मनुष्य प्राचीन काल से ही यह जानने का प्रयास करता आया है कि देवता कौन हैं, उनका स्वरूप क्या है, वे कहाँ रहते हैं और उनका हमारे जीवन तथा ब्रह्मांड से क्या संबंध है, और यह प्रश्न केवल धार्मिक आस्था या पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह गहन दार्शनिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक प्रश्न है, जिसे हम यदि सरल उदाहरणों और आधुनिक दृष्टि से समझें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि देवता वास्तव में कोई कल्पित या परीलोक में बैठे हुए प्राणी नहीं हैं बल्कि वे ईश्वर की वे विशेष शक्तियाँ, सिद्धान्त और ऊर्जाएँ हैं जिनके कारण यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड संचालित होता है और मनुष्य का जीवन चलता है; जैसे यह संसार केवल तीन मूल रंगों – लाल, नीला और पीला – से अनगिनत रंगों की इंद्रधनुषी दुनिया बना लेता है, वैसे ही ईश्वर भी मूल रूप से एक ही है पर उसकी अभिव्यक्तियाँ पाँच मुख्य सिद्धान्तों के रूप में प्रकट होती हैं: उत्पत्ति (सृष्टि का निर्माण), स्थिति (संरक्षण और पालन), लय (विनाश या रूपांतरण), व्यापकता (हर वस्तु में उसकी उपस्थिति) और आनंद (सर्वोच्च सुख, शांति और प्रेम), और इन पाँच सिद्धान्तों के अनगिनत सम्मिश्रण से असंख्य शक्तियाँ और कार्य उत्पन्न होते हैं, जिन्हें शास्त्रों ने देवता कहा है; उदाहरण के लिए यदि हम वेदों को देखें तो ऋग्वेद में अग्नि, वायु, सूर्य, वरुण, इन्द्र आदि को देवता कहा गया है, क्योंकि वे जीवन को चलाने वाली मूलभूत शक्तियाँ हैं – अग्नि हमें भोजन पकाने और ऊर्जा देने वाली शक्ति है, वायु श्वास और जीवन की गति देने वाली है, सूर्य प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत है, वरुण जल के रूप में जीवन का आधार है, इन्द्र वर्षा और वज्र के रूप में कृषि और संरक्षण का कारक है, अर्थात् वेदों ने प्रकृति की प्रत्येक शक्ति को देवता का स्वरूप माना और यह अत्यंत वैज्ञानिक दृष्टि है, क्योंकि वास्तव में यदि सूर्य न हो तो पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं, यदि वायु न हो तो हम सांस भी न ले सकें, यदि जल न हो तो जीव-जगत का अस्तित्व ही न रहे, यदि अग्नि न हो तो ऊर्जा और परिवर्तन रुक जाए, यदि पृथ्वी न हो तो हमारे पास खड़े होने के लिए आधार ही न बचे, तो क्या यह उचित नहीं कि इन शक्तियों को दिव्यता का रूप मानकर देवता कहा जाए? उपनिषदों ने इस विचार को और गहरा किया और कहा कि देवता केवल बाहर नहीं हैं बल्कि भीतर भी हैं, जैसे कठोपनिषद् कहता है कि यह आत्मा ही ब्रह्म है, और यही आत्मा विभिन्न गुणों में प्रकट होकर देवताओं का स्वरूप धारण करती है; गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही अग्नि में जठराग्नि बनकर अन्न को पचाता हूँ, मैं ही सूर्य में तेज हूँ, मैं ही चन्द्रमा में शीतलता हूँ, मैं ही वायु में जीवन हूँ, यानी गीता ने भी यह बताया कि देवता वास्तव में ईश्वर की ही विविध अभिव्यक्तियाँ हैं जो अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती हैं; जब शास्त्र कहते हैं कि देवताओं की संख्या तैंतीस करोड़ है तो इसका शाब्दिक अर्थ यह नहीं कि सचमुच आकाश में 33 करोड़ लोग बैठे हैं बल्कि यह एक दार्शनिक संकेत है कि संसार की हर क्रिया, हर नियम, हर ऊर्जा और हर शक्ति के पीछे कोई दिव्यता कार्यरत है और उनकी संख्या अनगिनत है, इसलिए इसे प्रतीकात्मक रूप से तैंतीस करोड़ कहा गया, जिससे मनुष्य यह समझे कि हर वस्तु, हर घटना और हर अनुभव में कोई-न-कोई देवता यानी दिव्य शक्ति काम कर रही है; यदि हम आधुनिक विज्ञान से तुलना करें तो यह विचार और भी स्पष्ट हो जाता है – विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड ऊर्जा से बना है, ऊर्जा ही पदार्थ बनती है, ऊर्जा ही गति और परिवर्तन का कारण है, और यह ऊर्जा अनेक रूपों में प्रकट होती है – प्रकाश, ऊष्मा, विद्युत, चुंबकत्व, गुरुत्वाकर्षण, नाभिकीय शक्ति – और प्रत्येक शक्ति का कोई विशिष्ट कार्य है, ठीक वैसे ही जैसे शास्त्र कहते हैं कि प्रत्येक देवता का कोई विशिष्ट कार्य है, तो क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि आधुनिक विज्ञान और प्राचीन वेदांत एक ही सत्य को अलग-अलग भाषा में व्यक्त कर रहे हैं? उदाहरण के लिए, सूर्य की ऊर्जा यदि न हो तो प्रकाश और ऊष्मा का अभाव होगा और पृथ्वी पर जीवन नष्ट हो जाएगा, यह सूर्यदेव की शक्ति है; वायु में ऑक्सीजन न हो तो श्वसन संभव नहीं, यह वायुदेव की कृपा है; जल न हो तो अन्न न उगे, यह वरुणदेव का कार्य है; वर्षा न हो तो कृषि नष्ट हो जाए, यह इन्द्र की भूमिका है; अग्नि न हो तो ऊर्जा और परिवर्तन रुक जाए, यह अग्निदेव का कार्य है; पृथ्वी न हो तो जीवन का आधार ही न बचे, यह पृथ्वीदेवी की शक्ति है; इस प्रकार यदि हम थोड़ा गहराई से सोचें तो समझ पाएँगे कि देवता वास्तव में कोई कल्पित पात्र नहीं बल्कि जीवन को चलाने वाली मूलभूत शक्तियों के प्रतीक हैं; यही कारण है कि भारतीय संस्कृति ने अन्न को अन्नदेव, जल को जलदेव, वायु को वायुदेव, अग्नि को अग्निदेव, धन को लक्ष्मी, समय को कालदेव, ज्ञान को सरस्वती, शक्ति को दुर्गा, प्रेम को कामदेव, और मृत्यु को यम कहा – ताकि मनुष्य हर शक्ति का सम्मान करे और उसके साथ सामंजस्य बनाए रखे; अब यदि हम इसे आधुनिक मनोविज्ञान से जोड़ें तो भी यही विचार निकलता है कि देवता हमारे भीतर की सकारात्मक शक्तियाँ हैं और असुर हमारे भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ – जब हम साहस दिखाते हैं तो शक्ति का देवता सक्रिय होता है, जब हम दया करते हैं तो करुणा की देवी प्रकट होती है, जब हम ज्ञान अर्जित करते हैं तो सरस्वती की कृपा मिलती है, जब हम सत्य बोलते हैं तो सत्यदेव हमारे साथ होते हैं, लेकिन जब हम लोभ, क्रोध, अहंकार और हिंसा में डूबते हैं तो असुर सक्रिय हो जाते हैं, इसलिए साधना और ध्यान का उद्देश्य यही है कि हम अपने भीतर के देवताओं को जगाएँ और असुरों को शांत करें; यही कारण है कि योग और ध्यान को देवताओं का आह्वान कहा गया है, क्योंकि जब मन शुद्ध होता है, श्वास संतुलित होती है, ध्यान गहरा होता है तो भीतर की सकारात्मक ऊर्जा – यानी देवता – सक्रिय होते हैं; गीता में भी यही कहा गया है कि मनुष्य का मन ही उसका मित्र और शत्रु है – यदि मन को साध लो तो देवता प्रकट होते हैं, यदि मन को बिगाड़ो तो असुर प्रकट होते हैं; व्यावहारिक जीवन में भी हम यही अनुभव करते हैं – जब विद्यार्थी अनुशासन और लगन से पढ़ाई करता है तो ज्ञान की देवी सरस्वती उसका साथ देती हैं, जब किसान परिश्रम और समय का पालन करता है तो इन्द्र उसकी फसलों को वर्षा से सींचते हैं, जब चिकित्सक निष्ठा से सेवा करता है तो धन्वंतरि की कृपा से रोगी स्वस्थ होता है, जब सैनिक देश की रक्षा करता है तो शक्ति का देवता उसके साहस में प्रकट होता है, जब कलाकार सृजन करता है तो सरस्वती और नारद जैसे देवता उसकी प्रेरणा बनते हैं, यानी देवता हमारे हर कर्म और हर क्षेत्र में ऊर्जा और प्रेरणा के रूप में साथ रहते हैं; यदि हम उपनिषदों की दृष्टि से देखें तो देवता वास्तव में ब्रह्म की ही विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं – कठोपनिषद कहता है कि यह आत्मा ही ब्रह्म है और वही विभिन्न रूपों में कार्य करता है, ईशोपनिषद कहता है कि यह जगत ईश्वर से ही आवृत है, मुंडकोपनिषद् कहता है कि जैसे मकड़ी अपने जाल को स्वयं से निकालती और स्वयं में समेट लेती है वैसे ही यह ब्रह्मांड ईश्वर से निकलता है और उसी में विलीन हो जाता है, और इस पूरी प्रक्रिया में उत्पत्ति, स्थिति, लय, व्यापकता और आनंद के सिद्धान्त काम करते हैं, और इन्हीं सिद्धान्तों की अभिव्यक्ति देवता हैं; गीता में श्रीकृष्ण ने जब अपना विराट रूप दिखाया तो उसमें असंख्य देवता दिखाई दिए – कोई सूर्य था, कोई अग्नि, कोई वायु, कोई चन्द्रमा, कोई पर्वत, कोई नदी – यानी यह सब देवता उसी विराट पुरुष के अंग हैं; यह दृष्टि हमें यह समझाती है कि देवता वास्तव में अलग-अलग शक्तियाँ हैं पर उनका स्रोत एक ही है और वह है परमात्मा; यदि हम इसे आधुनिक उदाहरणों से समझें तो यह वैसा ही है जैसे एक ही इंटरनेट नेटवर्क से करोड़ों डिवाइस जुड़े हैं और हर डिवाइस अलग-अलग कार्य करता है पर स्रोत एक ही है, या जैसे एक ही बिजली अलग-अलग उपकरणों को अलग-अलग कार्य करने की शक्ति देती है, तो ईश्वर की मूल शक्ति भी एक ही है पर वह अनगिनत देवताओं के रूप में प्रकट होकर ब्रह्मांड को चलाती है; अब प्रश्न यह है कि मनुष्य को देवताओं की पूजा क्यों करनी चाहिए – इसका उत्तर यह है कि पूजा का वास्तविक अर्थ है कृतज्ञता और सामंजस्य, यानी जब हम देवताओं की पूजा करते हैं तो हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारा जीवन उनकी कृपा पर आधारित है और हम उनका आदर करते हैं, जैसे हम अन्न ग्रहण करने से पहले अन्नदेव को धन्यवाद देते हैं, जल पीने से पहले जलदेव को प्रणाम करते हैं, सूर्य निकलते ही सूर्यनमस्कार करते हैं, वायु को शुद्ध करने के लिए प्राणायाम करते हैं, यानी पूजा केवल मूर्ति के आगे फूल चढ़ाना नहीं बल्कि जीवन की हर शक्ति का सम्मान करना और उसके साथ संतुलन बनाना है; यही कारण है कि भारतीय संस्कृति ने जीवन के हर छोटे-बड़े काम को देवताओं से जोड़ा ताकि मनुष्य निरंतर कृतज्ञता और संतुलन की भावना बनाए रखे; यदि हम आज की दुनिया को देखें तो यह बात और भी महत्वपूर्ण लगती है – जब हमने जल को प्रदूषित किया, वायु को गंदा किया, भूमि का अंधाधुंध दोहन किया, अग्नि का दुरुपयोग किया, तो यही देवता प्रकोप रूप में सामने आए – बाढ़, सूखा, तूफान, भूकंप, प्रदूषण और बीमारियाँ – यानी जब देवताओं का अनादर होता है तो उनका स्वरूप संतुलन बिगाड़ देता है; इसलिए देवताओं की पूजा और साधना का अर्थ है प्रकृति और जीवन की शक्तियों के साथ सामंजस्य और सम्मान, ताकि वे शक्तियाँ हमें संरक्षण और आनंद देती रहें; अंततः देवता का अर्थ केवल धर्मग्रंथों में खोजने की चीज़ नहीं है बल्कि यह हर दिन के अनुभव में है – जब आप सुबह सूर्य की किरणों को देखते हैं तो वह सूर्यदेव का आशीर्वाद है, जब आप श्वास लेते हैं तो वह वायुदेव की कृपा है, जब आप जल पीते हैं तो वरुण का आशीर्वाद है, जब आप सीखते हैं तो सरस्वती की कृपा है, जब आप प्रेम करते हैं तो कामदेव की झलक है, जब आप साहस दिखाते हैं तो शक्ति का देवता आपके भीतर प्रकट होता है, और जब आप आनंद का अनुभव करते हैं तो स्वयं परमात्मा आपके भीतर प्रकट होता है; इसलिए शास्त्रों ने कहा कि देवता बाहर भी हैं और भीतर भी, और उन्हें पहचानना ही सच्चे अध्यात्म की शुरुआत है, क्योंकि जब हम देवताओं को केवल मूर्तियों या कल्पनाओं में सीमित न रखकर वास्तविक शक्तियों के रूप में देखते हैं तो जीवन को अधिक गहराई, वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता से समझ पाते हैं, और यही समझ हमें संतुलित, शांत और आनंदमय जीवन की ओर ले जाती है।
No comments:
Post a Comment