Tuesday, February 2, 2016

प्रेम चरम नियम है




एक चीज़ होती है प्रेम और दूसरी चीज़ होती है आसक्ति या मोह । आज जिसे लोग प्रेम कहते  हैं , वह किसी दूसरे के साथ खुद को बाँधने का,खुद की पहचान बनाने का एक तरीका है , एक आर्ट है , एक तकनीक है । आसक्ति प्रेम नहीं है । आसक्ति का प्रेम से कोई लेना देना भी नही है । 

आसक्ति काफी सुविधाजनक है जैसे सजावटी प्लास्टिक के फूल । आपके अहंकार को यह पुष्टि देता है , मैं कितना  महान  हूँ मैंने इसे चाहा  ! अगर आप किसी के प्रति आसक्त होंगें  तो उसके व्यवहार, स्वभाव और  प्रतिक्रिया से आपके मन में बैचनी, डर , आशंका और पागलपन धीरे धीरे घर करने लगेंगें । आसक्ति आपको  भावनाओं के एक ऐसे हाई वे पर ले जाती है  जिसका आखिरी पड़ाव पागलपन ही होता है ।  आपकी आसक्ति जिसके प्रति है आप उसके साथ एक होना चाहेंगें। ...... वह उपस्थित है तो आप प्रसन्न होते हैं और अगर अनुपस्थित है तो आप दुखी होते हैं । यह विशुद्ध गणित है निज़ी लाभ -नुकसान का ,प्रेम नहीं  । 

 प्रेम में आपको भौतिकता की सीमा को तोडना होगा , प्रेम  निजी फायदे किए लिए नहीं है,सच्चा प्रेम खुद को मिटाने का एक तरीका है  । हम खुद के मैं को मिटाने से  डरते हैं इसलिए आसक्ति की तरफ सहज आकर्षित हो जाते हैं । इससे अपना  अहम भी बना रहता है ,  और झूठी तसल्ली भी बनी रहती है कि  हम प्रेम करने के महारथी हैं ।

जब आप प्रेम में होते हैं वह भी सच्चे तो आपके भौतिक शरीर की सीमाएं टूट  जाती हैं । प्रेम आपके शरीर को स्पंदनों से भर  देता है  और हो सकता है आपकी आँखों में आँसू भर जाएँ या आपका गला रुंध जाए । प्रेम एक मनोदशा है,  एक मनोवृति है, जो मिटने की कला जानते हैं वही  सच्चा प्रेम कर सकते हैं । 

कभी कभी लगता है मैंने उसे इतना चाहा ,  बदले में मुझे कम मिला या कुछ भी नहीं मिला या मेरे  धोखा हुआ , तो निश्चिन्त रहिये आप आसक्ति की गिरफ्त में हैं प्रेम की नहीं । जो बांटने और देने से घट जाता है वह वासना है,आसक्ति है  । उसे भूलकर भी प्रेम नहीं समझना ।आसक्ति , काम और वासना को नापा जा सकता है केवल प्रेम ही एक ऐसी immeasurable unit है जिसको नापा नहीं जा सकता है , यह अमाप है । 

प्रेम प्रार्थना है । एक सच्चा प्रेमी वही है जो प्रताड़ना, ईर्ष्या , दोषारोपण, माल्कियत की भावना से मुक्त होता है ।  मैंने  तुझे प्रेम किया इतना ही काफी है । बदले में कुछ भी प्रतिकार चाहने वाला कुछ और कर सकता है लेकिन सच्चा प्रेम नहीं कर सकता है । 

अधितर प्रेम का अर्थ लोग एक प्रकार के एकाधिकार या माल्कियत से लेते हैं । जिस क्षण आप  प्रेम के नाम पर किसी भी जीवित चीज़ पर अपना अधिकार जमाते हैं , आप  उसे मार डालते हैं । तब आप  चिंतित होंगें  , आपको  लगेगा की आपने  तो प्रेम किया लेकिन सामने वाले ने आपको   धोखा दिया । याद रखिये  यदि आपको  सच्चा प्रेम होगा तो आप  कभी भी असुरक्षित, भयभीत और ईर्ष्यालु नहीं महसूस करेंगें  । 

जो व्यक्ति प्रेम को समझ लेता है वह परमात्मा को समझने की फ़िक्र छोड़ देता है । प्रेम और परमात्मा एक ही डायमेंशन की चीजें हैं । प्रेम चरम नियम है ।

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