रघुनाथ चरित्र है सौ करोड़,
अक्षर महापातक कर दे छोर।
श्यामवर्ण, जटामुकुट धार,
स्मरण करूँ सीता संग प्रभार।
अजन्मा, सर्वव्यापक राम,
राक्षस-संहार, लीला महान।
खड्ग, तुणीर, धनुष सजाएँ,
जगत की रक्षा हेतु आएँ।
पाठ करूँ मैं स्तोत्र महान,
पाप नष्ट, कामना दे दान।
सिर, ललाट राघव बचाएँ,
दशरथसुत शुभ रक्षा करें।
नेत्र बचाएँ कौशल्या नंदन,
श्रवण करें प्रिय विश्वामित्र जन।
घ्राण यज्ञ-रक्षक संभालें,
मुख रक्षा सुमित्रा-वत्स पालें।
जिह्वा विधि की रक्षा पाए,
कंठ भरत-वंदित संग आए।
कंधे, भुजाएँ दिव्य आयुध धारें,
शिवधनु-भंजक राम उबारें।
सीतापति हाथों का मान बढ़ाएँ,
हृदय खर-वधकर्ता सहेजें।
मध्यभाग और नाभि की रक्षा,
जाम्बवान आश्रयदाता रक्षक।
सुग्रीव पति कमर संभालें,
हनुमान प्रभु हड्डी बचाएँ।
राक्षस-विनाशक राघव रक्षा,
रानों की शुभ मंगल रचना।
सेतुकृत जानु संभालें,
दशानन-वधकर्ता चरण सवारे।
विभीषण-प्रिय श्रीराम रक्षा,
सम्पूर्ण शरीर पर कृपा सदा।
भक्ति से जो पाठ करे,
वह दीर्घायु, सुख-संपन्न भरे।
पाताल, पृथ्वी, आकाश में जो,
न पहुँच सकें राम रक्षक वरण हो।
राम-नाम का जो स्मरण करे,
पाप बंधन से वह मुक्त फिरे।
भोग और मोक्ष दोनों पाए,
सिद्धियाँ सभी हाथों में आएँ।
राम कवच जो जपे निरंतर,
विजय-मंगल पाए जीवन भर।
शंकर ने सपने में उपदेश दिया,
बुधकौशिक ने जाग लिख लिया।
कल्पवृक्ष तुल्य विश्राम दाता,
सकल विपदाओं के विनाशक भ्राता।
त्रिलोक-सुंदर श्रीराम हमारे,
सर्वस्व स्वामी, हृदय उबारे।
"इस प्रकार महर्षि बुधकौशिक द्वारा रचित श्रीरामरक्षा स्तोत्र समाप्त होता है। यह श्री सीतारामचंद्र को समर्पित हो।"
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