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Sunday, March 3, 2019

महामृत्युंजय मन्त्र !!!!

शिव तत्व

विश्व भर में जो मूल प्रकृति ईश्वरी शक्ति है , उस प्रकृति द्वारा पूजित देव शिव कहलाते हैं . “ शि ” का अर्थ है पापों का नाश करने वाला और “व ” कहते हैं मुक्ति देने वाले को . शिव में दोनों गुण हैं . शिव वह मंगलमय नाम है जिसकी वाणी में रहता उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं . शिव शब्द कल्याणकारी है और कल्याण शब्द मुक्तिवाचक है . यह मुक्ति भगवान शंकर से प्राप्त होती है अतः वे शिव कहलाते हैं . भगवान शिव विश्वभर के मनुष्यों का सदा “शं ” या कल्याण करते हैं और कल्याण मोक्ष को कहते हैं इसलिए वे शंकर भी कहलाते हैं .

शिव अखंड , अनंत , निर्विकार , चिदानंद, परमात्मा तत्व हैं . जो अनन्त अन्तःकरणों माया भेद में प्रतिबिम्बित होते हैं. अंतःकरण गत प्रतिबिम्बित ही जीव कहलाता है और मायागत प्रतिबिम्बित ही ईश्वर कहलाता है .

शिव ही समस्त प्राणियों के अंतिम विश्राम के स्थान हैं . अनंत पापों से उद्गिन होकर विश्राम के लिए प्राणी जहाँ शयन करे, उसी सर्वाधिष्ठान , सर्वाश्रय को शिव कहा जाता है .

जागृत , स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं से रहित , सर्व दृश्य , विवर्जित, स्वप्रकाश, सच्चिदानंद परब्रह्म ही शिव तत्व है . शिव ही परम शिव और दिव्य शक्तियों को धारण कर अनंत ब्रह्मांडों का उत्पादन, पालन और संहार करते हुए ब्रह्म, विष्णु शंकर आदि संज्ञाओं को धारण करते हैं .

मृत्यु और अमृत तत्व

जब शरीर निश्चेष्ट हो जात है और उसमें चेतन का कोई भी लक्षण नही रहता है तो हम कहते हैं की उसकी मृत्यु हो गई है . स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर का अलग हो जाना ही मृत्यु है . मृत्यु के उपरांत जीव नया शरीर धारण करता है . वर्तमान शरीर को त्याग कर शरीरांतर ग्रहण करने पर भी जिन्हें पूर्व जन्म की स्मृति बनी रहती है उनकी मृत्यु , मृत्यु नहीं कही जाती है क्योंकि उनके ज्ञान की सन्तति विच्छिन्न नही होती है . उन्हें “इच्छा मृत्यु ”या “अमर ”आदि नामों से भी पुकारा जाता है . उन्होंने अमृत तत्व का लाभ कर लिया होता है . नए - नए शरीर में प्रवेश करने पर भी उनका ज्ञान और पूर्व जन्म की स्मृति लुप्त नही होती है . वे “जाति – स्मर ” कहलाते हैं .

अज्ञान युक्त देहादि प्रकृति के परिवर्तन के साथ “मैं ” भी परिवर्तित हो रहा हूँ , इस प्रकार का ज्ञान होना ही अज्ञान है . परिवर्तन का नाम ही मृत्यु है और इससे विपरीत ज्ञान की , प्रकृति के परिवर्तन के साथ मेरा परिवर्तन नहीं होता है , यही ज्ञान ही अमृत तत्व है . परिवर्तन शील “मैं ” के अन्दर एक नित्य स्थिर “मैं ” है जिसका परिवर्तन नहीं होता है , जो इन सारे परिवर्तनों का साक्षी है और उन्हें परिवर्तन रूप से जानता है .

ऐसे मुक्त- पुरुष संसार के बंधन से मुक्त हो जाने पर जीवों के कल्याण हेतु एक या अधिक बार शरीर धारण कर जगत में आवागमन करते हैं . ये लोग मृत्यु तथा प्राण तत्व पर विजय प्राप्त किये रहे हैं और मृत्यु इनके वशवर्ती रहती है. अमृत्व तत्व धारण करने के कारण ये सदा नित्य , ज्ञानमय और आनंदमय भाव में अवस्थित रहते हैं .

महामृत्यंजय मन्त्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीयमामृतात् ॥

हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की अराधना करते हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं. उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए. जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा उनके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं .

महामृत्युंजय शिव

मृत्यु पर जय प्राप्त करने वाले और अमृत का लाभ करने वाले मृत्युंजय हैं . शास्त्रों में मृत्युंजय महादेव के ध्यान के जो श्लोक मिलते हैं उनमें वेदोक्त त्र्यम्बक मन्त्र से मृत्युंजय शिव का स्वरूप जाना जा सकता है . भगवान मृत्युंजय के जप ध्यान की विधि मार्कंडेय , राजा श्वेत आदि के काल भय निवारण की कथा शिवपुराण , स्कन्ध पुराण , काशी खंड, पद्मपुराण आदि में आती है . आयुर्वेद ग्रंथों में मृत्युंजय - योग मिलते हैं .

महामृत्युंजय शिव का स्वरुप

त्र्यम्बकं शिव अष्ठभुज हैं . उनके एक हाथ में अक्षमाला और दुसरे में मृग - मुद्रा है , दो हाथों से दो कलशों में अमृत रस लेकर उससे अपने ऊपर मस्तक को आप्लावित कर रहे हैं और दो हाथों से उन्हें उन्होंने अमृत कलशों को थामा हुआ है .




दो हाथ उन्होंने अपने अंक पर रख छोड़े है और उनमें दो अमृत पूर्ण घट है . वे पद्म पर विराजमान है , मुकुट पर बाल चन्द्र सुशोभित है जिसकी अमृतवृष्टि से उनका शरीर भींगा हुआ है , ललाट पर तीन नेत्र शोभायमान हैं , उनके वाम भाग में गिरिराजनान्दिनी उमा विराजमान हैं . ऐसे देवाधिदेव श्री शंकर की हम शरण ग्रहण करते हैं .

शिव सदैव अमृत रूप हैं और अमृत में ही सराबोर रहते हैं .

मृत्युंजय शिव का आध्यत्मिक रहस्य

अमृत प्रवाह नाडी, स्पंदन अथवा गति के सूचक है . जिन दो धाराओं के द्वारा शिव अपने मस्तक को सदा आप्लावित करते हैं , वे गंगा - यमुना, सूर्य - चन्द्र के प्रवाह की इड़ा और पिंगला नाडी है, जो रज और तम की वाचक हैं . इन्हीं दोनों शक्तियों के कारण ही जगत की जागतिक क्रिया कलाप होते हैं . जब दोनों शक्तियाँ साम्यावस्था में होती हैं तो तभी प्रकृति -ज्ञान रूप का या सरस्वती का प्रवाह दृष्टिगत होता है, यही सुषुम्ना अथवा विशुद्ध सत्त्व है .

त्र्यम्बकेश्वर शिव के महा मृत्युंजय मन्त्र के जाप से इन दोनों धाराओं को शुद्ध और समन्वित कर मध्यम स्थित सुषुम्ना को जागृत कर विशुद्ध सत्त्व तत्व की प्राप्ति की जा सकती है . ऐसे जातक जगत के परिवर्तन अथवा मृत्यु के राज्य से त्राण पा लेते हैं .

महामृत्युंजय मन्त्र के जाप से लाभ

मृत्युंजय शिव संसार की समस्त औषधियों के स्वामी, मृत्यु के नियंत्रक , आरोग्य और स्वास्थ्य के प्रदाता हैं . इस जटिल और तनाव युक्त जीवन में इस मन्त्र द्वारा अकस्मित दुर्घटनाओं से जीवन की रक्षा की जा सकती है . रोगों का निवारण भी किया जा सकता है . भाव, श्रद्धा तथा भक्ति से इस मन्त्र का जाप करने पर भयंकर व्याधियों का भी विनाश हो सकता है . यह मन्त्र मोक्ष साधन है और दीर्घायु, शन्ति, धन -संपत्ति , तुष्टि तथा सदगति भी प्रदान करता है .


This is powerful healing with the grace of Lord Maha Mritunjay. Maha Mritunjay mantra has a vibration frequency of around 490 Hertz. So, this works very fast. This is an accurate system in the world, based on the present mental state of the person and can remove the evil plenary affecting our lives and bring positive effects. This is a powerful and accurate technique to remove almost all life problems.


द्वारा
गीता झा

Wednesday, October 30, 2013

The Super Mantra - Gayatri


Gayatri Mantra  

 The gayatri mantra occurs in Rig Veda and reads as “Om we

meditate on the radiance of that Supreme Divine Being, the

 creator of the world planes –earth, heaven and those spaces in

between. May that Divine Being direct our intelligence. 

Gayatri Mantra as a Power Store house 


 
Gayatri Mantra is the Mother of all the 4 Vedas. All the sciences and knowledge of the world rest in Gayatri and in fact they form only a minor part of Gayatri's Super Power storehouse. Gayatri Mantra is supreme amongst all Mantras because it bestows its devotees with a pure and focused intellect. 
Gayatri Mantra awakes Chakras 


 According to Chandogya Upanishad, this entire cosmos is Gayatri-manifest. Mere chanting of the Gayatri Super Mantra (Japa) awakens and evolves many powerful and secret Chakras (plexus) that lie in the deep recesses of ones soul. 

Adi Shankaracharya on Gayatri Mantra  
According to India's great philosopher Adi Shankaracharya Gayatri is a direct manifestation of non-dual (Advaita) Brahman (God or cosmic consciousness). 

 Gayatri Mantra for Self- Realization


When a pure minded devotee performs Gayatri worship and devotion he/she not only attains God/Self Realization but also all material and spiritual means required for attaining world peace and brotherhood. Any spiritual aspirant who understands and imbibes the deep imports of Gayatri meditation/devotion ‘conquers' the entire cosmos (refer to Brihadaranyak Upanishad).  

Gayatri Mantra builds strong Will  

Gayatri means that divine power which helps the devotee, attain a strong will power for his/her material and spiritual benefit. 

Gayatri mantra as a tool to overcome all obstacles



If a person who daily faces the wrath of illnesses, loss of wealth, court cases, enmity, joblessness, household strife, difference of opinion, debt etc patiently and unswervingly meditates/worships Gayatri he/she will attain a sacred and focused psyche which will help the devotee overcome all obstacles mentioned above. 

Great    Attainments 
Vedmaataa Gayatri promises to bless devotees with a healthy body, strong will power, name and fame, wealth, property etc. material and spiritual powers automatically manifest in the lives of mature Gayatri devotees without asking or yearning for them. 

At the subtle level a true Gayatri devotee attains God Realization. Hence this is a very important and priceless spiritual practice. 
Divine powers 
Indian scriptures have described the 8-fold Sidhis and 9-fold Nidhis (divine powers and glories). When Gayatri devotee starts maturing spiritually i.e. when his/her psyche starts becoming more focused and taintless (taints are anger, lust, greed, arrogance, lack of ethics/human values etc) all the above mentioned material and divine glories start manifesting in his/her life. 
Physical, mental and spiritual purification
A devotee of Gayatri attains an attractive personality, eyes radiate brilliance, speech becomes powerful and a divine halo/aura surrounds his/her entire body. Such a devotee ceaselessly experiences the presence of a divine force in his/her soul, there is great repentance felt even if he/she thinks of acting untowardly, circumstances of sorrow and strife are faced with intense patience and this devotee can foresee future events. These are a few important attainments that manifest in the lives of mature Gayatri devotees who have not only focused their psyche but have also purified it.
Upward movement of inner consciousness 



The boons and curses bestowed by a Gayatri devotee do show results and they can easily read the minds of other beings. Not only can such a devotee induce desirable thoughts in the minds of others but can also positively use his/her divine energy for world welfare. The atmosphere surrounding such devotees is indeed sacred and they can hear divine sounds and perceive divine light in all 3 states of life viz. waking, dreaming and deep sleep. 

Tuesday, July 16, 2013

मन्त्र - सिद्धि

मन्त्र क्या है ?

मननात् त्रायते इति मन्त्रः

जिसके मनन से त्राण मिले वह मन्त्र है . यह अक्षरों का ऐसा दुर्लभ एवं विशिष्ट संयोग है , जो आन्तरिक और बाह्य चेतना जगत को आंदोलित, आलोड़ित एवं उद्वेलित कर देता है .





मन्त्र का कोई अर्थ हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है . यह एक पवित्र विचार भी हो सकता है और नहीं भी हो सकता है . जैसे गायत्री महामंत्र सृष्टि का सबसे पवित्र विचार है उसमें परमात्मा से सभी के लिए सदबुद्धि एवं सन्मार्ग की प्रार्थना की गई है. लेकिन मन्त्र को किसी विचार की संकरी सीमाओं में नही बांधा जा सकता है . कई बार मन्त्र के अक्षरों का संयोजन इस परकार होता है की उनका कोई अर्थ निकलता है और कई बार संयोगं इतना अटपटा होता है की इसका कोई अर्थ नही खोजा जा सकता है .


दरसल मन्त्र की संरचना किसी विशेष अर्थ या विचार को ध्यान में रख कर नहीं की जाती है . इसका तो एक ही मतलब है की ब्रह्मांडीय उर्जा की किसी विशेष धारा से संपर्क, आकर्षण, धारण और उसके सार्थक नियोजन की विधि का विकास .


मन्त्र की संरचना कौन करने का अधिकारी है ?

मन्त्र कोई भी हो वैदिक, पौराणिक या तांत्रिक यह बात ध्यान में रखनी चाहिए की इनकी संरचना या निर्माण कोई बौद्धिक क्रियाकलाप नहीं है . कोई भी व्यक्ति भले ही वह कितना ही बुद्धिमान या प्रतिभा शाली क्यों न हों मन्त्रों की संरचना नहीं कर सकता है.मन्त्रों की संरचना वही कर सकता है जो तप साधना के शिखर पर पहुँच कर सूक्ष्म दृष्टा और दिव्य दर्शी बन गया हो .



ये महा साधक अपने तपोबल के माध्यम से ब्रह्मांडीय उर्जा के विभिन्न और विशिष्ट धाराओं को देखने में सक्षम होते हैं . मन्त्रों की अधिष्ठात शक्तियां जिन्हें देवी या देवता कहा जाता है , उन्हें प्रत्यक्ष करते है. और उस प्रत्यक्ष शक्ति के बिम्ब के रूप में मन्त्र का संयोजन उनकी भावचेतना में प्रगट होता हैं . उसे ऊर्जा धारा या देवशक्ति का शब्द रूप भी कह सकते हैं .

या कई बार ध्यान और तप की उच्च स्तिथि में तत्व दर्शी साधक के अंतर्मन में मन्त्रों के प्रवाह का जो चित्र बनता है उसी के आधार पर उसके अधिनायक देवताओं या दिव्य शक्तियों की आकृति का आंकलन किया जाता है .

मन्त्र विद्या में इसे देव शक्ति का मूल मन्त्र कहते हैं . इस देव शक्ति के उर्जा अंश के किस आयाम को और किस प्रयोजन के लिए ग्रहण-धारण करना है उसी के अनुसार उस देवता के अन्य मन्त्रों की संरचना या निर्माण किया जाता है . इसलिए एक देवी या देवता के अनेकों मन्त्र हो सकते है. प्रत्येक मन्त्र अपने विशिष्ट प्रयोजन को सिद्ध और सार्थक करने में समर्थ होता है .


मन्त्र सिद्धि क्या है ?

मन्त्र साधना का एक विशिष्ट क्रम पूरा होने पर साधक की चेतना का संपर्क ब्रह्माण्ड की विशिष्ट धारा या देव शक्ति से हो जाता है . साधक के कई अतीन्द्रिय केंद्र जागृत हो जाते है, और वह मन्त्र के देवशक्तियों के सूक्ष्म विशिष्ट धारा को ग्रहण करने धारण करने और उनका नियोजन करने में पूर्णतः समर्थ होता है . देवशक्ति के ऊर्जा शक्ति को अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व में धारण करना ही मन्त्र सिद्धि कहलाता है.

मन्त्र सिद्धि कैसे हो ?

मात्र मन्त्रों को रटने और दोहराने भर से मन्त्र सिद्धि नहीं होती है . कई बार वर्षों से साधना करने और कई करोड़ मन्त्र जाप करने के बाद भी साधक को निराशा ही हाथ लगती है. और कई बार मन्त्र जाप का अत्यंत अल्प या आधा - अधूरा फल ही मिलता है। इस स्थिति के लिए मन्त्र नहीं बल्कि साधक ही जिम्मेदार होता है .

मन्त्र सिद्धि में चार तथ्य सम्मिश्रित रूप से काम करते है . इन चारों तथ्यों का जहाँ जितने अंश में समावेश होगा वहां उतने ही अनुपात में मन्त्र शक्ति का प्रतिफल , चमत्कार और सिद्धि दृष्टिगत होगी :

1 . ध्वनि विज्ञान के आधार पर विनिर्मित शब्द श्रृंखला का चयन और उसका विधिवत उच्चारण .
2 . साधक की संचित प्राणशक्ति और मानसिक एकाग्रता का संयुक्त समावेश .
3 . मन्त्र-जाप में प्रयुक्त होने वाली भौतिक उपकरणों की सूक्ष्म शक्ति .
4 . साधक की अपनी भावना, आस्था, श्रद्धा, विश्वास और उच्चस्तरीय लक्ष्य .

मन्त्र सिद्धि की सफलता का 3 /4 भाग इन्हीं चार तथ्यों पर आधारित है , विधि विधान को 1 /4 ही महत्त्व दिया गया है . इन दिनों आविश्वास , अन्यमनस्कता , उपेक्षा , उदासीनता अस्त-व्यस्त और मनमौजी ढंग के साथ साधक चिरकाल व्यतीत हो जाने और लम्बा कष्ट साध्य अनुष्ठान करने पर भी मन्त्र सिद्धि नही कर पाते हैं क्योंकि वे जीवन-साधना की उपेक्षा कर केवल विधि-विधान को ही सब कुछ मान बैठे हैं . ऐसे में सदा निराशा ही हाथ लगती है .

मन्त्र सिद्धि का विज्ञान

मन्त्र की एक प्रगट ध्वनि होती है जो वायु माध्यम में यात्रा करती है . दूसरी अप्रगट ध्वनियों होती हैं जो सूक्ष्म माध्यमों में यात्रा करती है . प्रथम अप्रगट ध्वनि सूक्ष्म प्राणशक्ति होती है जो ईथर माध्यम में यात्रा करती है और ईथर से भी सूक्ष्मतम अप्रगट ध्वनि भाव-शक्ति होती है जो आकाश माध्यम में यात्रा करती हैं .

वायु के कम्पन नष्ट हो जाते हैं लेकिन ईथर और आकाश तत्व के कंम्पन सदेव यथावत बने रहते हैं . वायु से ईथर और ईथर से आकाश माध्यम के परमाणु अधिक सूक्ष्म, सम्वेदनशील, शक्तिशाली और उत्तरोतर अधिक कम्प्पन वाले परमाणुओं से बने होते है. अतः ध्वनि तरंगों से तीव्र गति से उसकी प्राणशक्ति की तरंगें और प्राणशक्ति से भी तीव्र उसकी भावशक्ति की तरंगें चलती है .

ध्वनि की गति साधारणता बहुत धीमी होती है और साधरण अवस्था में यह 3 3 4 मीटर प्रति सेकंड की गति से ही चल पाती है . लेकिन रेडियो प्रसारण में एक छोटी सी आवाज़ [ साउंड वेव ] को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स [ जिसकी गति 1लाख 8 6 हज़ार मिल प्रति सेकंड होती है ] के ऊपर सुपर इम्पोज [ modulation ]कर दिया जाता है जिससे वह आवाज़ पलक झपकते ही सारे संसार की परिक्रमा कर लेने जितनी शक्तिशाली बन जाती है .



इसी प्रकार मन्त्र साधना में उच्चारित किये गए शब्द ध्वनियों को प्राण और भाव की शक्तिशाली तरंगों के ऊपर सुपर इम्पोज कर दिया जाता है जिनसे मन्त्र की शब्द शक्ति असीम विद्युत शक्ति में परिवर्तित हो जाती है तीव्र गति से चलते हुए कुछ की क्षणों में देव - शक्ति से टकरा जाती है , फिर उस देव शक्ति के स्थूल और सूक्ष्म प्रभाव साधक में परिलक्षित होने लग जाते हैं . यही मन्त्र सिद्धि की अवस्था होती है .

भावशक्ति और प्राणशक्ति युक्त मन्त्र [ ध्वनि ] अनंत ब्रह्माण्ड के साथ साथ अंतर्चेतना को भी प्रभावित करने में पूर्ण सक्षम होते हैं .


मन्त्र सिद्धि के लक्षण


जब मंत्र ,साधक के भ्रूमध्य या आज्ञा -चक्र में अग्नि - अक्षरों में लिखा दिखाई दे, तो मंत्र-सिद्ध हुआ समझाना चाहिए.

जब बिना जाप किये साधक को लगे की मंत्र -जाप अनवरत उसके अन्दर स्वतः चल रहा हैं तो मंत्र की सिद्धि होनी अभिष्ट हैं.

साधक सदेव अपने इष्ट -देव की उपस्थिति अनुभव करे और उनके दिव्य - गुणों से अपने को भरा समझे तो मंत्र-सिद्ध हुआ जाने.

शुद्धता ,पवित्रता और चेतना का उर्ध्गमन का अनुभव करे,तो मंत्र-सिद्ध हुआ जानें .

मंत्र सिद्धि के पश्च्यात साधक की शारीरिक,मानसिक और अध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति होनें लग जाती हैं.



मन्त्र शक्ति वह तालबद्ध, समयबद्ध,क्रमबद्ध, अनुशासन बद्ध और विधानबद्ध ध्वनि - विज्ञान है जो प्रकृति को , वस्तुओं को , परिस्थियों को , वातावरण को और ब्रह्माण्ड को प्रभावित रखने की पूर्ण क्षमता रखता है.


By
Geeta  jha