Monday, January 12, 2015

ज्योतिष में दरिद्र -योग

दरिद्र -योग में जन्म लेने वाला वाला  जातक कठिन  परिस्थिति में रहने वाला , अप्रिय बोलने वाला , व्यसनी, निम्न सोच रखने वाला , कटु भाषी, निम्न वृति से धन कमाने वाला , परस्त्री लोलुप होता है । इस योग के रहते कभी कभी जातक के अंगों में विकार आ जाता है , वह कलह-प्रिय , कृतघ्न , उत्तम लोगों  से जलने वाला , दूसरों के कार्य में विघ्न डालने वाला होता है ।

दरिद्र -योग होने की सम्भावना
लग्न द्वारा
  1. यदि लग्न  चर  राशि का हो , लग्न का नवमांश भी चर  राशि का हो और लग्न पर  शनि या नीच के वृहस्पति की दृष्टि हो तो दरिद्र योग बनता है । ऐसी सम्भावना केवल कर्क लग्न में बनती  है  ।
  2. यदि लग्न स्थिर राशि में हो और सभी पाप ग्रह केंद्र और  त्रिकोण में हों तथा शुभ  ग्रह केंद्र के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर हो तो जातक भिक्षा मांग कर जीवन यापन करता है ।
  3. यदि लग्न स्थिर राशि  का हो और सभी पाप ग्रह केंद्र एवं त्रिकोण में हों तथा शुभ  ग्रह  केंद्र और त्रिकोण में हों लेकिन निर्बल हों और पाप ग्रह केंद्र के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर हो तो भिक्षुक -योग बनता है ।
चन्द्रमा  द्वारा
  1. यदि लग्न व चन्द्रमा  से चतुर्थ स्थान पर पाप ग्रह  बैठा हो तो जातक निर्धन होता है ।
  2. यदि चन्द्र - ग्रहण  के समय का जन्म हो और चन्द्रमा  किसी ग्रह -युद्ध में पराजित होकर अशुभ ग्रह  से दृष्ट हो तो जातक दरिद्र होता है ।
  3. यदि केंद्र या त्रिकोणवर्ती चन्द्रमा शत्रु या नीच वर्ग का हो और चन्द्रमा  से  वृहस्पति , बुद्ध आठवें या बारहवें घर में हो तो जातक दरिद्र होता है ।
  4. यदि यदि राहु या केतु ग्रस्त चन्द्रमा  पाप दृष्ट या पाप संयुक्त हो तो जातक दरिद्र होता है ।
  5. यदि रात्रि का जन्म हो और कमजोर चन्द्रमा से अष्टम भाव पाप दृष्ट /युक्त हो तो जातक दरिद्र होता है ।
  6. यदि चन्द्रमा पाप नवमांश  में हो  और राहु के साथ हो तथा किसी पाप ग्रह   द्वारा दृष्ट  हो तो जातक दरिद्र होता है ।
  7. यदि चन्द्रमा  तुला राशि में स्थित हो और नवमांश में  शत्रु-राशि में स्थित हो और किसी नीच या शत्रु ग्रह द्वारा दृष्ट हो तो जातक दरिद्र होता है ।
  8. यदि चन्द्रमा  चर राशि में स्थित हो , पाप नवमांश में रहते हर  शत्रु /पाप ग्रह से दृष्ट हो  और चन्द्रमा  पर वृहस्पति की दृष्टि न पड़ती हो तो दरिद्र योग बन जाता है ।
  9. यदि चन्द्रमा सूर्य के नवमांश में हों सूर्य चन्द्रमा के नवमांश में हो लेकिन कुंडली में सूर्य और चन्द्रमा की युति हो तो दरिद्र योग बनता है ।
अन्य योग
  1. शुभ ग्रह केंद्र में हों पाप ग्रह धन भाव में हों तो जातक सर्वदा दरिद्र रहता है ।
  2. यदि वृहस्पति अष्टम /लग्न का स्वामी हो और नवमेश का बल उससे कम  हो तो तथा    एकादश  भाव का स्वामी केंद्र में न होकर अस्त /निर्बल हो तो जातक दरिद्र होता है । 
  3. यदि वृहस्पति , मंगल , शनि या बुद्ध नीच होने के साथ अस्त भी हो और ५/६/८/११/१२ भाव में स्थित हो तो जातक दरिद्र होता है ।
  4. यदि शनि  नवम भाव में हो और पाप ग्रह द्वारा दृष्ट  हो और सूर्य और बुद्ध लग्न में बैठे  हों , बुद्ध नीच नवमांश में हो तो दरिद्र-योग बनता है  ।
  5. यदि शुक्र ,वृहस्पति , चण्द्रमा और मंगल नीच राशि में  होते हुए लग्न/५/७/९/१०/११ इन छह भाव में किसी चार भाव में बैठे हों तो दरिद्र योग होता है । यह योग केवल कन्या और मकर लग्न में ही लागू हो सकता यही ।
  6. यदि वृहस्पति ६/१२ वे भाव में स्थित हो , पर स्वगृही  न हो तो दरिद्र योग बनता है ।
  7. यदि पाप ग्रह नीच हों तो जातक पाप कर्म करता है यदि  शुभ ग्रह नीच हों तो जातक गुप्त तरीके से पाप कर्म करता है । 
  8. नीच का वृहस्पति दशम स्थान पर बैठा हो तो जातक गुप्त तरीके से पाप करने वाला होता है ।
  9. उच्चस्थ ग्रह नीच  नवमांश में होने पर बुरा फल देते हैं और जातक को कुकर्म करने के लिए प्रेरित करता है ।
  10. आत्मकारक या लग्न से अष्टम भाव के स्वामी की दृष्टि आत्मकारक या लग्न पर हो तो दरिद्र योग बनता है ।
द्वारा
गीता झा

Friday, January 9, 2015

ज्योतिष में ह्रदय रोग

ह्रदय मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है । ह्रदय की बनावट कार्य प्राणी या वाल्वों में रक्त संचार की रुकावट या शिराओं संचार व्यवस्था में गड़बड़ी  होने से ह्रदय के कार्य करने में रुकावट पैदा होती है फलस्वरूप ह्रदय रोग उत्पन्न हो जाते हैं । 

धूम्रपान , शराब का सेवन करना , चिंता, शोक , उच्च रक्त चाप , चर्बी का बढ़ना , मानसिक तनाव , अपुष्ट भोजन, वात -रोग, गठिया , भय, वंशानुगत कारणों  , प्रमेह  आदि कारणों से ह्रदय रोग होते हैं ।  ह्रदय रोग कई प्रकार के होते हैं जैसे  जन्म से ह्रदय में छेद होना, ह्रदय शूल, खून के थक्के ज़माने से ह्रदय घात होना , वाल्व में खराबी आना , उच्च/निम्न  रक्त चाप आदि । 

ज्योतिष की दृष्टि से ह्रदय रोग को प्रभावित करने वाले कारक  

  1. कुंडली में चतुर्थ स्थान ह्रदय का स्थान है । 
  2. पंचम भाव /पंचमेश  मनोस्थति को दर्शाता है । 
  3. छठा भाव रोग का कारक है । 
  4. सूर्य ऊर्जा का प्रतीक है । 
  5. बुद्ध स्नायु - मंडल  पर प्रभाव रखता है । 
  6. चन्द्रमा रक्त और मन का प्रतीक है । 
  7. मंगल रक्ताणु और रक्त-परिभ्रमण पर प्रभाव रखता है । 

ह्रदय रोग सम्बन्धी योग 

  1. कुंडली में पंचम भाव में पाप ग्रह बैठा हो और पंचम भाव पाप ग्रहों से घिरा हुआ हो । 
  2. पंचम भाव का स्वामी पाप ग्रह के साथ बैठा हो अथवा पाप गृह से देखा जाता है । 
  3. पंचम भाव का स्वामी नीच राशि अथवा शत्रु राशि में स्थित हो या  अष्ठम  भाव में बैठा हो ।
  4. यदि पंचमेश बारहवे घर में हो या बारहवे भाव के स्वामी के साथ 6 /8 /12  स्थान पर हो तो ह्रदय रोग होता है ।  
  5. सूर्य छठे भाव का स्वामी हो कर चतुर्थ भाव में पाप ग्रहों के साथ बैठा हो । 
  6. चतुर्थ भाव में मंगल के साथ शनि  या गुरु स्थित हो और पाप ग्रहों द्वारा दृष्ट हो । 
  7. सूर्य और शनि चतुर्थ भाव में साथ बैठे हों । 
  8. सूर्य कुम्भ राशि में बैठा हो । 
  9. सूर्य वृश्चिक राशि में बैठा हो और पाप ग्रहों से प्रभावित हो । 
  10. सूर्य, मंगल ,गुरु चतुर्थ स्थान पर स्थित हो । 
  11. चतुर्थ स्थान  में शनि हो तथा सूर्य एवं छठे भाव के स्वामी पाप ग्रहों के साथ हो । 
  12. चतुर्थ भाव में केतु और मंगल स्थित हों ।
  13. यदि शनि , मंगल और  वृहस्पति चतुर्थ भाव में हो तो जातक ह्रदय रोगी होता है ।
  14. यदि तृतीयेश , राहु या केतु के साथ हो जातक ह्रदय रोग के कारण  मूर्च्छा में जाता रहता है ।   

ह्रदय-शूल होने के कारक 

  1. चतुर्थ भाव,चतुर्थ भाव के स्वामी और सूर्य की स्थिति से ह्रदय शूल का ज्ञान होता है । 
  2. चतुर्थ भाव में राहु स्थित हो और लग्नेश निर्बल और पाप ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो । 
  3. द्वादश भाव में राहु हो तो गैस वायु से ह्रदय प्रदेश में दर्द होता है । 
  4. पाप ग्रहों के साथ सूर्य वृश्चिक राशि में हों ।
  5. यदि पंचमेश और सप्तमेश छठे स्थान पर हो तथा पंचम अथवा सप्तम स्थान पर पाप ग्रहों की दृष्टि पड़ती हो तो जातक ह्रदय-शूल से पीड़ित होता है । 

ह्रदय कम्पन 

घबराहट और बेचैनी से ह्रदय कम्पन होता है ।  जब गुरु या शनि षष्ठेश होकर चतुर्थ स्थान पर बैठें  हों  और पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो यह रोग होता  है । 

द्वारा 
गीता झा 

Thursday, January 8, 2015

ज्योतिष में ईश्वर-प्रेम और साधना योग

कुंडली के पंचमभाव से ईश्वर प्रेम और नवम भाव से धार्मिक कर्मकांड , अनुष्ठान  का विचार होता है । जब नवम और पंचम दोनों  शुभलक्षण  युक्त हों तभी अनुष्ठान क्रिया भक्ति के साथ होती है । पंचम भाव प्रगाढ़ भक्ति का  द्योतक है । जब पंचम और नवम भाव में सकारत्मक सम्बन्ध  बनता है बनता है  तो जातक  भक्ति और अनुष्ठान दोनों के साथ रहने से  उच्च कोटि का साधक बनता है ।


दशम स्थान कर्मस्थान होता है और सन्यास योग भी इंगित करता है, यदि पंचमेश और नवमेश का  नवम भाव या नवमेश से सम्बन्ध हो तो साधना में उत्कृष्टता  आती है ।


पंचम में पुरुष ग्रह उपस्थित हो या पुरुष ग्रह की दृष्टि पड़ती हो तो जातक पुरुष देवता  की  उपासना करता है । पंचम समराशि हो और उसमें  चण्द्रमा या शुक्र बैठे हो या इन दोनों में से किसी की दृष्टि पड़ती हो तो जातक किसी स्त्री शक्ति की उपासना करने वाला होता है । यदि सूर्य पंचम स्थान पर हो दृष्टि हो तो जातक सूर्य का उपासक होता है । यदि चण्द्रमा व सूर्य पंचम भाव में बैठे हों या पंचम भाव पर दृष्टि डालते हों तो जातक अर्द्ध -नारीश्वर स्वरुप  की साधना करने  वाला होता है ।  यदि पंचम भाव पर मंगल स्थित हो या दृष्टि हो तो जातक कर्तिकेय , बुद्ध पंचम भव में स्थित हो या दृष्टि डाले तो श्री विष्णु , पंचम भाव में बृहस्पति स्थित हो या दृष्टि डाले तो जातक  भगवान  शंकर  की उपासना करने वाला होता है । यदि शनि या राहु और केतु का समबन्ध पंचम भाव या  पंचमेश से हो तो जातक तांत्रिक क्रिया करने वाला या नकरात्मक  शक्तियों को मानने वाला  होता है ।


शनि का समबन्ध यदि पंचम भाव या विशेष कर नवम भाव से हो तो जातक कठोर तपस्या करने वाल होता है ऐसा जातक धर्मिक आडम्बर और जातिगत भेदभाव को न मानने वाला और स्पर्शदोषादि को ना मानने वाला होता है । जातक प्रायः रीती-रिवाजों का विरोधी और दर्शन को अपनी तार्किकता पर घिसने वाला होता है ।

              रामकृष्ण परमहंस की कुंडली

पंचमेश बुद्ध , शनि  के क्षेत्र , लग्न में स्थित है । 
लग्नेश शनि नवम भाव में स्थित है । 
पंचम भाव स्थित बृहस्पति की लग्न , लग्नेश, पंचमेश   और  नवम भाव पर दृष्टि है । 
नवमेश शुक्र उच्च का दूसरे भाव में स्थित है । 
सन्यास कारक  भाव दशमेश उच्च का होकर मोक्ष के भाव 12 वें  भाव में स्थित है । 

द्वारा
गीता झा

Wednesday, January 7, 2015

सुपर-ब्रेन योगा

मानव मस्तिष्क ईश्वर की सर्वोत्तम आश्चर्यजनक रचनाओं में से एक है ।लगभग दो किलोग्राम के वजन वाले मानव मस्तिष्क में असीमित क्षमताएं निहित हैं । मस्तिष्क में लगभग बारह अरब कोशिकाएं हैं और प्रत्येक कोशिका के पांच लाख अंतरसंबंध हैं । इस प्रकार संभव है की मस्तिष्क की कोशिकाओं के अन्तर्सम्बन्ध ब्रह्माण्ड में उपस्थित परमाणुओं की संख्या से भी अधिक हों । वैज्ञानिकों के अनुसार अभी तक मस्तिष्क के केवल 8 % भाग को ही समझा और उपयोग में लाया जा सका है शेष 92 % भाग जानकारी के आभाव में निष्क्रिय अवस्था में अनुपयोगी पड़ा रहता है । अब तक अविष्कृत किसी  भी सुपर-कंप्यूटर को  मात देने वाला मानव -मस्तिष्क २० अरब पेज  की जानकरी आपने में स्टोर करके रख सकता है ।



 साधारण अवस्था में मस्तिष्क का जो 92 % भाग निष्क्रय अवस्था में रहता है उसकी  क्षमता को  जागृत करना और उपयोग में लाना तो दूर की बात है मस्तिष्क का  8 % भाग जो प्रयोग में लाया जाता उसका भी हम लोग दुरुपयोग कर चिंता, अवसाद, मतिभ्रम , स्मरणशक्ति का ह्राष ,एकाग्रता की कमी , ओब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर ,अल्झाइमर, पार्किंसन  का शिकार  बनते रहते हैं ।


हल्दी,नीम,तुलसी, बासमती चावल सहित योग के कुछ विशिष्ट पोस्चर का पेटेंट  करवाने के बाद पश्चिम जगत ने एक बार  पुनः एक प्राचीन भारतीय  व्यायाम को हाइजैक कर सुपर-ब्रेन योगा के नाम से अपने मल्टी -मिलियन डॉलर के योगा -मार्किट में प्रचारित किया है । सुपर ब्रेन योगा  में हाथों को क्रॉस कर कानों को पकड़ कर उठक - बैठक लगाईं जाती है । कान पकड़ कर उठक -बैठक लगवाने की यह   प्रक्रिया प्राचीन काल से भारत में शरारती या एकग्रता की कमी वाले विद्यार्थियों को दंड स्वरुप करवाई जाती थी , जिसका एक मात्र मकसद मस्तिष्क को संतुलित  रख स्मरण शक्ति और एकाग्रता  को बढ़ाना  था ।




तमिलनाडू  में प्राचीन काल से मंदिरों में गणेश के समक्ष कान पकड़ कर थोप्पुकरणम्  {Thoppukaranam }, किया जाता रहा है | ऊपरी तौर लगता है की  शायद यह अपनी गलतियों  की माफ़ी मांगने के लिए किया जाता है लेकिन परोक्ष रूप से इसे  स्मृति बढ़ाने  और  भावनात्मक -अस्थिरता दूर करने के लिए किया जाता रहा है ।


थोप्पुकरणम्  के पीछे का विज्ञान


न्यूरो- साइंस के अनुसार  मानव मस्तिष्क दो भागों या गोलार्द्धों में विभाजित रहता है ।   मस्तिष्क का दायां हिस्सा शरीर के बाएं हिस्से को नियंत्रित करता है और मस्तिष्क का बायां हिस्सा शरीर के दाएं हिस्से को नियंत्रित करता है । मस्तिष्क का बायां हिस्सा वाणी, विवेक, विश्लेषण , तर्क, बुद्धि इत्यादि से सम्बंधित है वहीं दायां  हिस्सा समझ ,  अंतर्ज्ञान, अनुभव , अनुभूति , भावना से समबन्धित होता है । मस्तिष्क का दायां  हिस्सा इड़ा और बायां हिस्सा पिंगला नाड़ी से सम्बद्ध है । शरीर और मन के सुचारू क्रियान्वन के लिए यह जरुरी है की हमारे मस्तिष्क के दोनों गोलाद्धों में सामंजस्य बना रहे ।


 जब जब मस्तिष्क के दोनों गोलार्ध संतुलित अवस्था में होते है तब तब  मस्तिष्क से  अल्फा तरंगें बहुलता से निकलती हैं , यह अल्फा तरगें ७-१२ साइकिल /सेकंड की होती हैं । इन तरंगों से हमारा शरीर शिथिल हो जाता है और मस्तिष्क तरंगें  पृथ्वी के चुम्बकीय स्पंदन शुमान -अनुनाद {Schumann resonance }जिसकी आवृति ७-१/२ साइकिल/सेकंड है के बराबर हो जाती है । मस्तिष्क से  निकलने वाले अल्फा तरंगें मस्तिष्क को सृजनात्मकता  और अंतर्ज्ञान के प्रादुर्भाव के लिए आवश्यक वातावरण -प्रदान करती  हैं । इस समय मस्तिष्क जानकारी ग्रहण करने या प्रसारित करने के लिए अत्यंत क्रियाशील हो जाता है और धीरे धीरे मस्तिष्क के  सभी प्रणालियों में  सामंजस्य आने लगता है |इस सामंजस्य से  शरीर-मन की व्याधियां  दूर होने लग जाती हैं  । वैज्ञानिक भी यह तथ्य प्रमाणित कर चुके हैं की आइंस्टीन के  मस्तिष्क  से अधिकतर  समय अल्फा तरगें बहुलता से निकलती थी इसलिए वे एक महानतम अन्वेषक बन सके थे ।



इसके साथ ही कान के निचले भाग [ear -lobe]   में   मस्तिष्क के ऍक्यूप्रेशर बिंदू होते हैं जो कान पकड़ने से एक्टिव हो जाते हैं । जिससे स्मरण शक्ति का विकास होता है। इसके नियमित अभ्यास से एकाग्रता बढ़ती है और भावात्मक अस्थिरता दूर होती है ।



थोप्पुकरणम्   करने की सही विधि :




मुंह को बंद कर जीभ को मोड़कर ऊपर के तालु  से लगाकर माइल्ड -खेचरी मुद्रा  लगाएं । { tongue is rolled up to touch the upper soft palate }
अपने दायें कान को बाएं हाथ की उँगलियों से ऐसे पकडे की हाथ का  अंगूठा बाहर की तरफ रहे ,  इसी प्रकार अपने  दायें हाथ की उंगलिओं से बाएं कान को पकडे ।
इसके बाद साधरण दंड-बैठक लगाएं { do squatting or normal sit-up exercise }। केवल एक बात का ध्यान रखें  की नीचे  बैठते समय सांस अंदर  लें और खड़े होते समय सांस बाहर  छोड़े । सांस लेना और छोडना तथा नीचे  बैठना  और खड़े होने दोनों में रिदम् या  सामंजस्य होना चाहिए ।
शुरुवात  में 5-10 स्क्वैट्स करने के  बाद धीरे धीर बढा कर 30-35 स्क्वैट्स प्रतिदिन करें ।

 थोप्पुकरणम्  से शारीरक और मानसिक लाभ  :

  1. मस्तिष्क में रक्त प्रवाह में वृद्धि होती है । जिससे मस्तिष्क रिचार्ज होता है ।
  2. एकाग्रता और स्मरणशक्ति काफी बढ़ जाती है ।
  3. सोचने , समझने की ताकत बढ़ती है ।
  4. यह मुद्रा ऑटिज्म , एसपर्जर सिंड्रोम , लर्निंग डिसेबिलिटी , बिहेवियर प्रॉब्लम के साथ साथ अल्ज़ाइमर और पार्किंसन  में भी मदद करती है ।
  5. चिंता , अवसाद , तनाव , खिन्नता इत्यादि दूर होते हैं ।
  6. हाइपर -एक्टिव बच्चों के मस्तिष्क को यह मुद्रा शांत और फोकस करती है ।
  7. यह शरीर को लचीला बनाने  के साथ शारीरिक संतुलन को कायम रखता है ।
  8. इससे लोअर बैक पैन के साथ साथ आर्थराइटिस ,गठिया , वेरीकोस वेन के कारण होने वाले गुटनों या पैरों के दर्द से निजात मिलती है ।
  9. इसके नियमित अभ्यास से वजन भी कम होता है  | डाइजेशन सम्बन्धी विकार दूर होते हैं ।
आध्यात्मिक लाभ :

  1. थोप्पुकरणम्  में अर्ध खेचरी मुद्रा लगाने से शरीर में एक तरह कर इंटरनल-लॉक लग जाता है जिससे ऊर्जा का ह्रास कम  हो जाता है ।
  2. थोप्पुकरणम् में सर्वाधिक प्रभाव मूलाधार चक्र पर पड़ता है सम्भवता इसलिए दक्षिण भारत में लोग गणेश के सन्मुख यह मुद्रा करते हैं क्योंकि गणेश जी मूलाधार चक्र के अधिपति माने जाते हैं ।
  3.  मूलाधार में उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों के प्रगटीकरण की क्षमताएं निहित होती है । इस मुद्रा से मूलाधार में स्थित सुप्त शक्ति जागृत होती है और ऊर्ध्वगमन करती है ।
  4. मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों के संतुलन से इड़ा पिंगल सामान और संतुलित होती हैं और सुषुम्ना का जागरण होता है । यह मुद्रा कुण्डलिनी शक्ति जागरण में भी सहायक है ।
  5. इस मुद्रा के अभ्यास से आज्ञाचक्र की सक्रियता बढ़ती है जिससे पीनल ग्रंथि का क्षेत्र क्रियाशील होता है जो बौद्धिक, भावनात्मक, तार्किक  और अंतर्ज्ञान जैसी सुषुप्त क्षमताओं  को विकसित करता है । 
  6. मस्तिष्क से निकलने वाली अल्फा तरंगें मस्तिष्क  की क्रियाशीलता  उच्चतम स्तर  तक बढ़ा  सकती है ।

सावधानियां:
  1. थोप्पुकरणम् करते समय सुविधा जनक कपडे पहने और हवादार और स्वच्छ स्थान पर ही करें ।
  2. महिलाएं प्रेगनेंसी  या माहवारी में इसे न करें ।
  3. इसके लिए सुबह या शाम का समय उपयुक्त है , खाली पेट रह कर करने की कोशिश करें ।
  4. धीरे धीरे अपनी शक्ति अनुसार स्क्वैटिंग की गिनती को बढ़ाएं । एक बार में ३०-३५ स्क्वैटिंग  से अधिक न करें ।
  5. पेट, लिवर,किडनी या  ह्रदय के रोग में करने से पहले  डॉक्टर से जरूर सलाह लें । किसी भी प्रकार की सर्जरी हो चुकी हो तो भी डॉक्टर से पहले सलाह लें ।
  6. थोप्पुकरणम् करते समय किसी भी प्रकार की असुविधा हो जैसे चक्कर आना, सर दर्द होना या किसी भी अंग में तकलीफ होना तो उसे उसी समय  बंद कर दें । 
                                           ​

Monday, January 5, 2015

Saturated and Unsaturated Fatty Acid

Saturated fatty acid 


All Carbon Atoms are fully attached with or saturated with Hydrogen atoms called saturated fatty acid.Saturated fats have no double bonds in the carbon chain When they combined with glycerol they form solid saturated fat. The longer the chain of C & H the harder the fat is.

Unsaturated fatty acid


Some Carbon atoms do not have Hydrogen atoms attached to them that fatty acid is called unsaturated. It combines with glycerol gives rise to liquid unsaturated fats. The larger  the number of unattached Carbon atoms [ poly unsaturated ] the more liquid  and unsaturated the fat is . There are three types of Unsaturated fatty acids. 

  1. Mono saturated fatty acid 
  2. Poly saturated fatty acid 
  3. Trans fatty acids 



Unsaturated fatty acids have at least one bond in the carbon chain. Fats with only one bond in the carbon chains is a monounsaturated fatty acid. 


A fatty acid having several double –C=C-C-C-=C- bonds is a polyunsaturated fatty acid.


 Trans fats are artificial unsaturated fats formed when

hydrogen gas reacts with vegetable oil to create a solid.

 Trans fats not only raise cholesterol levels and interfere 

with metabolic processes, but they also deplete good HDL

 cholesterol, which helps protect against heart disease. 

By

Geeta Jha 

Wednesday, December 31, 2014

ज्योतिष में आध्यात्मिक -धार्मिक योग

यदि पूर्ण बली चन्द्रमा केंद्र में हों और उस ऊपर बृहस्पति या शुक्र की दृष्टि पड़ती हो तो जातक आध्यात्मिक  वृति का होता है ।

यदि दशम स्थान पर मीन राशि में बुद्ध या मंगल स्थित हो तो जातक ईश्वरानुरागी होता है और अंत में उसे मुक्ति मिलती है ।

यदि नवम भाव का स्वामी बली हो और उस पर   बृहस्पति  या शुक्र की दृष्टि या  युति  हो तो  जातक जप,ध्यान, समाधि में रूचि रखने वाला होता है ।

दशम भाव का स्वामी नवम भाव में हो और बली  नवम भाव के स्वामी पर बृहस्पति  या शुक्र की दृष्टि या  युति  हो जातक जप और ध्यान करने वाला  होता है ।

दशमेश शुभ हो, दशमेश दो शुभ ग्रहों के मध्य हो,या दशमेश शुभ ग्रह के नवमांश में हो जातक अध्यात्म के क्षेत्र में उज्जवल कीर्ति को प्राप्त करता है ।

दशमेश  शुभ ग्रह हो या उच्च या स्वगृही अथवा  मित्रगृही हो तो जातक उत्तम आध्यत्मिक जीवन जीने वाला होता है और उसका जीवन निष्कलंकित होता है ।

लग्नेश दशम स्थान में हो और दशमेश नवम स्थान में हो और दसमेश  पर पापग्रह की दृष्टि न हो पर शुभग्रह की दृष्टि हो और दशमेश  शुभ ग्रह के नवमांश हो परन्तु स्वयं दशमेश  पाप ग्रह  न हो तो जातक यज्ञ , होम आदि कर्मकांड  करने वाला होता है ।

द्वारा
गीता झा



Tuesday, December 30, 2014

ज्योतिष में सन्यास योग


यदि जन्म -कुंडली में चार, पांच, छह या सात ग्रह एकत्रित होकर किसी स्थान में बैठे हों तो जातक प्रायः सन्यासी होता है । परन्तु ग्रहों  के साथ बैठने से ही सन्यासी योग नहीं होता है वरन  उन ग्रहों में एक ग्रह  का बली होना भी आवश्यक है । यदि बली ग्रह अस्त हो तो भी ऐसा जातक सन्यासी नहीं होता है । वह केवल किसी विरक्त या सन्यासी का अनुयायी होता है । यदि बली ग्रह किसी ग्रह-युद्ध में पराजित होता है या अशुभ ग्रहों की दृष्टि में होता है तो ऐसा जातक सन्यासी बनने  का इच्छुक  तो होता है लेकिन उसे दीक्षा नहीं मिलती है । 

यदि सन्यास प्रदान करने वाला बली ग्रह युति के अंतर्गत  ग्रह युद्ध में हार गया हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक सन्यास ग्रहण कर उसे छोड़ देता है । ग्रहों की युति में यदि  कोई ग्रह दसम भाव का अधिपति होता है तो  भी सन्यास-योग बनता है ।

सन्यास -योग के लिए मूल रूप से निम्न तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए

  1. चार या चार से अधिक ग्रहों का एक स्थान पर बैठना ।
  2. उनमें से किसी एक ग्रह का बली  होना ।
  3. बली ग्रह का अस्त न होना ।
  4. हारे हुए बली ग्रह पर अन्य ग्रह की दृष्टि न पड़ती हो ।
  5. उन ग्रहों में से कोई दशमाधिपति हो ।


यदि सूर्य सन्यासी-ग्रह हो तो जातक वानप्रस्थ, अग्नि को  पूजने वाला, पर्वत या नदी के किनारे रहने वाला, सूर्य, शक्ति का उपासक होता है ।

यदि चन्द्रमा सन्यासी-ग्रह हो तो जातक के शैव होने की सम्भावना होती है, वह गुरु का अनुशरण करने वाला होता है  ।

मंगल के सन्यास-ग्रह होने पर जातक लाल वस्त्र धारी सन्यासी होता है , शाक्य , भिक्षावृति कर गुजारा करने वाला होता है ।

बुद्ध यदि सन्यास-ग्रह होता है तो जीवक विष्णु भक्त हो सकता है , तांत्रिक क्रियाओं का प्रदर्शन कर आजीवका कमाने वाला  हो सकता है , बोलने की कला में निपुर्ण होता है  ।

बृहस्पति यदि सन्यास-ग्रह हो तो जातक  भिक्षु, तपस्वी, धर्मशास्त्रों का ज्ञाता , यज्ञ यादि कर्मकांडों को करने वाला होता है ।

शुक्र के सन्यास-ग्रह होने पर जातक भ्रमण करने वाला , वैष्णव , व्रत करने वाला  होता है । यदि शुक्र का सम्बन्ध पंचम, नवम या दशम भाव से हो तो जातक आध्यात्म  से प्रसिद्धि या धन पाने का  अभिलाषी होता है ।

शनि यदि सन्यास-ग्रह होता है तो जातक कठोर-तपस्या करने  वाला , दिगंबर , निर्ग्रंथी होता है । 
  
द्वारा
गीता झा