसके व्यवहार, स्वभाव और  प्रतिक्रिया से आपके मन में बैचनी, डर , आशंका और पागलपन धीरे धीरे घर करने लगेंगें । आसक्ति आपको  भावनाओं के एक ऐसे हाई वे पर ले जाती है  जिसका आखिरी पड़ाव पागलपन ही होता है ।  आपकी आसक्ति जिसके प्रति है आप उसके साथ एक होना चाहेंगें। ...... वह उपस्थित है तो आप प्रसन्न होते हैं और अगर अनुपस्थित है तो आप दुखी होते हैं । यह विशुद्ध गणित है निज़ी लाभ -नुकसान का ,प्रेम नहीं  ।सारी शर्तें ,चालाकियां, स्वार्थ , प्रपंच, गणित आसक्ति के  लिए होते है ,प्रेम के लिए नहीं ।

जीवन में कई व्यक्ति प्रेम की असफलता का रोना रोते हैं, कहते हैं हमने तो मन से प्रेम  किया था और बदले में हमें बेवफाई ही मिली । बदले के लिए किया गया प्रेम विशुद्ध व्यापार है , एक बाज़ी है जिसमें  हार भी हो सकती है और जीत भी । सामने वाला यदि अधिक उस्ताद हुआ तो अपना दांव  चलकर अलग हो सकता है ।  आसक्ति जड़ चीज़ों या शरीर से की जाती है  लेकिन प्रेम आत्मा से ही किया जा सकता है । इसलिए जिनके प्रेम के पीछे चाहे  कितनी भी चालाकी से छुपाई हुई भोग की इच्छा होती है उनमें चुभन, पीड़ा , बैचनी ,बेबसी ,निराशा,विरह,वेदना के दर्शन होने आम बात हैं । मतलब के लिए गधे को बाप बनाने की नीति आजकल हर  कोई जानता है । खुशामद , चापलूसी , भुलावा देने वाली मीठी बोली बोलने की कला का अब काफी लोग इस्तमाल करते हैं ।  मछुवारे जिस प्रकार आटे की गोलियां दिखा कर मछलियों को जाल में फांस लेते  हैं उसी प्रकार नकली प्रेम का प्रलोभन दिखा कर कितने ही ठग  दूसरों का सर्वस्व ठग लेते हैं । बंधन में केवल शरीर बंधता है आत्मा नहीं ।  इसलिए जिनसे प्रेम करना हो उसके शरीर पर घात न लगाईं जाए,और  जिसका शरीर भोगना हो उसके साथ प्रेम का नाटक न किया जाए यही उचित है । शाहरुख़ खान का ऐ-दिल-है-मुश्किल में एक बेहतरीन डायलॉग था ...मुझे सबा से बेइंतहा मोहब्बत करने के लिए सबा की ही ज़रूरत नहीं , हो सकता है इससे कोई बेहतर इश्क़ ?   

मोह,वासना , आसक्ति और आत्मीयता में परिणाम और प्रतिदान की अपेक्षा की जाती है । प्रेम इससे ऊँची चीज है । यह न किसी पर अहसान करने के लिए किया जाता है और न ही प्रतिदान के लिए । प्रेम में न शिकायत की गुंजायश है, न ही असफलता की । 

लिप्सा , तृष्णा, और वासना आमतौर से प्रेम का आवरण ओढ़कर सामने आती हैं । जिस पदार्थ या व्यक्ति की आज बहुत उत्कंठा थी वह मिल जाने के बाद अरुचिकर बन जाता है । यही कारण है की न तो भोग से तृप्ति मिलती है और न भोग्य पदार्थों की एकरूपता से । न मिलने तक वस्तु के केवल गुण दिखाई देते हैं पर मिलने के बाद कल्पना का नशा समाप्त हो जाता  है और उसके  विकार, दोष, दृष्टि में आते हैं और प्रेम  का सारा नशा काफ़ूर हो जाता  है । दूर से जो चीज़ जितनी प्रिय लगती है वे जैसे ही जितनी समीप आती है उतना ही अपना आकर्षण खो देती हैं । विवाह से पूर्व प्रेमिका या मंगेतर जितनी सुहावनी और आकर्षक लगती हैं , विवाह होने के बाद पत्नी बन जाने के बाद सारा आकर्षण रफ्फूचक्कर हो जाता है । इसी कारण पुरुष और स्त्रियां प्रेम के नाम पर नई नई आकृतियों की खोज करते रहते हैं क्योंकि शरीर में रुचिकर लगने वाले तत्वों से अरुचिकर लगने वाले तत्वों की मात्रा कम नहीं ,अधिक ही है । 

आजीवन हम सब दूसरों से प्रेम की भिक्षा मंगाते चले जाते हैं । बचपन में जवानी में और बुढ़ापे में भी हमारी प्रेम की मांग बनी रहती है । क्योंकि हमें गलतफहमी होती है की दूसरों से मिला प्रेम , हमरे अन्दर के प्रेम को बड़ा देगा ।लेकिन जो चीज़ मिलने से बढ़ जाए वह कुछ और होगा प्रेम नहीं ।

अगर किसी को प्रेम देने से आपको लगे की आपमें कोई कमी हो गई है , तो समझ लेना चाहिए की प्रेम का अनुभव ही नही हुआ है ।
 अगर आप किसी को प्रेम देते हैं और भीतर लगता है की कुछ खाली हुआ है , तो समझ लेना चाहिए की जो आपने दिया है वह कुछ और होगा , प्रेम कदापि नहीं होगा । अगर आपको लगे की आपके प्रेम करने से कुछ प्रेम कम हो रहा है तो आप प्रेम की अनुभूति से कोसों दूर हैं ।  

 प्रेम में आपको भौतिकता की सीमा को तोडना होगा , प्रेम  निजी फायदे किए लिए नहीं है,सच्चा प्रेम खुद को मिटाने का एक तरीका है  । हम खुद के मैं को मिटाने से  डरते हैं इसलिए आसक्ति की तरफ सहज आकर्षित हो जाते हैं । इससे अपना  अहम भी बना रहता है ,  और झूठी तसल्ली भी बनी रहती है कि  हम प्रेम करने के महारथी हैं ।


जब आप प्रेम में होते हैं वह भी सच्चे तो आपके भौतिक शरीर की सीमाएं टूट  जाती हैं । प्रेम आपके शरीर को स्पंदनों से भर  देता है  और हो सकता है आपकी आँखों में आँसू भर जाएँ या आपका गला रुंध जाए । प्रेम एक मनोदशा है,  एक मनोवृति है, जो मिटने की कला जानते हैं वही  सच्चा प्रेम कर सकते हैं । 


कभी कभी लगता है मैंने उसे इतना चाहा ,  बदले में मुझे कम मिला या कुछ भी नहीं मिला या मेरे  धोखा हुआ , तो निश्चिन्त रहिये आप आसक्ति की गिरफ्त में हैं प्रेम की नहीं । जो बांटने और देने से घट जाता है वह वासना है,आसक्ति है  । उसे भूलकर भी प्रेम नहीं समझना ।आसक्ति , काम और वासना को नापा जा सकता है केवल प्रेम ही एक ऐसी immeasurable unit है जिसको नापा नहीं जा सकता है , यह अमाप है । 


प्रेम प्रार्थना है । एक सच्चा प्रेमी वही है जो प्रताड़ना, ईर्ष्या , दोषारोपण, माल्कियत की भावना से मुक्त होता है ।  मैंने  तुझे प्रेम किया इतना ही काफी है । बदले में कुछ भी प्रतिकार चाहने वाला कुछ और कर सकता है लेकिन सच्चा प्रेम नहीं कर सकता है । 


अधितर प्रेम का अर्थ लोग एक प्रकार के एकाधिकार या माल्कियत से लेते हैं । जिस क्षण आप  प्रेम के नाम पर किसी भी जीवित चीज़ पर अपना अधिकार जमाते हैं , आप  उसे मार डालते हैं । तब आप  चिंतित होंगें  , आपको  लगेगा की आपने  तो प्रेम किया लेकिन सामने वाले ने आपको   धोखा दिया । याद रखिये  यदि आपको  सच्चा प्रेम होगा तो आप  कभी भी असुरक्षित, भयभीत और ईर्ष्यालु नहीं महसूस करेंगें  । 


प्रेम अध्यात्म की पहली और आखिरी सीढ़ी है । जो व्यक्ति प्रेम को समझ लेता है वह परमात्मा को समझने की फ़िक्र छोड़ देता है । प्रेम और परमात्मा एक ही डायमेंशन की चीजें हैं । प्रेम चरम नियम है ।  

Tuesday, February 2, 2016

प्रेम चरम नियम है




एक चीज़ होती है प्रेम और दूसरी चीज़ होती है आसक्ति या मोह । आज जिसे लोग प्रेम कहते  हैं , वह किसी दूसरे के साथ खुद को बाँधने का,खुद की पहचान बनाने का एक तरीका है , एक आर्ट है , एक तकनीक है । आसक्ति प्रेम नहीं है । आसक्ति का प्रेम से कोई लेना देना भी नही है । 

आसक्ति काफी सुविधाजनक है जैसे सजावटी प्लास्टिक के फूल । आपके अहंकार को यह पुष्टि देता है , मैं कितना  महान  हूँ मैंने इसे चाहा  ! अगर आप किसी के प्रति आसक्त होंगें  तो उसके व्यवहार, स्वभाव और  प्रतिक्रिया से आपके मन में बैचनी, डर , आशंका और पागलपन धीरे धीरे घर करने लगेंगें । आसक्ति आपको  भावनाओं के एक ऐसे हाई वे पर ले जाती है  जिसका आखिरी पड़ाव पागलपन ही होता है ।  आपकी आसक्ति जिसके प्रति है आप उसके साथ एक होना चाहेंगें। ...... वह उपस्थित है तो आप प्रसन्न होते हैं और अगर अनुपस्थित है तो आप दुखी होते हैं । यह विशुद्ध गणित है निज़ी लाभ -नुकसान का ,प्रेम नहीं  । 

 प्रेम में आपको भौतिकता की सीमा को तोडना होगा , प्रेम  निजी फायदे किए लिए नहीं है,सच्चा प्रेम खुद को मिटाने का एक तरीका है  । हम खुद के मैं को मिटाने से  डरते हैं इसलिए आसक्ति की तरफ सहज आकर्षित हो जाते हैं । इससे अपना  अहम भी बना रहता है ,  और झूठी तसल्ली भी बनी रहती है कि  हम प्रेम करने के महारथी हैं ।

जब आप प्रेम में होते हैं वह भी सच्चे तो आपके भौतिक शरीर की सीमाएं टूट  जाती हैं । प्रेम आपके शरीर को स्पंदनों से भर  देता है  और हो सकता है आपकी आँखों में आँसू भर जाएँ या आपका गला रुंध जाए । प्रेम एक मनोदशा है,  एक मनोवृति है, जो मिटने की कला जानते हैं वही  सच्चा प्रेम कर सकते हैं । 

कभी कभी लगता है मैंने उसे इतना चाहा ,  बदले में मुझे कम मिला या कुछ भी नहीं मिला या मेरे  धोखा हुआ , तो निश्चिन्त रहिये आप आसक्ति की गिरफ्त में हैं प्रेम की नहीं । जो बांटने और देने से घट जाता है वह वासना है,आसक्ति है  । उसे भूलकर भी प्रेम नहीं समझना ।आसक्ति , काम और वासना को नापा जा सकता है केवल प्रेम ही एक ऐसी immeasurable unit है जिसको नापा नहीं जा सकता है , यह अमाप है । 

प्रेम प्रार्थना है । एक सच्चा प्रेमी वही है जो प्रताड़ना, ईर्ष्या , दोषारोपण, माल्कियत की भावना से मुक्त होता है ।  मैंने  तुझे प्रेम किया इतना ही काफी है । बदले में कुछ भी प्रतिकार चाहने वाला कुछ और कर सकता है लेकिन सच्चा प्रेम नहीं कर सकता है । 

अधितर प्रेम का अर्थ लोग एक प्रकार के एकाधिकार या माल्कियत से लेते हैं । जिस क्षण आप  प्रेम के नाम पर किसी भी जीवित चीज़ पर अपना अधिकार जमाते हैं , आप  उसे मार डालते हैं । तब आप  चिंतित होंगें  , आपको  लगेगा की आपने  तो प्रेम किया लेकिन सामने वाले ने आपको   धोखा दिया । याद रखिये  यदि आपको  सच्चा प्रेम होगा तो आप  कभी भी असुरक्षित, भयभीत और ईर्ष्यालु नहीं महसूस करेंगें  । 

जो व्यक्ति प्रेम को समझ लेता है वह परमात्मा को समझने की फ़िक्र छोड़ देता है । प्रेम और परमात्मा एक ही डायमेंशन की चीजें हैं । प्रेम चरम नियम है ।

Monday, January 25, 2016

दो कलियाँ !!






रानी ने पहले गिल्ली जमीन पर  सेट की जैसे ही उसने डंडे से उसे मारने के लिए डंडा घुमाया तो साथ खेल रहे राजू ने उसका हाथ हिला दिया , गिल्ली हवा में तो उडी पर डंडे से ना टकराई और डंडा सायं की आवाज के साथ गिल्ली को मिस करता हुआ हवा में घूम गया ... राजू की इस नापाक हरकत पर  रानी की आँखों से अंगारे बरसने लगे , उसने आव देखा ना ताव  , एक  जोर का डंडा राजू को रसीद कर दिया और वहां  से उडन छु हो ली ....

डंडे की चोट से बिलबिलाया राजू , उसे कोसने लगा , की आज के बाद, वह  उसके साथ कभी नहीं खेलेगा और उसकी मम्मी से जाकर शिकायत करेगा ...पर रानी इन सबसे बेपरवाह , एक  तितली की तरह उडती हुई , कॉलोनी के  दुसरे छोर तक पहुँच गई ...

उसने अभी अपनी सांसे स्थिर की थी की , पास वाले फ्लैट के नीचे  खड़ी उसकी हम उम्र की लड़की खड़ी, रानी और राजू की लड़ाई दूर से देख रही थी , रानी को वहां  देख , वह  उसे टुकुर टुकुर ताकने लगी ...उसने रानी से पुछा , तुम्हारा उस लड़के से झगड़ा क्यों हुआ, क्या तुमने उसे मारा ? रानी ने हँसते हुए कहा , मुझसे चालाकी कर रहा था , मैंने भी एक  लगा दिया , रानी ने उस लड़की को आज से पहले वंहा कभी ना देखा था , उसने जिज्ञासा में उससे पुछा, तुम लोग इस कॉलोनी  में ,क्या नए आए हो ?

इसपर  उस लड़की ने अपनी तोतली आवाज में बताया , की वह अपने मामा के साथ, इस फ्लैट  में दो दिन पहले ही शिफ्ट हुई है , रानी को उस भोली लड़की की आँखों में एक  मासूमियत सी लगी , जो उसे अपने साथ खेलने वाले बच्चो से जुदा करती थी , उसने लड़की से उसका नाम पुछा , लड़की ने बताया , उसका नाम पूजा है .....

रानी ने पूजा से कहा , क्या वह उसके साथ बैट बाल या कंचे खेलेगी , रानी की बात सुन पूजा हँसने  लगी और बोली , अरे तुम तो लड़के वाले खेल खेलती हो , मैं तो यह सब खेल नहीं खेलती ... पूजा की बात सुन, रानी को जिज्ञासा हुई की , आखिर पूजा लडकियों वाले कौन से खेल  खेलती है ?...

पूजा, रानी को अपने साथ अपने घर ले गई , जन्हा दोनों ने थोड़ी देर स्टापू और लंगड़ी टांग खेला , रानी को वोह खेल इतना अच्छा लगा की, अगले दिन, रानी ने अपनी सब सहेलियों को पूजा के घर के पास बने पार्क में बुला लिया , जन्हा उन सबने मिलकर लंगड़ी टांग , पिट्ठू और खो जि भरकर खेला ....

धीरे धीरे रानी और पूजा की दोस्ती दिन बा  दिन गहरी होती गई , दोनों एक  साथ पढ़ती ,स्कूल जाती , खेलती और कई बार तो , घर वाली की नज़र  बचा कर चुपके एक दूसरे  का हाथ पकडे अकेले दिल्ली की ट्राफिक भरी सडक पर पास वाले बाजार की सैर  भी कर आती ...

कुछ दिनों से राजू , रानी का इंतजार कर रहा था , की कब वह  आए और वह  उसके साथ खेले , पर रानी तो घर पर मिलती ही ना थी , एक  दिन , राजू उसे ढूंढता  हुआ पास वाले पार्क में पहुंचा तो देखा , रानी और पूजा दोनों मिलकर झूले पर झूल रही थी , राजू दोनों के पास गया और बोला , मुझे भी अपने साथ खिलाओ ना ... उसकी यह बात सुन रानी ने उसका मजाक बनाया और बोली , उस दिन तो तू , मेरी मम्मी से शिकायत करने गया था , आज फिर यहां क्यों आया है? मुझे तेरे साथ अब नहीं खेलना , मुझे तो पूजा के साथ झुला झूलने में मजा आ रहा है और ऐसा कह पूजा और रानी, राजू पर हंस दी ....

उन दोनों को यूँ खेलता और हँसता देख राजू रुवांसा हो गया , उसके बाल मन में समझ ना आया की वोह , रानी को अपने साथ खेलने के लिए कैसे मनाये , उसने रानी से कहा  , अगर वह  उसे भी झूले पर खिलाये तो , वह  उन दोनों को अपने घर से चॉक्लेट  और मिठाई लाकर देगा , राजू की बात सुन पूजा का दिल मिठाई खाने के लिए मचल गया , उसने रानी से कहा , चल इसे भी खिला लेते है , अगर यह मिठाई और चॉक्लेट  लाने के लिए तैयार है? ...

रानी ने बड़ी दरियादिली से कहा , पहले लेकर आ , फिर तुझे अपने साथ खिलायंगे , राजू दौड़ता हुआ अपने घर गया और , चुपके से कुछ चॉक्लेट  और मिठाई अपनी जेब में भर कर पार्क में ले आया ...पूजा और रानी ने , उसे आता देखा, तो , दोनों के शैतानी दिमाग में एक  कीड़ा कुलबुलाया , पूजा ने रानी के कान में कुछ कानाफूसी की , जिसका मतलब राजू के समझ ना आया , रानी और पूजा ने मिलकर पहले राजू की लाइ चीज़ें खाई और फिर उससे कहा अगर उसे भी झूले पर झुलना है , तो पहले उन दोनों को उसे झुलाना होगा ... मरता क्या ना करता , राजू , दोनों को झूले पर  झुलाने के लिए तैयार हो गया ...

जब दोनों लड़कियां काफी देर झूलकर थक गई तो अपने अपने घर जाने लगी , राजू बोला , अरे मेरी बारी तो आई ही नहीं , पूजा और रानी ने एक  दूसरे  को देख कर  कहा , चल झूले पर बैठ तुझे भी झुला दे ... राजू जैसे झूले पर बैठा , पूजा झूले के पीछे चुपके से गई और झूले को धक्का दे दिया , राजू अपना संतुलन बना ना पाया और धडाम की आवज के साथ जमींन पर गिरा और रोने लगा , उसे रोता देख पूज और रानी वहां से चुपके से भाग गई ....

भागते भागते दोनों , पार्क के पास लगे जामुन के पेड़ के नीचे  आकर रुक गई , पके हुए जामुन देख पूजा का दिल उन्हें खाने के लिए मचलने लगा , उसने रानी से कहा , अगर वह  उसकी सबसे अच्छी सहेली है तो उसे जामुन तोड़कर खिलाये , पूजा की बातों  में आ , रानी पेड़ पर चढ़ गई और वहां  से जामुन तोड़कर नीचे  गिराने लगी , नीचे खड़ी  पूजा ने ढेर सरे जामुन जब अपनी फ्रॉक में भर लिए तो , रानी से बोली अब तू नीचे  आ जा ... रानी जोश में पेड़ पर चढ़ तो गई , पर जैसे ही नीचे  देखा तो डर के मारे उसकी साँस अटक गई , वह  जोर जोर से रोने लगी , उसे यूँ रोता देख पूजा डर गई और जामुन लेकर वहां  से घर चली आई ....

पूजा तो चली गई , अकेली रानी पेड़ पर चढ़ी थी और उतारने वाला आस पास कोई ना था , ऐसे में उसका डर और बढ़ गया , उसने जोर जोर से रोना शुरू कर दिया , उसकी आवाज सुन , पास में काम कर रहा माली आया और उसे पेड़ से नीचे  उतरा , माली ने उसे कहा , अगर अगली बार वह  पेड़ पर चढ़ी तो , फिर कभी नहीं उतारेगा , रानी ने उसकी बातों  को एक  अच्छे बच्चे की तरह मान लिया , पर जैसे ही पेड़ से नीचे  उतरी, तो फुर्र से भाग निकली और बोली , मैं कल फिर से पेड़ पर चढ़ जाऊंगी ....

काश  उस वक़्त रानी को , कोई समझा पाता , आज जिस दिलेरी, सहास  और विश्वास का परिचय वह  दे रही है , आने वाली जिन्दगी में यही विश्वास , उसके साथ विश्वासघात , यही दिलेरी उसके मन में कमजोरी और यही साहस , उसके पाँव की बेडी बन जाएगा ....

पूजा घर आ तो गई , पर उसके मन में एक  चोर था , की उसने रानी को अकेला क्यों छोड़ दिया , इसी सोच में डूबे हुए , उसने अपने साथ लाये जामुन भी नहीं खाए ,अगले दिन वह  सुबह सुबह रानी के घर, उसकी खोज खबर लेने पहुँच गई , वहां  रानी उससे नाराज बैठी थी , पूजा को आया देख, उसने पूजा से बात नहीं की , पूजा ने उसे खूब मनाया और अपनी गलती के लिए कान पकडे  और जब अपने साथ लाये जामुन रानी को दिए, तब जाकर रानी का दिल पसीजा , फिर से दोनों सहेलियां नयी शरारत करने में लग गई ....

वक़्त के साथ दोनों की शरारत बढती ही जाती थी , राजू भी अब इन दोनों शैतान की खालाओं  से दूरी  बनाकर रखता , पता नहीं कब वह  उसका उल्लू बन कर , उसे बहला फुसला कर उससे खाने की चीजे घर से मंगवाती और मौका देख उन्हें हडप लेती और जब वोह खेलने जाता तो दोनों किसी न किसी बहाने उसे जमींन पर  गिरा देती ... शायद ऊपर वालो को, राजू पर रहम आगया , एक  दिन पाइप से कूदते हुए, पूजा ने अपना पैर तुडवा लिया ....

पूजा के पांव पर  प्लास्टर क्या चढ़ा , रानी का खेलना कूदना और शरारतें  करना सब कुछ दिनों के लिए उसके घर वालो ने बंद करा दिया , पर रानी का दिमाग था की एक  जगह टिकता ना था , उसे व्यस्त  करने के किये ,उसके पिता ने उसे लाइब्रेरी से खूब सारी कहानी की किताबें  और नॉवेल  लाकर दे दी,  ताकी , रानी इधर उधर कूद फांद करने के बाजए अपना वक़्त अच्छी किताबों  को पढने में लगाये ...

कुछ ही दिनो में रानी ने वह  सारी किताबो पढ़ डाली , एक  दिन बोर होते हुए ,रानी ने अपनी मम्मी से कहा वह  पूजा के घर जाना चाहती है , ताकि उसका हाल चाल पूछ सके , रानी की मम्मी ने एक  बिस्कुट का पैकेट लाकर उसे दिया और बोली , जब पूजा से मिलो तो उसे दे देना , उसे अच्छा लगेगा ...

बिस्कुट का पैकेट हाथ में लिए रानी, पूजा के घर जा रही थी और रास्ते में सोच रही थी की , उसके घर जाकर दोनों मजे से बिस्कुट खायंगे , कॉमिक्स पढेंगे और फिर गुडिया के साथ खेलेगी , फिर उसके मन में विचार आया ,कहीं  पूजा ने जामुन की तरह सारे बिस्कुट खुद खा लिए तो , उसे कुछ ना मिलेगा  , तभी उसका मन हुआ , क्यों ना अपने हिस्से का बिस्कुट अभी खा लिया जाए और ऐसा सोच उसने एक  बिस्कुट अपने मुँह  में डाल लिया , रानी जब तक पूजा के घर पहुंची तो आधा पैकेट उसके हाथो शहीद होकर उसके पेट में आराम फरमा रहा था....

रानी अपने साथ पूजा को दिखाने के लिए, अपने पापा की लाई कॉमिक्स और कहानियों  की किताबे भी साथ ले गई , वहां  रानी ने पहली बार पूजा के साथ बैठ कर ढेर सारी कॉमिक्स और कहानिया पढ़ी , जिन्हें अकेले पढने में उसे इतना मजा ना आया था ...बस उसके बाद तो दोनों जैसे एक किताबों  की दीवानी हो गई ....जब भी उन्हें मौका मिलता दोनों अपनी अपनी कॉमिक्स , लोटपोट , नंदन , एक  दुसरे से अदल बदल कर लेती ....

इन्सान भी अजीब किस्म का जानवर है ,जिसे जीवन में बहुत से काम अकेले करने में वह  आनंद नहीं आता , जो किसी सच्चे साथी के साथ आता है ... जैसे घूमना फिरना , मूवी देखना , बाहर  खाना आदि , अकेले करने में जैसे इन सबका आनंद कहीं  खो सा जाता है ....

जैसे जैसे वक़्त बीतता गया और दोनों लड़कियां की दोस्ती वक़्त के साथ गहरी होती जा रही थी, जिसमे एक  दूसरे  के लिए कुछ भी कर गुज़रने  का जज्बा रहता ....दोनों अब बचपन से युवावस्था में पहुँच चुकी थी , शायद रानी के अंदर रिश्तो और दोस्ती को निभाने की भूख पूजा से कंही ज्यादा थी , इसलिए कई बार वह  ऐसे काम भी कर बैठती , जिन्हें करने के बाद उसे भी लगता , क्या उसे ऐसा करना चाहिए था? ...

जब दोनों लड़कियां जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी , तो दोनों के अन्दर एक  दुसरे के प्रति अपनी सुन्दरता को लेकर एक  कम्पटीशन सा होता , रानी अपने लम्बे बालों पर इतराती , वहीँ  पूजा अपने हलके साफ रंग से, रानी को खिजाती , इसका परिणाम यह निकलता, अगले दिन रानी अपना गेहुयाँ  रंग रगड़ रगड़ कर चमकाने बैठ जाती , वहीँ  पूजा अपने बालों को लम्बा करने के लिए नए नए नुस्खे अपनाती , इस चक्कर में दोनों नए नए शैम्पू और क्रीम बाजार से खरीद कर लाती , जिसका असर कई बार उल्टा भी हो जाता , फिर दोनों देसी नुस्खो को अपने ऊपर लगा कर देखती की उनकी सुन्दरता में कोई फर्क आया की नहीं ? ....

बचपन की वह  मासूम शरारतें  , जैसी जवानी की आदतें  बनती जा रही थी, रानी के ऐसे बिंदास अंदाज और खुले व्यवहार  को देख जहां उसके माता पिता इतराते , उन्हें लगता की, उनकी बेटी किसी भी तरह की समस्या से नहीं डरती , वह  तो आज के ज़माने की आयरन लेडी है ....

जो बच्चे बचपन में जितने शरारती होते है , अक्सर उनकी मौज मस्ती, सिर्फ बचपन तक ही सिमित रह जाती है , ना जाने क्यों, भविष्य उन्हें, उनकी बचपन की शरारतो के बदले, जवानी में खून के आंसू देता है...



रानी पढने में में जितनी होशियार थी , उतनी ही पूजा घर के काम में तेज थी , जहां रानी के लिए साइंस और मैथ बांये हाथ का खेल होता वहीँ  पूजा को उनके नाम से बुखार आ जाता , पूजा इतिहास , भूगोल जैसे रटने के विषय तो अच्छे से कर लेती , पर दिमाग चलाने के समय , उसे जैसे बिछु काट लेता , ऐसे ही एक  दिन, रानी पूजा के घर गई तो देखा पूजा गुमसुम सी उदास बैठी थी , उसने पूजा से पुछा क्या हुआ , तो पूजा ने रोते हुए कहा उसका मैथ का पेपर ख़राब हो गया है , अगर अम्मी को पता चला की मैं फ़ैल हो गई हूँ , तो वह  बहुत गुस्सा करेगी , रानी ने पूजा से कहा इसमें परेशानी वाली क्या बात है , मैथ की टीचर मिस शर्मा तो उसे बहुत मानती है , वह  चुपके से उसके कमरे में जाकर उसकी कॉपी में नंबर बदल देगी , पूजा को विश्वास ना हुआ , की रानी इतने जोखिम का काम भला क्यों और कैसे करेगी? .....

रानी का दिमाग , अपने साथ के बच्चो से कहीं  तेज चलता था , वह  मिस शर्मा के कमरे में उनसे कोई सवाल पूछने के बहाने गई और चुपके से मौका देख पूजा की कॉपी में 2  के आगे 1  लगा कर आ गई , अब पूजा के 20 में से 2  की जगह 12  नंबर हो गए ....

काश  रानी ने उस वक़्त समझा होता , जिस टीचर का भरोसा आज वह , अपने दोस्त की खातिर   तोड़ रही है , कल ऐसे ही उसका भरोसा भी, कोई अपने रिश्तेदार की खातिर तोड़ देगा .....

पूजा और रानी ने अपने बचपन और जवानी में में शरारतो की नयी नयी इबारते लिखी , रानी अक्सर लड़कों  से बहस बाजी करने का मौका ना छोडती , अगर कोई लड़का गलती से रानी पर  कोई कमेंट कर देता तो रानी उसे एक  दो थप्पड़ भी लगा देती , इसके विपरीत पूजा , अपनी  मोहक अदाओं  से उन्हें दीवाना बना कर उल्लू बनाती ,फिर भी दोनों  के दिल के अन्दर मानवता को लेकर एक  जूनून था ... अगर उन्हें कहीं  कोई पंछी का बच्चा घोसले से कहीं  गिरा हुआ मिल जाता , वह  उसे, उसके घौसले  में जरुर रखती , अक्सर चिड़िया उन दिनों घर के पंखो से टकरा कर मर जाती थी , तो दोनो मरी हुई चिड़िया को घर के बाहर  ले जाकर , उसकी  समाधि  बना कर उसे जमींन में दफना देती ....

रानी ने पूजा से अपनी दोस्ती बड़ी शिद्दत से निभाई , शायद उसके मन में रिश्तों  को निभाने की भूख पूजा से ज्यादा थी , अक्सर पूजा अपनी जरूरतों  में इस कदर खो जाती , की , कभी उसे ख्याल भी ना आता की , ऐसा करने से रानी जाने , अनजाने अपने ऊपर एक  अनजाने अपराध का बोझ ढो रही है ....

 दो दिनों से रानी को पूजा दिखाई नहीं दी , वह  उसकी खोज खबर लेने घर पहुंची तो पता चला की उसकी आँखों में conjunctivitis हो गया , ऐसे में बाहर  जा भी नहीं सकती थी ...रानी ने उससे कहा , तू घर में आराम कर , मैं अपने क्लिनिक से तेरे लिए दवाई लेकर आती हूँ और ऐसा कह , वह  अपने पिता के सरकारी क्लिनिक पहुँच गई ...

क्लिनिक में डॉक्टर ने उसे देखा और आँखों का मुआयना करने लगा , रानी का दिल जोर जोर से धडक रहा था , वह  बहाना बना कर आ तो गई थी पर उसे लग रहा था की कहीं  डॉक्टर उसके झूठ को पकड ना ले , डॉक्टर ने टोर्च मारकर उसकी आँखे देखि और बोला अरे तुम तो अपना बंगाली लड़की है , रानी ने डरते हुए अपनी गर्दन हिला दी , डॉक्टर को लगा यह तो उसकी अपनी बिरादरी की लड़की है , बस उसने भी जोश में ज्यादा छानबीन करे बिना , रानी को दवाई दे दी, वहां  से दवाई ले रानी इकदम से छू  मंतर हो ली ....

रानी की ऐसी नादान हरकते जहां  पूजा के प्रति उसके लिए दोस्ती का जज्बा बढ़ा देती , वहीं  ऐसे बाते उसके घर वालो को एक  गलत सन्देश देती , उन्हें लगता उनकी बेटी आम लडकियों जैसी कमजोर नहीं है यह तो किसी भी समस्या से लड़ सकती है और किसी भी तरह के लड़के को अच्छे से हैंडल कर सकती है ....इसलिए घरवालो को उसकी शादी और पढाई की ज्यादा फ़िक्र ना होती ...

काश  उन्हें मालूम होता , उनकी बेटी के अंदर एक  मासूम दिल है ,जिसके अन्दर, प्रेम की एक  ना मिटने वाली भूख है , जिसे भरने के लिए वह  , रिश्तो की खातिर , उन्हें बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है ....उस वक़्त रानी को यह पता ना था , जिस दिलेरी और हौंसले  से वह  यह छोटे मोटे कामो को अंजाम दे रही है , वही दिलेरी , आने वाले जीवन में उसका कड़ा इम्तिहान लेगी...  

भारतीय संस्कृति और सभ्यता जैसे उन दोनों में कूट कूट कर भरी थी , जहां  उस ज़माने में लड़कियां आए दिन बॉयफ्रेंड बनाती , दोनों इन सबसे दूर , अपना समय सिलाई , कढाई और पढाई में लगाती ....लड़के तो रानी के पास आने से घबराते की कब उसका दिमाग गर्म हो जाए और वह उन्हें एक  थप्पड़ खींच  कर लगा दे .....इसके विपरीत पूजा लडको के सामने इतनी सहमी सी रहती , की किसी भी लडको को उसमे कोई आकर्षण ना लगता ...

आज भी रानी और पूजा अपनी अटूट दोस्ती को किसी तरह कायम किये हुए है , इतनी गहरी दोस्ती होने के बाद भी पूजा और रानी, एक दूसरे  के दिलों के जख्मों  से अनजान है ...

Tuesday, December 1, 2015

स्वस्थ दाँत और सुंदर मुस्कान

 शालिनी  और रेखा [ परिवर्तित  नाम : ) ]  मेरे बचपन की सखियाँ हैं और दिल्ली में रहती हैं । अक्सर लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के माध्यम से उन लोगों से विचारों का आदान प्रदान होता  रहता है । कुछ एक दिन पहले दोनों ने मुझे बताया की उन दोनों ने डेंटिस्ट से अपॉइंटमेंट ली है शालिनी को ब्रश करते समय मसूड़े से खून आता था और रेखा के दांतों में काफी टार्टर और plaque जमा  हुआ था  जिससे उसकी हंसी  में चार चाँद नहीं लग पाते थे । आजकल तो दिल्ली में प्रदूषण और खराब पानी की वजह से काफी छोटी उम्र में डेंटिस्ट के चक्कर लगने शुरू हो जाते हैं । दिल्ली में कई इलाकों में सप्लाई या अंडर ग्राउंड वाटर  का TDS [Total Dissolved Solids ] 1000mg/L  से अधिक रहता है जबकि इसकी अधिकतम सेफ लिमिट BIS [The Bureau of Indian Standards ] के अनुसार 500 ppm से अधिक नहीं  होनी चाहिए । TDS में कैल्शियम, फॉस्फेट , नाइट्रेट्स ,सोडियम ,पोटैशियम ,क्लोराइड ,आयरन के अतिरिक्त मिट्टी के कण भी पाये जाते हैं ।

पीने योग्य और खाना पकाने  योग्य पानी तो RO फ़िल्टर से उपलब्ध हो जाता है लेकिन मुंह धोने के लिए अक्सर नल का पानी  ही प्रयोग में लाया जाता है । पहले जब हम लोग छोटे थे तो घर  में साधरण टूथ पेस्ट या मंजन के आलावा नमक और  सरसों के तेल से भी दांतों   को साफ करने लिए के लिए प्रेरित किया जाता था इससे दांत और मसूड़े दोनों स्वस्थ  रहते थे ।

खैर हमने अपनी सखियों के कहा की दांतों को सुपर वाइट बनाने वाले तथाकथित ब्लीच युक्त टूथपेस्ट [ जैसे सोनम कपूर का एक टूथपेस्ट का  विज्ञापन जिसमें उसके दांत अननैचरल  वाइट लगते हैं ]  के साथ साथ डेंटिस्ट से 4-5  सिटींग में दांतों की स्केलिंग, प्रोफेशनल क्लीनिंग या ओरल प्रोफिलैक्सिस  करवाने से पहले यदि वो  इस कारगार नुख्से को अपना सकती है तो  न केवल उन्हें  अपनी अपनी समस्याओं  से निज़ात ही मिलेगी बल्कि  डेंटिस्ट के पीड़ादायक उपचारों  से मुक्ति भी मिलेगी ।

इसमें जरुरत है मात्र 

 एक चुटकी भर  ...... Eno की   

Eno पाउडर के प्रति 5  ग्राम के सेशे में

2. 32 ग्राम सोडिम बई कार्बोनेट (46% बेकिंग सोडा )
2. 18 ग्राम सिट्रिक एसिड  (44% )
0. 50 ग्राम अनहयड्रोस सोडियम कार्बोनेट ( 10%  सोडा एश )
 होता है ।
Eno पेट की एसिडिटी कम करने के साथ साथ बेकरी में बहुलता से प्रयोग में लाया जाता है ।

विधि

अपनी एक हथेली पर चुटकी भर Eno ले फिर उस पर 1-2  बूंदें साफ़  पानी की डाल लें इससे उसमें झाग उठने  लगेगा  और फिर अपने टूथब्रश  पर कोई भी रेगुलर टूथपेस्ट लगा लें फिर उस झाग युक्त Eno से अच्छी तरह मिला लें फिर  उस मिश्रण से दांतों और  मसूड़ों को अच्छी  तरह से धीमे धीमे ब्रश करें । ऊपर के दांतों को  ऊपर से नीचे की दिशा में और  नीचे के दांतों को नीचे  से ऊपर की दिशा में ब्रश करें साथ ही  मसूंडों  पर भी बिलकुल हल्के हाथ से  सर्कुलर मोशन में ब्रश करें । इसके बाद  अच्छी तरह से कुल्ला करके टंग क्लीनर से जीभ साफ़ कर लें ।

मैंने उन्हें कहा की दांतों की नियमित सफाई करने के साथ साथ वे हफ्ते में 2 बार ही Eno वाला प्रयोग करें  फिर  दो हफ़्तों के बाद हफ्ते में एक बार ही यह प्रयोग करें । ऐसा  नियमित करने से  उनके दांत और मसूड़े दोनों   स्वस्थ रहेंगें ।

अभी तक मेरी सखियों ने केवल दो बार ही इस विधि का प्रयोग किया और उन्हें काफी अंशों में अपनी अपनी समस्या से मुक्ति मिल गई है ।

केवल यह धयान रखें की इस विधि का बहुलता से प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि Eno में उपस्थित तत्व ओर्थोडोंटिक ग्लू को गला  सकते हैं इसलिए जिन्हें  braces  लगे हों या दाँतों में फिलिंग को उन्हें इस प्रयोग से बचना चाहिए ।

“Keep smiling, because life is a beautiful thing and there's so much to smile about.”

By 
Vandana Tiwari 



Monday, June 15, 2015

वक्त ने किया क्या हसीं सितम


वक्त ने किया क्या हसीं सितम
तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम

बेकरार दिल इस तरह मिले
जिस तरह कभी, हम जुदा न थे
तुम भी खो गये, हम भी खो गये
एक राह पर चल के दो कदम

जायेंगे  कहाँ, सूझता नहीं 
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है, कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिन ख्वाब दम-ब-दम