Monday, October 6, 2014

अक्सर मन्त्र जाप या अनुष्ठान विफल क्यों होते हैं ?

अक्सर साधक कहते हैं की उन्होंने इतने इतने मन्त्र जाप किया अनुष्ठान किया फिर भी उन्हें सिद्धि तो दूर की बात कोई प्रत्यक्ष लाभ तक होता नज़र नहीं आता है ।

                         
मन्त्र विज्ञान एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है । वर्तमान में मन्त्र-विद्या निष्फल और उपहास का विषय बनती जा रह है । लाखों, करोड़ों की संख्या  में किया गया जाप और अनेकों सम्पादित अनुष्ठानों के पश्चात भी न तो  उचित परिणाम दिखाते हैं , न कोई कार्य सफल होता है  और न ही मन्त्र की  सिद्धि होती है ।  अधिकतर साधक  की कुपात्रता,उतवलीपन और शंकालु वृत्ति काफी सीमा तक इसके लिए जिम्मेदार है ।

भगवान शंकर कहते हैं। ……

जिह्वा दग्धा परान्नेन करौ दग्धौ प्रति ग्रहात्।

मनो दग्धं परस्त्री भिः कथं सिद्धिर्वरानने॥


 वादार्थं  पठ्यते विद्या परार्थं क्रियते जपः।

ख्यार्त्यथं क्षीयते दानं कथं सिद्धिर्वरानने॥

        अर्थात ..........
 - पराया अन्न खाने से जिनकी जिव्हा की शक्ति नष्ट हो गई, दान दक्षिणा लेते रहने से हाथों की शक्ति चली गई, पर नारी की ओर मन डुलाने से मन नष्ट हो गया फिर हे पार्वती  उसे  सिद्धि कैसे प्राप्त हो सकती है ?

यदि वाणी दूषित , कलुषित दग्ध स्थिति में पड़ी रहेगी तो उसके द्वारा उच्चारित मन्त्र भी जल जायेंगें । तब बहुत संख्या में जप, अनुष्ठान करने का कोई परिणाम नहीं मिलेगा । परिष्कृत और संयमित वाणी में ही वह शक्ति होती है जो   मन्त्र को सिद्ध कर  सकती है । 


मंत्रानुष्ठान की सफलता में बलाबल का विचार होता है । मन्त्र जाप में साधक के ऊपर दो तरह के बल कार्य कर रहे होते हैं एक प्रारब्ध का बल और दूसरा अनुष्ठान का बल ।

यदि मन्त्र अनुष्ठान का बल  कम  हो और प्रारब्ध का बल अधिक हो तो अनुष्ठान निष्फल हो जाता है । परन्तु यदि अनुष्ठान का बल अधिक हो और प्रारब्ध  का बल कम हो तो अनुष्ठान सफल हो जाता है और मन्त्र सिद्धि हो जाती है ।

प्रारब्ध का बल कितना है यह साधारण साधक जान नहीं पाता  है , इसलिए साधक को बार बार अनुष्ठान करने का निर्देश दिया जाता है जैसे ही अनुष्ठान का बल ,प्रारब्ध के  बल से    अधिक हो जाता है मन्त्र सिद्ध हो जाता है ।

अनुष्ठान करके मनुष्य अपने प्रारब्ध से मुक्ति पा सकता है ।

मन्त्र अनुष्ठान में समय, अनुशासन और विधानबद्ध  रह कर किया गया मन्त्र जाप शीघ्र परिणाम देता है  । मनमौजी ,अस्तव्यस्त ढंग से की गई महत्वपूर्ण साधना   भी निरर्थक चली जाती है ।

मन्त्र साधना  के साथ साथ साधक को नियमित अपना आत्मनिरीक्षण करना चाहिए । अपने चरित्र, व्यव्यहार , स्वाभाव ,विचार,जीवन यापन दृष्टिकोण में व्याप्त दोष, बुराइयों, अशुद्धियों को देख कर उन्हें  दूर करने  का उपाय करना चाहिए ।  जिसके फलस्वरूप  एक दिन वह पूर्ण निर्विकार एवं शुद्ध हृदय का बन जाएगा ।यह अटल सत्य है कि निर्विकार शुद्ध बुद्ध, दोषरहित बन जाने पर मनुष्य को  वह शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त होती है जिसके कारण  उत्साह और साहस उसमें फूट-फूट कर निकलता है। सिद्धि सफलता उसके समक्ष हाथ जोड़े खड़ी रहती है।  ऐसी मनोस्थिति से किया गया मन्त्र जाप या अनुष्ठान सदैव  सिद्ध होते हैं ।

 द्वारा
गीता झा

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